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प्रौढ़ शिक्षा, साक्षरता तथा सभ्य समाज

प्रौढ़ शिक्षा, साक्षरता तथा सभ्य समाज

केवल कृष्ण सेठी

मई 2021

प्रौढ़ शिक्षा सामुदयिक विकास खण्ड के दिनों से ही किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है। पहले इसे सामाजिक शिक्षा के नाम से जाना जाता था। उस केे बाद इसे प्रौढ़ शिक्षा का नाम दिया गया। इस से आगे बढ़ कर इस ने अनौपचारिक शिक्षा का रूप धारण किया। इसे फंकश्नल लिट्रेसी functional literacy अर्थात ‘उपयोगी साक्षरता’ का नाम भी दिया गया। इस के लिये राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना हुई। राजीव गाँधी मिशन की स्थापना हुई। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन स्थापित हुआ और फिर 2009 में इसे साक्षर भारत का नाम दिया गया। प्रौढ़ शिक्षा सब स्थानों पर थी और कहीं भी नहीं थी। सरकार पूरी तरह से इस के लिये कृतसंकल्प थी और पूर्ववत निष्क्रिय थी। अब इस का नाम परिवर्तित कर जीवनपर्यन्त शिक्षा कहा जाने लगा है पर इस से कितना अन्तर पड़ने वाला है, यह भविष्य के गर्भ में है।


इस के लिये कई बार अभियान चला कर निरक्षरता समाप्त करने का संकल्प व्यक्त किया गया। संविधान निर्माताओं ने 14 वर्ष तक शिक्षा को अनिवार्य करने का प्रावधान निर्देशक सिद्धाँतों में किया। प्रधान मंत्री श्री मोरार जी भाई ने दस वर्ष में पूर्ण साक्षरता प्राप्त करने का लक्ष्य दिया था। इसी तरह अन्य शासन काल में भी संकल्प व्यक्त किये जाते रहे हैं। पर परिणाम आशानुकूल नहीं रहे। 7 अगस्त 2017 का शिक्षा मन्त्री जी ने घोषणा की कि वर्ष 2021 तक निरक्षरता समाप्त हो जाये गी। वर्ष 2021 तो आ गया है परन्तु स्थिति में विशेष परिवत्रन तो दिखाई नहीं देता। गत सत्तर वर्ष से कई प्रकार के अभियान चलाये जा रहे हैं जो पूर्व के ही प्रयासों का किंचित परिवर्तित रूप रहे। पर इन सब से अपेक्षित लाभ नहीं हो पाये।


वर्ष 2009 में प्रारम्भिक शिक्षा को निर्देशक सिद्धाँत से अधिकार वर्ग में लाया गया तथा इस के बारे में कानून बनाया गया। तीन वर्ष का समय दिया गया। दो वर्ष तो शिक्षा मन्त्रालय ने आकर्षक प्रगति प्रतिवेदन मुद्रित करवाये तथा बटवाये। फिर बात पुरानी हो गईं। 2014 में नई सरकार आई तो नई शिक्षा नीति की बात भी हुई। आखिर वह भी अपने समय पर आ ही गई भले ही कुछ समय लगा। इस में वर्ष 2040 तक भारत के लिए एक ऐसी शिक्षा प्रद्धति का लक्ष्य रखा गया है जो कि किसी से पीछे नहीं हो, एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था जहां किसी भी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले को शिक्षार्थियों को समान रूप से सर्वोगुणवत्ता की शिक्षा उपलब्ध हो। निरक्षरता तो समाप्त हो ही जाये गी।


प्रौढ़ शिक्षा के लिये जो कार्यक्रम चलाये जाते रहे, उन के स्वरूप में समय समय पर परिवर्तन होता रहा। आरम्भ में यह पूर्णतः शासकीय कार्य था। वर्ष 1988 में जब राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की शुरुआत की गई थी तो यह मुख्यतः लोगों की स्वैच्छिक संस्थाओं की भागीदारी और सहयोग पर आधारित था। महिलाओं के लिये महिला सामख्या योजना विशेष रूप से क्रियान्वित की गई जिस के फलस्वरूप 1991-2011 के दौरान महिलाओं के बीच साक्षारता सहित सम्पूर्ण साक्षरता में उल्लेखनीय वृद्धि बताई जाती है और दावा है कि समकालीन सामाजिक मुद्दों पर चर्चा और विचार विर्मश भी शुरू हआ। श्रमिक विद्यापीठ का शुभारम्भ किया गया जिसे बाद में वर्ष 2000 में जन शिक्षण संस्थान का नाम दिया गया।


