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भारत का गौरवमयी बौद्धिक काल

भारत का गौरवमयी बौद्धिक काल


भारत में दर्शन की परम्परा अत्याधिक प्राचीन है। वास्तव में भारतीय मानस सदैव इस बारे में चिंतन करता रहा है कि वह धरती पर किस लिये है। जीवन क्या है तथा मृत्यु क्या है। दोनों में अन्तर तो स्पष्ट दिखता है परन्तु मृत्यु के पश्चात क्या होता है। वेदों में भी इस बारे में विचार किया गया था तथा उस के बाद उपनिषदों में इन विचारों को आगे बढ़ाया गया है। ऋषियों ने अपने अपने विचार उपनिषदों में लिखे हैं तथा इन्हीं से आगे चल कर दर्शन का प्रारम्भ हुआ है। यह दर्शन वेदों के तथा उपनिषदों के उपदेशों पर आधारित थे। लेकिन ऋषियों ने अपनी अपनी क्षमता, बुद्धि एवं ज्ञान के अनुसार इन की व्याख्या अलग अलग की है। इसी से दर्शन के कई रूप सामने आये। आम तौर पर इन पर आधारित पाँच दर्शन ही प्राथमिक माने गये हैं। यह हैं — मीमांसा, सांख्य, वैशेषिक, न्याय एवं वेदान्त।


आगे चल कर वैदिक कर्मकाण्ड के विरोध में नास्तिक दर्शनों में चार्वाक दर्शन, जैन दर्शन तथा बौद्ध दर्शन भी भारत में प्रचारित हुये। इन सब दर्शनों के अपने अपने ग्रन्थ हैं जिन में इन के पक्ष की विवेचना की गई है। इन सभी दर्शनों को एक स्थान पर प्रस्तुत करने की इच्छा से माध्वाचार्यप्रणीत सर्वदर्शन संग्रह की ओर ध्यान चला जाता है। इस में उन्हों ने सौलह दर्शनों की बात कही है। परन्तु यह सभी इतने व्यापक नहीं थे। इन में जो अधिक महत्वपूर्ण थे, उन के सम्बन्ध में कई पुस्तकें लिखी गई हैं। इस लेख में इन महत्वपूर्ण दर्शानों के बारे में जो साहित्य सामने आया उस का विवरण दिया ग्रया है। इन सभी दर्शनों में संसार की नियति, सृष्टि की रचना, मनुष्य मात्र का ध्येय, इत्यादि बातों पर विस्तार से विचार किया गया है। अपने अपने मतावलम्बी बनाने के लिये इन का प्रचार किया गया तथा इस हेतु अनेेकानेक पुस्तकें एवं टीकायें लिखी गईं। आपसी वाद विवाद के माध्यम से अपने मत का प्रसार करने का प्रयास किया गया।


इस प्रतियोगिता के कारण एक बहृत साहित्य इन दर्शनों के बारे में आस्तित्व में आया। इस लेख में इस विशाल साहित्य की हल्की सी झलक प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। इस से इस के विस्तार का थोड़ा आभास हो सके गा। ज्ञातव्य है कि यह दर्शन किसी व्यक्ति विशेष के नाम से प्रसारित नहीं हुये। इस में अपवाद चार्वाक दर्शन तथा बौद्ध दर्शन हैं। चावार्क दर्शन को लोकायत दर्शन भी कहा जाता है। बौद्ध दर्शन में कई शाखायें हैं जैसे शून्यवाद, विज्ञान वाद, स्थाविरवाद, सरस्वतीवाद इत्यादि। इन सब में भी अपने अपने साहित्य का सृजन हुआ। पर यह भी इतना विस्तृत था कि इस की झलक मात्र ही दी जा सकती है।


स्पष्टतः ही लेखकों तथा पुस्तकों की यह सूची पूर्ण नहीं है। पर जितनी एकत्र की जा सकी है, उस को प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी क्रम विशेष का अनुसरण नहीं किया गया है तथा इन का क्रम इन का महत्व प्रदर्शित नहीं करता है।


