मंगोल और चीन का निर्माण
- kewal sethi
- Jul 19
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मंगोल और चीन का निर्माण
शीर्षक चौंकाने वाला हो सकता है। मंगोल वर्तमान मंगोलिया के रहने वाले थे जो चीन से क्षेत्रफल में बहुत छोटा है। किस प्रकार मंगोल चीन के नवनिर्माण का श्रेय ले सकते हैं, इस पर संदेह व्यक्त किया ही जाये गा। परन्तु तथ्य तो झुटलाये नहीं जा सकते। इस कारण थोड़ा आगे चलना हो गा।
चंगेज़ खान एक साधारण कबीले का सदस्य था जिस की संख्या बहुत कम थी किन्तु उस को पूरी मंगोल जाति को एक सूत्र मे बॉंटने का श्रेय तो देना हो गा। राह आसान नहीं थी किन्तु एक लम्बे संघर्ष के पश्चात यह हो सका। पर चंगेज़ वहीं नहीं रुका, उस ने अन्य क्षेत्रों पर भी विजय प्राप्त की, इन में चीन को कुछ भाग भी शामिल था। जब वह मृत्यु को प्राप्त हुआ तो उस समय मंगोल साम्राज्य चीन के इस भाग के अतिरिक्त पश्चिम में कैस्पियन सागर तक् फैल चुका था। उस के बाद भी मंगोल साम्राज्य का विस्तार होता रहा। युरोप में हंगरी, रूस, पौलैण्ड इत्यादि देश उस में शामिल कर लिये गये। चंगेज़ खान के पोतों के समय साम्राज्य को चार भागों में बॉंट लिया गया। एक पौते हेलुगु ने बगदाद में खलीफा को हरा कर पूरे क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। उस के वंशज वहां पर सदियों तक शासक रहे। एक पौता तथा उस के वंशज रूस तथा लगे हुये क्षेत्र पर चार सौ साल तक शासन करते रहे। तीसरा पौता मूल स्थान मंगोलिया और आसपास के क्षेत्र के खान रहे। चौथे पौते कुभिलाई खान को चीन क्षेत्र का दायित्व मिला। चारों खान अपने अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र थे यद्यपि उन का आपस में वस्तुओं का लेन देन चलता रहता था। यहॉं तक कि जब उन का आपस में युद्ध होता था, उस बीच भी जो जिस के हिस्से का था, उसे मिलता रहता था।
खुभीलाई का क्षेत्र चीन के उत्तरी एवं पश्चिमी भाग में तथा तिब्बत के कुछ भाग में स्थित था। उस का सैनिक अनुभव सीमित था, इस कारण उसे अपने भाईयों जैसेी विजय तो नहीं मिल पाई परन्तु अन्य दृष्टि से वे योग्य था और उस ने अपने इलाके का प्रबन्ध अच्छे से कियां। उस ने चीन में एक नई राजधानी बनाई, अपने नाम भी चीनी जैसे रख लिये, और प्रशासन भी चीनी जैसा कर लियां। चीन के दक्षिण एवं पूर्वी भाग में सुंग राजवंश का राज्य था पर खुभिलाई उन से अधिक चीनी लगता था।
चीन सांस्कृतिक दृष्टि से एक था किन्तु प्रशासन की दृष्टि से एक नहीं रहा। उन के रीति रिवाज, पूज्य ग्रन्थ, एक थे पर एकता वहीं तक सीमित थी। खुभीलाई ने इस संस्कृति का अपना लिया। उस ने चीनी लोागों में प्रचार किया कि वह ईष्वरीय शक्ति से ही उन का शासक है। उस ने अपना नाम भी बदल कर चि-युआन कर लिया और अपने राजवंश का नाम ‘दा युवान’। उस ने एक मंदिर अपने पूवर्जों के लिये चीनी परम्परा के अनुसार बनवाया। मंगोल मृत्यु को चित्रित करने में विश्वस नहीं करते थे, इस कारण खुभिलाई स्वयं इस मंदिर से दूर ही रहा। परन्तु चीनी रिवाज के अनुसार घरों में पूर्वजों के नाम की पट्टिका रखने में कोई हर्ज नहीं था। उस ने अपने पूर्वजों के नाम चीनी तर्ज़ पर भी रखे तथा उन क नाम से मंदिर भी बनवाये। इस में चंगेज़ खान के पिता व माता यानि अपने परदादा येसुगई तथा परदादी होलून भी शामिल थे। उस ने पूर्वजों के चित्र भी चीनी स्टाईल में बनवा लिये।