एक बार फिर संकल्प दौहराया गया है कि प्रौढ शिक्षा के लिए सुदृढ एवं नवाचारी सरकारी पहलकदमियों, खासकर समुदाय की भागीदारी को सुगम बनाना तथा प्रौद्योगिकी के सुचारु और लाभकारी एकीकरण को जल्द से जल्द लागू किया जाए गा ताकि 100 प्रतिशत साक्षरता के सब से महत्वपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति शीघ्र हो सके।

इन सब बातों के होते हुये भी यह अभियान अधिक सफल नहीं कहा जा सकता। इसी कारण आज भी संसार के सब से अधिक अनपढ़ इस देश में हैं। इस समय मैक्रोट्रैण्ड नाम की संस्था द्वारा प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार भारत में पंद्रह वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्तियों में साक्षरतादर वर्ष 2011 के 69.30 प्रतिशत के आँकड़े से बढ़ कर वर्ष 2018 में 74.37 प्रतिशत हो गई थी। यह आँकड़े आकर्षित लगते हैं पर यदि बढ़ती हुई जनसंख्या को देखें तो निरक्षरों की संख्या अभी भी 24.21 करोड़ है अर्थात इस आयु समूह का 30.7 प्रतिशत। हर तीन व्यक्तियों में से एक निरक्षर है। इस में वह व्यक्ति शामिल नहीं हैं जो साक्षर तो बने थे किन्तु अभ्यास के अभाव में पुनः निरक्षर हो गये।

कहा जाता रहा है कि पैसे की कोई कमी नहीं है। राजीव गाँधी मिशन, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन इत्यादि के माध्यम से पैसे की व्यवस्था हो रही है। पर इन में उस वस्तु का अभाव है जो किसी अन्दोलन को सफल बनाता हैं। महात्मा फुले, ईश्वर चन्द्र्र विद्यासागर, मदन मोहन मालवीय, महात्मा हंस राज जैसे शुद्ध अन्तःकरणों का अभाव है। रामकृष्ण मिशन, दयानन्द ऐंग्लोवैदिक शिक्षा समिति जैसे संगठनों का अभाव है। एक समय था जब किरोड़ी मल, रामजस, जैसे सेठ शिक्षा के प्रसार में अग्रणीय थे। धार्मिक प्ररेणा के लोग हिन्दु कालेज के साथ साथ इस्लामिया कालेज, खालसा कालेज, सनातनधर्म कालेज, डी ए वी कालेज भी चलाते थे। शिक्षा के प्रसार में इन संस्थानों का महान योगदान है। इन सब को निरुत्साहित किया गया। कोई शैक्षिक संस्था किसी व्यक्ति के नाम से नहीं होना चाहिये, यह निर्णय लिया गया। धर्म का तो नाम लेना ही वर्जित हो गया।


आज इन दानदाताओं का स्थान पब्लिक स्कूलों ने ले लिया है जो कहलाते तो पब्लिक स्कूल है पर हैं केवल निजी लाभ के साधन। इन के साथ साथ ही कोचिंग कक्षाओं, निजी टयूशनों की भी भरमार हो गई है। जैसे जैसे बी एड प्रशिक्षित अध्यापकों की संख्या बढ़ती गई, शिक्षा के स्तर में गिरावट आ़ती गई। जैसे जैसे पी एच डी वाले आते गये वैसे वैसे महाविद्यालयों में शिक्षा के प्रति नज़रिया बदलता गया। पहले शिक्षा तथा विद्या को पवित्र मानने वालों अध्यापकों का बहुमत था। अब पैसे को महान मानने वालों का ज़माना है।


यही प्रवृति प्रौढ़ शिक्षा में भी देखी गई। सम्भवतः इस कारण ही प्रौढ़ शिक्षा के स्वरूप में भी परिवर्तन आता गया। सरकारीकरण में एक सब से बड़ी दिक्कत यही होती है। जब किसी कार्य को केवल वेतन से तोला जाता है तो उस से उकताहट भी जल्दी होती है। फिर इस उकताहट से उभरने के लिये इस में विविधता पैदा करने का प्रयास किया जाता है। कुछ इस का प्रभाव था और कुछ विदेशी अन्दोलनों का प्रभाव। यह जाना माना तथ्य है कि भारत में उस अधिकारी को सफल माना जाता था जिसे विदेश भ्रमण के अवसर प्राप्त होते हों। नेताओं के लिये भी यह उपलब्धि थी, और अशासकीय संस्थाओं के लिये भी। विदेशों से सीखने को बहुत कुछ मिल सकता है और वहाँ से सहायता भी खुले दिल से प्राप्त हो सकती है। पर उस का लाभ समाज को तभी मिल सकता है जब उस को राष्ट्रीय संदर्भ में ढाल कर अपनाया जा सके। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो पाया। इन विचारों को ज्यों का त्यों अपना लिया गया। ब्राज़ील के एक अन्दोलन के प्रभाव में हम ने साक्षरता को केवल साक्षरता न मान कर सामाजिक चेतना के लिये अन्दोलन मान लिया। वास्तव में इस में साक्षरता गौण मानी जाती है। इस अन्दोलन के लक्ष्य बहुत उच्च हैं अेौर उस के विरुद्ध कुछ भी नहीं कहा जा सकता है पर अन्दोलन शासकीय अधिकारियों द्वारा नहीं चलाये जा सकते, इस तथ्य को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता।