चूँकि आजकल हिन्दु धर्म की पहचान में वेदान्त का ही नाम सामने आता है। अतः सब से पूर्व हम वेदान्त दर्शन की बात को लेते है। इस में आगे कई भेद हैं। सब से प्रसिद्ध अद्वैत दर्शन है परन्तु द्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत इत्यादि भी वेदान्त दर्शन में शामिल रहते हैं। पहले हम अद्वैतवेदान्त की ही बात करते हैं।


अद्वैत वेदान्त

अद्वैत वेदान्त का नाम लेते ही शंकराचार्य का नाम लब पर आ जाता है। परन्तु अद्वैत वेदान्त के प्रथम क्रमबद्ध विश्लेषण उन के गुरू के गुरू गौड़पाद द्वारा किया गया था। उन की कृति का नाम है - मुण्डया कारिका जिसे कई बार गौड़पाड़ कारिका भी कहा जाता है। यह कारिका अन्य दर्शनों के साहित्य की भाँति प्रस्थानत्रय - उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, श्री गीता - पर आधारित है।


स्वयं शंकर द्वारा उन का दर्शन मुख्यतः बदरायण सूत्र पर टीका में प्रथम बार दर्शित होता है। परन्तु शंकर तथा गौड़पाद से पूर्व भी वेद में तथा उपनिषद में ब्रह्म के अद्वैत होने के बारे में कई बार बात की गई है। यह प्रज्ञापरमिता साहित्य का भाग है। भृतहरि की कृति वाक्यपद्यीय में भी इस का संदर्भ आता है।


अपने तीस वर्ष के जीवन में शंकर ने न केवल ब्रह्मसूत्र पर टीका लिखी वरन् कई उपनिषदों पर भी टीका लिखी। उन की एक कृति प्रपेक्षसारतन्त्र बताई जाती है जिस में शाक्त दर्शन की बात की गई है जो कि प्रारम्भिक काल की बताई जाती है पर जिस के बारे में संदेह है कि यह उन की कृति है।


अद्वैत वेदान्त दर्शन कोे बढ़ाने वालों में कई नाम सामने आते है। सब से प्रसिद्ध नाम हैं वाचस्पति (नौवीं शातब्दी), सर्वज्ञतमान (नौवीं शताब्दि), पदमपाद, प्रकाशतमान तथा श्रीहर्ष (बारहवीं शताब्दि), चितसुख (तेरहवीं शताब्दि), विद्यारण्य (चैदहवीं शताब्दि), मधुसूदन (सौलहवीं शताबिद), और अपया दीक्षित (सौलहवी्ं शताब्दि)। विद्यारण्य को माधवाचार्य के नाम से भी जाना जाता है। वह विजयनगर राज्य के सैनापति भी थे। उन की कृति पंचदासी, सदानन्द की वेदान्तसार, धर्मराज की वेदान्तपरिभाषा अद्वैत वेदान्त की तीन स्तरीय कृतियाँ मानी जाती हैं।


शंकर दर्शन के विरोध में वेदान्त देसिका की कृति शतदूषाणी का उत्त्लेख करनाा भी उचित हो गा जिस में उन के दर्शन के दोष बताये गये हैं। इन का उत्तर अनन्तकृष्ण शास्त्री ने अपनी पुस्तक शतभूषााणी में दिया है। विज्ञानभिक्षु ने सांख्य तथा योग पर भी अपने विचार व्यक्त् किये हैं परन्तु उन्हों ने आगे चल कर वेदान्तसूत्र पर भी अपनी टीका लिखी।


चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण भक्ति का उपदेश दिया। उन्हों ने स्वयं तो कोई रचना नहीं लिखी किन्तु उन के शिष्य बलदेव ने अठारहवीं शाताब्दि में वेदान्त सूत्र पर टीका लिखी। श्रीपति ऐसे ही एक और लेखक सौलहवीं शाताब्दि के थे जिन्हों ने शैव होते हुए भी वेदान्त सूत्र पर टीका लिख कर अद्वैत वेदान्त का पक्ष लिया। उन की चालीस से अधिक रचनायें हैं जिन में परमार्थशास्त्र तथा प्रत्यभिज्ञविमर्शनी अधिक महत्वपूर्ण हैं। कश्मीर शैव भी अद्वैत वेदानत का ही विकसित रूप है जिस में प्रमुख लेखक अभिनव गुप्ता दसवीं शताब्दि के थे परन्तु उन से पूर्व वसुगुप्त ने आठवीं शताब्दि में तथा उत्पाल ने दसवीं शताब्दि में ठस पर लिखा था। कई बार उन के मत को शैववेदान्त का नाम भी दिया जाता है। वसुंगुप्त की कृतियों के नाम हैं शिवसूत्र तथा स्पन्धकारिका जबकि उत्पाल की कृति प्रत्याभिज्ञसूत्र है। राजा भोज की कृति तत्वप्रकाश का उल्लेख करना भी उचित हो गा।