खुभिलाई ने एक नई राजधानी जांगडू, जो पूर्व जरचड राज्य की राजधानी थी तथा जिसे चंगज़खान में 1215 ईसवी में विजित किया था, में बनाई। इस नये नगर में चौड़ी सड़कें थी जो पुरानी तंग एवं घुमावदार सड़कों से हट कर थी। सड़के इतनी चौड़ी थी कि नौ घुड़सवार इस पर एक साथ चल सकते थे। यह नगर ही आज का बीजिंग है। मंगोल जाति ने इस नगर का नाम खान बालिक रखा था और चीनी इसे दादू कहते थे। पुरानी राजधानी शांगदू गर्मियों की राजधानी रही परन्तु अन्य कार्य नई राजधानी में होता रहा।
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को देखते हुये भारत इटली, उत्तर अफ्रीका के व्यापारियों के लिये अलग अलग मौहल्ले बनाये गये। इन मौहल्लों मे सब तरह की सुविधा थी यहाँ तक कि वेश्याओं के लिये भी स्थान रखा गया। सही मायनों में यह विश्व की राजधानी थी।
इस नगर के बीचों बीच एक निषिद्ध लघु नगर था जो पूर्णतः मंगोल स्टाईल में था। इस में किसी विदेशी को जाने की अनुमति नहीं थी, चीनी जनता को भी नहीं। इस लघु नगर को शुद्ध मंगोल स्टाईल में बनाया गया। भवनों के स्थान पर गेर थे जो मंगोल तर्ज़ पर थें। इस लघुनगर में रहन सहन, लिबास, खेल कूद, मनोरंजन सभी मंगोल तरीके से ही था। प्रसव, शिक्षा इत्यादि सब उसी प्रकार के थे। खुभिलाई सहित मंगोल लोग बाहर चीेनी थे किन्तु इस लघु नगर में मंगोल।
जैसा कि पूर्व में कहा गया है खुभिलाई अधिक सफल सैनिक नहीं था पर उस में अन्य गुण थे कि किसी स्थिति में कैसे काम किया जा सकता है। इस में उस के प्रशासनिक सुधार उल्लेखनीय हैं। उस ने चीनी कानूनों को बदला तो नहीं पर उन में काफी संशोधन किये। एक तो उस ने कृषकों का उन की भूमि पर पूरे अधिकार मान लिया तथा उन पर लगाये गये कर कम कर दिये। व्यापार के लिये सड़कों की देख रेख बढ़ा दी।
दण्ड प्रक्रिया में विशेष सुधार कर उसे मानवीय बनाया गया। उस में मुत्युदण्ड को सीमित कर दिया गया। ऐसे अपराधों की संख्या को 233 से कम कर 135 कर दिया गया। उस में भी मृत्यु दण्ड कम ही दिया जाता था। वास्तव में उस के तीस साल के शासन के दौरान 2,500 से कम को मृत्यु दण्ड दिया गया। चार वर्ष तो ऐसे थे कि एक को भी मृत्यु दण्ड नहीं दिया गया। चीन में एक रिवाज था कि दोषी व्यक्ति के माथे पर उस का जुर्म गोद दिया जाता था। मंगोल जाति के लिये सिर तो आत्मा के निवास के लिये था, इसे विकृत नहीं किया जा सकता। अतः यह पद्धति समाप्त की गई। जहॉं चीनी रिवाज के अनुसार बहुत आवश्यक माना जाता था, वहां भी गोद केवल बाज़ू पर ही हो सकता था। जहां तक सम्भव था केवल अर्थदण्ड ही काफी समझा जाता था। थर्ड डिग्री के उपयोग को सीमित कर दिया कि जब तक पूर्ण विश्वास जुर्म का न हो जाये, यातना नहीं दी जा सकती थी। यातना देना आवश्यक भी हो तो केवल बेंत की पिटाई तक सीमित होती थी। दण्डित अपराधियों को पैरोल देने की परम्परा भी आरम्भ की गई जिस में अपराधी को महीने में दो बार पुलिस को रिपोर्ट करना होता था। चंगेज़ खान के समय में कानून को लिखित में करने का आरम्भ किया गया था जिसे खुभिलई ने और आगे बढ़ाया। इस की पहुॅंच आम आदमी तक भी पहुॅंचाई।
