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मन का चैन

  • kewal sethi
  • Nov 26
  • 2 min read

मन का चैन


- कहो ललिता बहन, कैसी हैं।

- सब ईश्वर की कृपा है।

- और बहु कैसी है।

- सिरफिरी, कहना ही नहीं मानती, मनमर्जी करती है।

- क्येां क्या हो गया। वह तो इतनी सुशील है। काम में भी चुस्त और बात में भी कुशल।

- अरे, यह सब मत पूछो। मैं तो बहुत परेशान हूॅं।

- पिछले महीने तक तो बड़ी तारीफ कर रही थी। अब नया क्या है।

- बात यह है कि अब वह पेट से है।

- बधाई हो। तो अब तुम दादी बनने वाली हो।

- पर मैं दादा बनना चाहती हूॅ।

- अरे यह क्या कह रही हो।

- नहीं नहीं, मेरा मतलब है, मैं पौता चाहती हूॅ, पौती नहीं।

- तो इस में बहु से नाराज़गी क्यो। यह तो ईश्वर के हाथ है।

- पर कम से कम पता तो लगाया जा सकता है।

- पागल हो क्या। पता है ऐसा करना मुश्किल है।

- मुश्किल क्यों। साईस के युग मे सब आसानी से हो जाता है।

- समझी नहीं। इस की कानून में मनाही है।

- डाक्टर तो अपना ही है। किसी को पता भी नहीं चले गा।

- बेटा क्या कहता है।

- वह बदल गया है। बीवी की ही बात मानता है।

- सही है न। उसे पता है कि डाक्टर भी अन्दर जाये गा और वह भी।

- सब कहने की बातें हैं

- पर इतनी रिस्क लेना सही नहीं हो गा। आ बैल, मुझे मार जैसी बात हो जाये गी।

- रिस्क कैसी? सब अन्दर की बात है।

- पता करने से हो गा क्या। बदल तो नहीं पाओं गी। या कुछ और इरादा है।

- राम राम, ऐसा कैसे सेाच सकती हो। बहु है मेरी।

- तो फिर इतनी जल्दी क्यो। महीनों की ही बात है। तुम तो नाम रखने की सोचो।

- नाम भी बेटा बेटी देख कर रखा जाता है।

- एक सलाह दूॅं। मानो गी।

- बताओ

- किसी ज्योतिषी से पूछ लो। वह सही सही बता दे गा। और कोई जोखिम नहीं।

- यह बात तो अच्छी कही तुम ने।

- बेटे की और बहु की कुण्डली ले जाना और हो सके तो अपनी भी।

- कौन सा ज्योतिषी सही हो गा।

- कोई भी हो। दक्षिणा ले गा और बेटा हो गा, बता दे गा। तुम भी खुश और वह भी खुश।

- और गल्त हुआ तो?

- कुछ रकम ही तो जाये गी। इतनी देर मन का चैन तो रहे गा।

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