चावार्क दर्शन

चावार्क दर्शन का साहित्य अत्यन्त सीमित ही उपलब्ध हो पाया हैं। कहा जाता है कि उन के दर्शन का आरम्भ बृहस्पति द्वारा रचित वनस्पतिसूत्र से होता है जो उपलब्ध नहीं है। चार्वाक को उन का शिष्य माना जाता है। उन के लेख का अंश दूसरे दर्शनों के साहित्य में पाया जाता है। स्वयं इस दर्शन के बारे में एक पुस्तक तत्वोप्पलवसंहिता है जो जयऋषि भट द्वारा 1940 में प्रकाशित की गई थी। मज्जीमा निकाय में चावार्क मत के अजीत केश कम्बलियन का संदर्भ आता है जो इस मत के थे। शाँतारक्षिता की पुस्तक तत्वोसंग्रहं, जो 1864 में प्रकाशित हुई थी, में भी उन का वर्णन आता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि दूसरे दर्शनों में आये विचार एक पक्षीय हैं जो खण्डन की दृष्टि से ही लिखे गये थे जैसा कि माधवाचार्य की पुस्तक सर्वदर्शनसंग्रह में भी किया गया है।


मीमांसा दर्शन

मीमांसा का आरम्भ जैमिनी के मीमांसासूत्र के साथ हुआ। उन पर टीका शबर द्वारा चौथी शताब्दि में लिखी गई। मीमांसा में दो बड़े नाम कुमारिल और प्रभाकर के हैं जिन का कार्यकाल सातवीं और आठवीं शताब्दि के बीच बताया जाता है। प्रभाकर की टीका का नाम बहृति है और कुमारिल का श्लोकवार्तिका एवं तन्त्रवार्तिका। एक तीसरे प्रसिद्ध लेखक थे मुरारी मिश्रा परन्तु उस की कृति उपलब्ध नहीं है तथा केवल कुमारिल एवं प्रभाकर के लेख से उन का परिचय प्राप्त होता है। बहृति की एक टीका शालिकनाथ ने लिखी थी। उन्हों ने अपनी एक पुस्तक प्रकरणपंचिका भी लिखी थी। इस दर्शन की और भी कई पुस्तकें हैं जिन में पार्थसारथी मिश्रा (तेरहवीं शताब्दि) की पुस्तक शास्त्रदीपिका ओर आपदेव (सत्रहवीं शताब्दि) की मीमांसान्यायप्रकाशिका अधिक महत्वपूर्ण हैं।


जैन दर्शन

जैन दर्शन का वर्तमान स्वरूप चौबीसवें तीर्थंकर वर्घमान जी द्वारा प्रसारित किया गया यद्यपि इस का आरम्भ उन के अनुसार तीर्थंकर ऋषभ देव द्वारा किया गया था। वर्घमान जिन्हें महावीर भी कहा जाता है ने स्वयं इस के बारे में कुछ नहीं लिखा। वास्तव में इस बारे में प्रथम कृति दूसरी शताब्दि में कुंदकुदा आचार्य द्वारा रचित नियमसार तथा समयसार प्रतीत होती है। तीसरी शताब्दि में ऊमास्वाति (स्वामी) द्वारा तत्वार्थधिगमसूत्र (तत्वार्थसूत्र) द्वारा इस दर्शन के मूल तत्व ग्रन्थ रूप में संकलित किये गये थे। छटी शताब्दि में प्रभाकरचन्द्र द्वारा प्रमेयकमलमातान्दा तथा नौवीं शताब्दि में हरीभद्र की कृति सद्दर्शन समुच्चय महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। पहले की कुछ पुस्तकें अर्द्धमागधी (प्राकृत) में हैं तथा बाद की संस्कृृत में। बारहवीं शताब्दि में हेमचन्द्र की कृति अन्ययोगवाछेदिका तथा तेरहवीं शताब्दि में मल्लीसैना की पुस्तक स्यादवादमंजरी तथा अठारहवीं शताब्दि में यशोविद्या की पुस्तक जैनतर्कभाषा भी इस दर्शन को प्रस्तुत करती हैं।