प्रौढ़ शिक्षा इस चक्कर में गम्भीर विषय न हो कर एक प्रतीकात्मक उपलब्धि बन गई। इस के लिये ऐसे तरीके डूँढे गये जिस में प्रचार पक्ष उजागर हो सके। कहीं पुतलियों के माध्यम से तो कहीं प्रभात फेरियों के माध्यम से तो कहीं रात को मशालों के जलूस के माध्यम से प्रचार में हम लग गये। कहीं हम ने संगोष्ठियाँ करना शुरू की तो कहीं प्रदर्शिनियों का आयोजन किया। कहीं एन एस एस के सदस्यों को इस में लगाया तो कहीं इसे एन सी सी कैडट के लिये आवश्यक कार्य बताया। कहीं ‘ईच वन टीच वन’ का नारा दिया तो कहीं ‘एक एक पाँच पाँच को पढ़ाये’ की बात की। कहीं हम ने इस में वैज्ञानिक मनोभाव scietific temper को लाने का प्रयास किया तो कहीं सामाजिक क्राँति लाने का साधन मान कर इस की तारीफ की। कहीं पर्यावरण से इसे घेरना चाहा तो कहीं राष्ट्रीय एकता का लबादा पहनाना चाहा। इन सब में अपने में कुछ गलत नहीं है पर इन में किसी एक को ही प्रौढ़ शिक्षा मान लेना मौलिक गल्ती थी। परिणाम यह हुआ कि अन्दोलन बिखर कर रह गया। उस से अपेक्षित लाभ नहीं हो पाये।


और फिर इस सब की असफलता को छुपाने के लिये कारण बताये गये या तराशे गये। यह कहा गया कि गरीबी प्रौढ़ शिक्षा कक्षाओं में लोगों के आने में बाधक है। यह कहा गया कि जनसंख्या का बढ़ना ही इस का कारण है। यह ऐसे कहा गया जैसे जनसंख्या नियन्त्रण का कोई सम्बन्ध प्रौढ़ शिक्षा से न हो। क्या वास्तव में इन का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। क्या गरीबी से भी प्रौढ़ शिक्षा का कोई सम्बन्ध है। क्या वियतनाम एक सम्पन्न देश था जो उस की साक्षरता दर (15 वर्ष से अधिक आयु समूह में) वर्ष 2018 में 95 प्रतिशत थी। मलेशिया की 94. 85 प्रतिशत; श्री लंका की 91. 71 प्रतिशत। यह सब अपने साथ या अपने बाद ही तो स्वतन्त्र हुये थे।


साक्षरता क्या है? इस के बारे में विचारों में परिवर्तन होता रहा है। भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान ने 1967 में ‘साक्षरता की प्रथम सीढ़ी’ के नाम से यूनैस्को की पुस्तिका ABC of literacy का अनुवाद प्रकाशित किया था। इस में प्रश्न पूछा गया था ‘क्या साक्षरता तथा पढ़ने लिखने में कोई अन्तर है?’ फिर उत्तर भी दिया गया था ‘हाँ। शिक्षा के कुछ विद्वान अब यह मानने लग गये हैं कि .....साक्षर व्यक्ति पढ़ने लिखने की अपनी योग्यता का सरलता से उपयोग कर सके।’


भारत सरकार के 1971 में प्रौढ़ शिक्षा संस्थान के एक प्रकाशन (क्रमाँक 27) में कहा गया ‘अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में इस बात की आवश्यकता महसूस की गई कि सतत तथा समन्वित सामान्य शिक्षा के साथ साथ श्रमिकों तथा मध्यवर्गीय कर्मियों के व्यवसायिक प्रशिक्षण का भी प्रयास किया जाना चाहिये। इस आधार पर बहुपक्षीय पहल श्रमिकों तथा कर्मियों के शिक्षण तथा प्रशिक्षण के लिये भी किया जाना चाहिये।’