विभिन्न व्यवसायों में साहित्यक ज्ञान की चीनी पद्धति से हट कर व्यवसायिक ज्ञान के लिये स्तर बनाये गये। प्रशासनिक स्तर पर परीक्षा के माध्यम से व्यक्ति चुनने के स्थान पर स्थानीय समितियॉं बना कर प्रषासन को जनता के समीप लाने का प्रयास किया गया। इन समितियों में एक ही जाति के व्यक्ति न रख कर अलग अलग जातियों से सदस्य रखे गये। चीनी लोगों में दक्षिण तथा उत्तरी चीन के लोगों में से लिया गया। चंगेज़ खान की तरह जन्म की पहचान न कर योग्यता की पहचान रखी गई। खुभिलाई ने अवैतनिक कार्यकर्ताओ की अपेक्षा निश्चित वेतन पर कार्यकर्ता भी रखने आरम्भ किये। उस से उगाही के माध्यम से जीविका अर्जित करने पर रोक लगा दी गई। यह उल्लेखनीय है कि चीनी परम्परा वालों को समितियों के माध्यम से प्रशासन अजीब लगा। उन के विचार में यह अक्षम तथा प्रभावहीन तरीका था। मंगोल वर्चस्व हटते ही वह वापस अपनी परीक्षा के माध्यम पर लौट गये।
मंगोल साम्राज्य अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर ही टिका था। उन के विशाल साम्राज्य में अलग अलग प्रकार के सिक्कों का चलन था। इस कारण खुभिलाई ने कागज़ के नोटों का चलन आरम्भ किया। आरम्भ तो पहले से था पर उसे व्यापक रूप दिया गया। इस करैंसी को लेने से इंकार करने पर मौत की सज़ा थी। पर इस का होना ही काफी था और इस की आवश्यकता नहीं होती थी। कागज़ के नोट और मुक्त व्यापार में अक्सर दिवालियापन की स्थिति भी आ सकती थी। इसे स्वाभाविक माना जाता था। परन्तु इस सुविधा का दुपर्योग न हो, इस कारण तीसरी बार दिवालिया होने का मतलब मृत्यु दण्ड था।
शिक्षा के प्रसार की ओर भी ध्यान दिया गया। कई नई शालायें खोली गईं। 1269 में मंगोल भाषा विद्यालय खानबालिक में खोला गया तथा दो वर्ष पश्चात राष्ट्रीय विश्वविद्यालय खोला गया। अनेकानेक पुरानी पुस्तकोें को मुद्रित कराया गया। मंगोल साम्राज्य में अरबी, फारसी, उईघर, तारगुट, जरचड, तिब्बती, चीनी तथा अन्य कई भाषायें बोली जाती थी। रिकार्ड लेखन में इस से कष्ट होता था इस कारण तिब्बत के एक लामा फागसपा द्वारा निर्मित एक नई रचित लिपि को अपनाया गया। यह लिपि भारत की ब्राह्मी लिपि पर ही आधारित थी। चीनी लोगों ने इसे पसंद नहीं किया तथा मंगोल वर्चस्व के हटने पर पुरानी चित्रमय लिपि पर लौट गये।