बौद्ध दर्शन

बौद्ध दर्शन के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। स्वयं गौतम बुद्ध द्वारा केवल प्रवचन दिये गये हैं। कई विषयों जैसे ईश्वर, आत्मा इत्यादि पर उन्हों ने स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा। उन के अनुयायिओं ने इस सम्बन्ध में काफी कुछ लिखा है। इस में कितना उन के प्रवचन पर आधारित है तथा कितना लेखकों के अपने विचार हैं, कहना कठिन है। कठिनाई यह भी है कि बौद्ध मत कई धाराओं में हो कर बहता है। इन सब के अपने अपने ग्रन्थ हैं। पहले के ग्रन्थ पाली भाषा में हैं तथा बाद में संस्कृत को अपना लिया गया।


बौद्ध मत की दो मुख्य धारायें हैं - हीनयान तथा महायान। महात्मा बुद्ध के निर्वाण के पश्चात हुई परिषद में विनय नाम की रचना तैयार की गई थी। लगभग एक शताब्दि बाद आपसी मतभेद वाली व्याख्या के कारण दो धारायें बन गई - स्थाविरवादिन तथा महासंघिका। दूसरी महापरिषद में तिप्टिका तैयार की गई थी जिस के तीन भाग थे - विनय पतिका संघ के लिये, सुतापतिका - महात्मा बुद्ध के प्रवचन तथा अभिधम्मापतिका - दार्शनिक विषय। इस के अतिरिक्त बहुत सा सहित्य मिलिन्दपनहो, दीपावमसा, महावमसा, विसुद्धिमग्ग, तथा तिपतिका पर टीका पाली भाषा में है। यह सब हीनयान शाखा के ग्रन्थ हैं।


महायान का प्रथम ग्रन्थ अश्वघोष का महायानश्रद्धोत्पाद शास्त्र माना जाता है जिस में क्रमवार इस का दर्शन दिया गया है। मूलतः संस्कृत में रचित यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है तथा इस का आधार चीनी भाषा में अनुवाद को माना जाता है। बौद्ध मत की शून्यवाद शाखा में नागार्जुन द्वारा रचित ग्रन्थ मध्यमाकिाकारिका को मुख्य ग्रन्थ माना जाता है। नागार्जुन की अन्य कृतियाँ हैं रत्नावलि; तथा विग्रह-व्यवर्तिनी। अन्य शाखाओं के ग्रन्थ हैं - सदधर्मपुण्डारिका शास्त्र; अष्टासाशारिका। मुख्य लेखक हैं लंकावतार; आर्यदेव; चन्द्रकीर्ति; दिन्नागा। विज्ञानवाद शाखा के प्रवर्तक मैत्रेनाथ थे किन्तु उन के शिष्य असांगा का नाम अधिक लिया जाता है जिन्हों ने अपने गुरू से अधिक लिखा। उन के छोटे भाई वसुबन्धु का भी साहित्य में योगदान रहा। असांगा का ग्रन्थ है महायानभिघम्मासंगीतीशास्त्र। उस का दूसरा ग्रन्थ है महायानसूत्रलंकारशास्त्र। वसुबन्धु की कृतियाँ है अभिधम्माकोषा, तथा विज्ञप्तिमात्रातासिद्धी।


कुछ अन्य ग्रन्थों के नाम हैं - प्रमाणवार्तिका; प्रमाणवार्तिका स्ववृति; तत्वसंग्रह, पंजिका; लंकावतारसूत्र, विमशतिका; तथा शिवसिका।


जैसा कि पूर्व में कहा गया है, बौद्ध दर्शन की विभिन्न शाखाओं में साहित्य बहृत है तथा सब का विवरण देना सम्भव नहीं है। केवल मुख्य ग्रन्थ ही बताये गये हैं।


