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भावुकता के क्षण

भावुकता के क्षण

प्रतिक्रिया एक कहानी की

केवल कृष्ण सेठी


आज सुबह साढ़े तीन बजे नींद खुल गई और फिर आने का नाम नहीं ले रही थी। मन एक कहानी में उलझ गया। ‘मोहभंग’ नाम की यह कहानी व्यास जी की लिखी हुईं है और अक्षरा में प्रकाशित हुई है। इस के मुख्य पात्र एक इतिहास के प्राध्यापक हैं जो पाॅंच वर्ष पूर्व ही सेवा निवृत हुये हैं। उन की पत्नि कुछ वर्ष पूर्व ही चल बसी। एक मात्र लड़का अमरीका में हैं जिस की दो बेटियाॅं हैं। बहू भी भारत की है पर कम ही मिलती है, क्योंकि भाारत प्रवास के दौरान अपने पीहर भी जाना होता है।


एक बार तीन महीने के विज़ा पर अमरीका जाने की बात बेटे ने कही। बाद में मन लगे तो लम्बी अवधि का वीज़ा भी लेने की बात हुई।


अब शुरू होता हे वह अंश जिसे अंग्रेज़ी में टीयर जरकर कहा जाता है। बहू बेटे के लिये उन की फरमाईश पर काफी सामान ले गये थे और अपनी ओर से पोतियों के लिये उपहार। सप्ताहांत में पहुॅंचे। बहू दफतर में पार्टी में गई थी, बच्चियाॅं शैक्षिक टूर पर एक सप्ताह के लिये सुबह ही गई थी। खाली मकान मे, जो काशादा था, बेटा ले गया। शाम तक उस से बात की, फिर वह नाईट शिफ्ट की बात कह कर चला गया। बहू आई पर उस ने बात नहीं की। सीधे कमरे में चली गई। पूरे सप्ताह अकेले ही घर पर पड़े रहे। बेटा और बहू दफतर चले जाते थे। एक सप्ताह बाद जब बेटियाॅं आईं तो हाय ग्राण्डपा कह कर अपने कमरे में घुस गईं। बस इतना ही वार्तालाप हुआ। अगला सप्ताह भी ऐसा ही गुज़रा। न बहु ने, न पोतियों ने कोई बात की और बेटा तो व्यस्त था ही। सप्ताहांत में पिकनिक पर जाने की बात हुई पर ऐन समय पर उन की आयु का कोई व्यक्ति न होने की बात कह कर उन्हें घर पर अकेला छोड़ गये।


दो सप्ताह में ही लौट जाने की इच्छा व्यक्त की और किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। बहू ने पहले ही जब लम्बी अवधि की बात हुई तो दूसरा फ्लैट ले कर देने के लिये कह दिया था। दो दिन में ही अमरीका के उपहार तथा बहु के पीहर के लिये सामान आ गया। और विदाई हो गई।


मेरी उलझन इस बारे में थी कि ऐसी स्थिति में मेरी क्या प्रतिक्रिया होती। वैसे तो पूरी बात ही गल्त है। चाहे दादा से पहले न मिले हों पर थोड़ी उत्सुकता तो होती ही है। उपहार लेने की उत्सुकता। देश के बारे में जानने की उत्कंठा। चाहे कितना भी अमरीकी संस्कृति को ग्रहण किया हो पर उत्सुकता तो मानव स्वभाव है। अमरीका में भी जब दादा या नाना आते हैं तो हाय ग्राण्डपा कह कर कोई अपने कमरे में नहीं घुसता है। भारतीय बहु लम्बी अवधि के नाम से घबराती हो पर आते ही बात न करे, यह भारतीय संस्कार तो नहीं हैं। और फिर उस के लिये भी तो मैके से और अपनी ओर से उपहार लाये हैं। उन्हें उस के कमरे में पटकना भर तो नहीं होता। रात के खाने की मेज़ पर कुछ बात हो जाती है। इतिहास के प्राध्यापक हैं, कुछ मनारंजक बात तो सुना ही सकते हैं। एक लैपटाप हो तो कुछ लिखा भी जा सकता है। समय काटना इतना मुश्किल भी नहीं होता है। और भारत में भी तो अकेले ही रहते थे। समय कट ही जाता था।


कुल मिला कर बात जमी नहीं। एक बनावटीपन सा ही लगता रहा। इस से भी अधिक उदासी की कथा देखी है पर इतनी अटपटी नहीं लगी। एक कथा थी। माॅं अकेली रह गई थी। इकलौते बेटे ने सब जायदाद बेच कर उसे अमरीका साथ ले जाने की बात की। एअरपोर्ट भी पहुॅंच गये और तब बेटा उसे वहीं अकेली छोड़ कर अमरीका चला गया। न उस के पास पैसा, न मकान और न ही नगर में कोई जान पहचान (जो अटपटी सी बात है) पर फिर भी कथानक ऐसा चलता है कि अजीब नहीं लगता जो उबाउपन इस कथा में आ जाता है। यहाॅं तो आरम्भ से ही कुछ गल्त है, ऐसा लगता है।


अंतिम अटपटी बात - जब वापस स्वदेश आने लगे तो बहु ने चरण स्पर्ष किये। जब वह आये थे तो हाय भी नहीं कहा, पार्टी से लौट कर सीधे अपने कमरे में चली गई। अब इस पर क्या कहें।



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