सभी स्थानों की तरह चीन में भी किसानों का दर्जा नीचा ही रहता था। मंगोल शासन ने इस परमपरा में बदलाव लाया। पचास पचास घरों को एक समूह बनाया गया जिसे शे का नाम दिया गया। इस शे को स्थानीय कार्य जैसे भूमि को सुधारना, फसलें तय करना, सिंचाई का प्रबंध करना जैसे कार्य दिये गये। इस शे का एक काम किसानों के बच्चों को षिक्षा देना भी था। इस के लिये मंगोल शासन ने शालायें स्थापित कीं। इन शालाओं की संख्या 20,166 तक पहुॅंच गई। इन में साहित्यिक भाषा के स्थान पर स्थानीय बोलियों का प्रयोग किया जाता था। युरोप में इस के लगभग 600 साल बाद लोक शिक्षा का आर्विभाव हुआ।
शिक्षा के साथ साथ मनोंरंजन का भी प्रसार किया गया। पूर्व में नाटक केवल सम्भ्रान्त लोगों के लिये थे परन्तु अब उन्हें सार्वजनिक रूप दिया गया। 1275 में मंगोल साम्राज्य का पूरा इतिहास सैनिकों द्वारा कई भागों में प्रस्तुत किया गया जिस में हज़ारों लोग शामिल हुये। बताया जाता है कि उस काल में नाटक पर कोई सैंसर नहीं था। लगभग 500 नाटक इस अवधि में बनाये गये जिन में से 160 अभी भी विद्यमान हैं। यह स्पष्ट है कि पूर्व परम्परा के विरुद्ध संगीतज्ञों, नाटक के पात्रों को उच्च कोटि का दर्जा दिया गया। यह उल्लेखनीय है कि इन नाटकों में मंगोल परम्परा के अनुरूप खून खराबा को कोई भूमिका नहीं दी गईं यद्यपि कुश्ती, तीरअंदाज़ी इस में थी। न तो रोमन लोगों की तरह जानवरों को आपस में लड़ाया गया और न ही अभियुक्तों को जानवरों के सामने डाला गया। ज़िदा जलाने का तो प्रश्न ही नहीं था जो युरोप में उस समय आम बात थी।
इन सब सुधारों का प्रभाव यह हुआ कि चीनी लोगों ने मुंगोल शासन को मान्यता दी तथा इस के पक्ष में रहे। इन सुधारों से आस पास के लोग भी प्रभावित हुये। यद्यपि इस बीच सुंग राजवंश के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई जारी रही पर कोई बड़ा अभियान मंगोल तर्ज़ पर नहीं हुआ। अधिक महत्वपूर्ण यह हुआ के सुंग क्षेत्र तथा मंगोल क्षेत्र में प्रशासन की व्यवस्था में जो अन्तर था, उस कारण कई क्षेत्र स्वयं ही सुंग राज्य से अलग हो कर मंगोल साम्राज्य की शरण में आ गये। बहुत बड़ी विजय तो नहीं हुई पर कुछ क्षेत्र आते गये। इन आने वालों में कई सैनिक जनरल भी थे जिन के कारण ने क्षेत्र मंगोल राज्य की ओर आ गये। बायन नाम का मंगोल सैनापति काफी योग्य था और मंगोल राज्य के विस्तार के लिये प्रयासरत था। अन्त में 1276 में सुंग वंश की राजधानी हांगज़ाउ पर अधिकार कर लिया गया। बाकी छोटे छोटे क्षेत्र अगले कुछ वर्षों में मंगोल राज्य के अन्तर्गत आ गये। सुंग वंश के नये युवा राजा को तिब्बत में पढ़ने के लिये भिजवा दिया गया जहॉं वह समय पा कर साधू बन गया। ओर इस प्रकार सुंग राज्य खुभिलाई के शासन में पूर्ण् रूप से शामिल हो गया।
चीन अब न तो चीनी था ओर न ही मंगोल। वह दोनों का मिश्रित केन्द्र था। चीन के बाहर कोरिया में भी छोटे छोटे राज्यों के स्थान पर केन्द्रित शासन कायम किया गया। वियतनाम तथा थाई लैण्ड में भी चीनी या मंगोल वर्चस्व कायम हो गया। चीन पूरी तरह से एक हो कर मंगोल साम्राज्य का भाग बन गया। 1270 में सुंगवंश के राज्य समाप्ति के बाद लगभग नब्बे वर्ष तक मंगोल राज्य चीन में रहा। उस के पश्चत मिंग राजवंश का शासन आ सका।
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