सांख्य दर्शन

सांख्य को प्राचीनतम दर्शन माना जाता है। इस का संदर्भ वेद तथा उपनिषदों - चान्दोग्य उपनिषद, प्रश्नोपोषिद, कठोपनिषद तथा श्वेताश्वेतोपनिषद - में आया है। श्री गीता में भी इस के बारे में कहा गया है। इस दर्शन का आरम्भ कपिल के सांख्यसूत्र से होना बताया जाता है पर इस की मूल प्रति उपलब्ध नहीं है। विज्ञानभिक्षु ने पंद्रहवीं शताब्दि में सांख्यसूत्र पर टीका लिखी थी किन्तु उस के बारे में संदेह है कि उसे भी मूल प्रति उपलब्ध थी। सांख्य में महत्वपूर्ण कृति ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका है।


विज्ञानभिक्षु ने अपने लेख में कपिल के अतिरिक्त दो और लेखकों के नाम लिये है - असुरी तथा पंचशिखा। गौड़पाद, जिन्हें अद्वैत वेदान्त के प्रणेता माना जाता है, ने सांख्यकारिकाभाष्य पुस्तक की रचना की है। इसी प्रकार वाचस्पति मिश्रा ने तत्व कौमुदी की रचना की है जिस में सांख्य सम्बन्धी जानकारी दी गई है।


योग दर्शन

योग दर्शन के मूल प्रवर्तक पतंजलि हैं जिन्हों ने योगसूत्र लिखे थे। इन पर एक टीका चौथी शताब्दि में व्यास द्वारा लिखी गई थी। इस टीका पर टीका वाचस्पति द्वारा नौचीं शताब्दि में लिखी गई थी। योगसूत्र पर और भी टीकायें हैं जिन में राजा भोज की दसवीं शताब्दि की टीका तथा विज्ञान भिक्षु की पंद्रहवीं शताब्दि की टीकायें अधिक महत्व वाली हैं।


न्याय

गौतम, जिन्हें अक्षापद भी कहा जाता है, न्याय दर्शन के प्रणेता थे। उन्हों ने न्याय सूत्र की रचना की। इस पर वात्सायन ने अपनी पुस्तक न्यायभाष्य में टीका की। इस टीका के ऊपर उद्योतकरा द्वारा अपनी वार्तिका में व्याख्या की जिस पर आगे वाचस्पति में तात्पर्यटीका नाम पुस्तक में टीका लिखी। उदयन की न्याय कुसुमाजलि तथा जयन्त की न्याय मंजरी भी इस दर्शन के महत्वपूर्ण अंग हैं।


न्याय दर्शन के न्यायसूत्र में तर्क विवेचन मुख्य है परन्तु इस की तत्व मीमांसा वैशेषिक दर्शन से मिलती जुलती है। इन का मिले जुले रूप नव न्याय का प्रारम्भ गणेश द्वारा अपनी पुस्तक तत्वचिंतामणि में किया गया। इस नव न्याय के अन्य प्रसिद्ध व्याख्याकार हैं वासुुदेव, रघुनाथ, मथुरानाथ, जगदीश तथा गधाधर।


वैशेषिक दर्शन

इस के आरम्भ करने वाले थे कणाद जिन्हें कणभुक, उलूक तथा कश्यप भी कहा जाता है। इन की पुस्तक का नाम वैशेषिकसूत्र है। इस पर विस्तृृत भाष्य पदार्थधर्मसंग्रह है जिसे प्रशस्त पाद ने पाँचवीं शताब्दि में लिखा था। उदयन तथा श्रीधर ने इस भाष्य पर से अपनी टीका लिखी है। न्याय दर्शन तथा वैशेषिक के मिले जुले रूप पर लेखक हैं लौमाश्गी भास्कर, विश्वनाथ तथा अन्नामभट्ट। उदयन की टीका का नाम है किरणवलि। उन्हों ने वाचस्पति के विचारों पर भी टीका लिखी है श्रीधर की दसवीं शताब्दि की कृति है न्यायमण्डली। वैशेषिक सूत्र पर एक अन्य टीका शंकर मिश्रा की उपसंहार नाम से है। दशपदार्थशास्त्र के नाम की एक और कृति का ज़िकर अंग्रेज़ी में अनुवादित एक पुस्तक में है परन्तु उस में लेखक का नाम नहीं दिया गया।


विश्ष्टिाद्वैत वेदान्त

हम ने इस लेख का आरम्भ किया था शांकर वेदान्त से। परन्तु इस के अतिरिक्त और भी वेदान्त के स्वरूप है। इन में एक है विशिष्टाद्वैत जिस के प्रणेता हैं रामानुजाचार्य। तमिल नाडु के अलवार संतजन द्वारा पंचरात्र में विशिष्टाद्वैत में उल्लेखित धारणा को व्यक्त किया गया था। इस दर्शन का आधार ऋगवेद के पृरुषसुक्त को माना जाता है। अलवार का अर्थ उस व्यक्ति से है जिस ने अपने को ईश्वर में समर्पित कर दिया हो। बारह अलवार की रचनाओं को नलयिरादिव्यप्रबंधम में संकलित किया गया है जिसे तमिलनाडु में पाँचवें वेद का दर्जा दिया गया है। इन बारह अलवार में सभी वर्णों के ऋषि थे जिन में एक महिला और एक राजा भी शामिल थेे। इन का कार्यकाल सातवीं से नौवी्ं शताब्दि का माना जाता है। विशिष्टाद्वैत को प्रथम बार ग्रन्थ रूप में प्रस्तुत करने वाले थे नाथमुनि जिन कर रचना थी न्यायतत्व। उन के पौत्र युमनाचार्य ने सिद्धीत्रय में इस की आगे व्याख्या की।


परन्तु रामानुजचार्य को इस मत का प्रणेता माना जाता है क्योंकि उन्हों ने इस को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। रामानुजचार्य ने अपने मत का प्रतिपादन श्रीभाष्य में किया जो ब्रह्मसूत्र पर भाष्य है। इस के अतिरिक्त उन्हों ने गीताभाष्य, विचारसार, वेदान्त दीप, गद्यत्रय तथा वेदार्थसंग्रह की रचना भी की। उन के शिष्य सुदर्शन सूरी ने श्रीभाष्य पर श्रुतप्रकाशिका के नाम से टीका लिखी। वैंकटनाथ, जिन्हें वेदान्तशिखा भी कहा जाता है, ने तत्ववाटिका के नाम से श्रीभाष्य पर टीका लिखी। उन्हों ने अद्वैतवेदान्त के दोष बताने के लिये शतदूषानि नामक रचना भी की। मेघनाद्री की न्यायद्युमनि; लोकाचार्य की तत्वत्रय; श्रीनिवास की यतिन्द्रमातादीपिका इस मत के दूसरे महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं।


द्वैत वेदान्त

अद्वैत वेदान्त के विरोध में माधवाचार्य द्वारा द्वैतवेदान्त का प्रचार किया गया। उन्हों ने सैतीस पुस्तकें लिखी है जिन में ब्रह्मसूत्र पर माधवभाष्य; अणुव्याख्यान; गीताभाष्य; भागवत तात्पर्य निर्णय; महाभारत तात्पर्य निर्णय; विष्णुतत्व निर्णय; तथा तत्वउद्यता अधिक महत्वपूर्ण हैं। उन के शिष्य जयतीर्थ ने तत्वप्रकाशिका के नाम से माधव के माधवभाष्य पर टीका लिखी। उन्हों ने अणुव्याख्यान पर टीका न्यायसुधा के नाम से लिखी। उन का एक अन्य ग्रन्थ प्रमाणपद्धति है। व्यासतीर्थ नाम के अन्य अनुयायी की तात्पर्यचन्द्रिका, न्यायाम्त, एवं तर्कताण्डव तथा एक अन्य अनुयायी रामाचार्य द्वारा न्यायामृृत पर तरंगिनी नामक टीका भी महत्वपूर्ण हैं।


शुद्धाद्वैत

इस के प्रणेता वल्लभ हैं। उन की ब्रह्मसूत्र पर भाष्य अणुभाष्य कहलाता है। श्री गीता पर उन का भाष्य का नाम सुबोधिनी है। उन के लड़के विðलनाथ ने इसी विषय पर विद्वानमण्डन की रचना लिखी है। अणुभाष्य पर पुरुषोत्तम ने भाष्यप्रकाश नाम के ग्रन्थ में टीका लिखी है और उस पर गोपेश्वर ने रश्मी नाम की पुस्तक में टीका लिखी है। गोपेश्वर ने सुबोधिनी पर भी टीका लिखी है। विद्ववानमण्डन पर उन की टीका सुवर्धसूत्र कहलाती है। गिरिधर की पुस्तक शुद्धाद्वैतमाटण्ड तथा बालकृृष्ण भट की प्रमेयरत्नारणव इस दर्शन की अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें हैं।


द्वैताद्वैत

इस के प्रणेता निम्बार्क थे जिन का कार्यकाल पंद्रहवीं शताब्दि था। उन्हों ने ब्रह्मसूत्र पर एक संक्षिप्त सी टीका वेदानतपारिजातसौरभ के नाम से लिखी है। उन की अन्य कृतियाँ हैं - दशश्लोकी, श्रीकृष्णावतारज, तथा माधवमुखमर्दन। श्रीनिवास ने अपनी कृति वेदान्तकौतभ में उन के भाष्य पर टीका लिखी है तथा इस टीका पर केशव कश्मीरी ने कौस्तुभप्रभा में टीका लिखी है। पुरोषत्तम ने अपनी कृति वेदान्तरतनमंजूषा में दशश्लोकी पर तथा श्रुतसुयन्तसुरद्रुमा ने सतावराज पर टीका लिखी है। इस दर्शन की एक और पुस्तक परापक्षगिरिवज्र माधव मुकन्द द्वारा रचित है जिस में शंकर के अद्वैत पर टिप्पणी की गई है।


उपसंहार

उपरोक्त सूची पूर्ण है, ऐसा दावा करना असम्भव है। यह काल बौद्धिक उत्सर्ग का काल था जहाँ पर प्रत्येक विद्वान अपने मत के बारे में व्याख्या करता था तथा दूसरे मत के दोष को उजागर करता था। इस पूरे काल में कहीं ऐसा देखने को नहीं आया कि किसी ऋषि द्वारा किसी शक्तिशाली राजा को अपनी ओर कर लिया जाये तथा दूसरे सभी दर्शन पर पाबंदी लगाने का प्रयास किया हो। सभी दर्शन साथ साथ पनपे।ं इस में उन्हों ने एक दूसरे के विचार ग्रहण भी किये। विपरीत टिप्पणी देखते हुये अपने विचारों में संशोघन भी किया। इन सब पर टिप्पणी करना उस दर्शन का पूरा इतिहास बताना हो गा जो अभी का विषय नहीं है। कहा जाता है कि शंकर ने बौद्ध मत के शून्यवाद सिद्धाँत को वेदान्त के अनुरूप धारित किया। इसी प्रकार के उदाहरण और भी मिल जाये गे। एक नदी थी जो बह रही थी या कई नदियाँ एक साथ बह रही थीं और इन से पूरे वातावरण की जलवायु प्रभावित थी। यही भारत की परम्परा रही है, यही इस का गौरव रहा है तथा यही इस की शक्ति रही है।


निवेदन

1- कई नाम अंग्रेज़ी में प्रकाशित पुस्तकों से लिये गये हैं। यह स्वाभाविक है कि इन के नाम में वर्तनी की कुछ त्रुटि रह गई हो। कृपया इस के बारे में अवगत करायें।

2- यदि इस काल के किसी ग्रन्थ का नाम पाठक को विदित हो जो छूट गया है तो बताने का कष्ट करें ताकि इसे शामिल किया जा सके।

3- उपरोक्त लेख में केवल दर्शन की बात की गई है। इस के अतिरिक्त अन्य विषयों- आयुर्वेद, गणित, खगोल विद्या, विज्ञान, नाटक, इत्यादि विषयों पर सृजित साहित्य को शामिल नहीं किया गया है जिस का अपना अपना गौरवमयी इतिहास है।

4- इसी प्रकार वैदिक काल एवं उपनिषद काल को भी शामिल नहीं किया गया है। न ही महाकाव्य एवं पुराणों इत्यादि को शामिल किया गया है। केवल सीमित काल में दर्शन सम्बन्धित लेख का ही अध्ययन किया गया है।


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