1979 में सर्वोदय शिक्षा समिति ग्वालियर द्वारा प्रकाशित पुस्तिका में कहा गया है ‘अभावों, अन्यायों और शोषण में पल रहे आदमी में चेतना जगाने का कार्यक्रम ही प्रौढ़ शिक्षा है।’


दिसम्बर 2000 में मध्य प्रदेश प्रौढ़ शिक्षा संघ के उदघाटन के समय प्रकाशित पुस्तिका में श्री वी डी मेहता का कथन है ‘स्पष्टतः ही सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये हमें संवेदनशील लोक शिक्षा की कार्यात्मक तथा अनौपचारिक पद्धति को अपनाना होगा।’


इस प्रकार साक्षरता या प्रौढ़ शिक्षा की कोई एक परिभाषा नहीं है। पर देखा जाये गा कि और सब कुछ दिखता है, परन्तु साक्षरता इन में कहीं दिखती नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि विभिन्न व्यक्तियों द्वारा जो लक्ष्य बताये गये हैं वह प्रासंगिक तथा आवश्यक नहीं हैं। उन में से हर एक अपने स्थान पर सही है पर क्या यह सब एक साथ प्राप्त किया जा सकता है। क्या मौलिक परिभाषा कि अक्षर ज्ञान का सरलता से उपयोग ही सब को सम्मिलित नहीं कर लेता है। या क्या इन्हें एक साथ प्राप्त करना आवश्यक है। क्या साक्षरता के भी स्तर होते हैं या होना चाहिये। क्या यह सब उपलब्धियाँ क्रमवार प्राप्त नहीं हो सकती।


इस में कहीं किसी शक की गुँजाईश नहीं है। शिक्षा की अन्य उपलब्धियाँ भी क्रमशः ही प्राप्त होती हैं। सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए ही शिखर पर पहुँचा जा सकता है। कदम कदम चलते हुए ही मंज़िल प्राप्त होती है। सब से अधिक कठिनाई पहले कदम में ही होती है। इसे पार कर लिया जाये तो शेष रास्ता आसान रहता है। सब से अधिक कठिनाई उस अध्यापक को होती है जो यह समझ नहीं पाता कि छात्र को अथवा श्रोता को वह बात क्यों समझ नहीं आ रही जो उस के विचार में पूर्णतः सरल तथा सहज है। वह ऊँचाई को पा चुका है और उस की अपेक्षा है कि कि छात्र भी उस तक पहुँच जाये। जब छात्र वहाँ तक नहीं पहुँच पाता तो अध्यापक हताश हो जाता है। यही हाल हमारे कुछ शिक्षाविदों का भी है। वह इन सभी लक्ष्यों को एक साथ पा लेना चाहते हैं जो वह उचित समझते हैं। चाहे वह सामाजिक न्याय की बात हो, वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो, कार्यकुशलता हो, चैतन्य जागृति हो अथवा कोई अन्य। पर यह शिक्षार्थी के प्रति न्याय नहीं है। एकदम किसी पर बोझ लाद दिया जाये तो वह गति नहीं पकड़ पाये गा। घीरे धीरे सीखने से तथा गति बढ़ाने से उपलब्धि अधिक हो सके गी। उस से भी अधिक उचित यह होगा कि उसे स्वयं अपना रास्ता डूँढने की सुविधा दी जाये। श्री गीता का कथन है ‘सा विद्या या विमुक्तये’। दूसरों पर आश्रय को समाप्त करना ही विद्या का ध्येय है। यह बात साक्षरता पर भी लागू होती है। इस कारण जैसा कि यूनैस्को ने कहा था कि अक्षरज्ञान से प्रशिक्षार्थी को सहज एवं सरल ढंग से आगे बढ़ना चाहिये। शेष गौण है तथा इस अक्षर ज्ञान पर आधारित है। पूर्वाग्रह उचित नहीं है कि यदि किसी ने राष्ट्रीय स्वतन्त्रता अन्दोलन अथवा पर्यावरण इत्यादि के बारे में नहीं सीखा है तब तक उसे साक्षर नहीं माना जा सकता। यह धारणा गलत है। यदि कोई व्यक्ति केवल अपने अधिकारों के बारे में पढ़ सकता है और अपने को दिये गये अभिलेखों का अध्ययन कर समझ सकता है तो वह साक्षरता की सीढ़ी पर चढ़ना शुरू हो गया है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि उस की रुचि बनी रहे और वह निरक्षरता की ओर न लौटे।


यहाँ पर यह कहना उचित हो गा कि विशेषज्ञों में अन्य को कमतर मानने की परम्परा है। ग्रामवासियों के लिये गंवार शब्द का इस्तेमाल सामान्य है। यह धारणा सिरे से ही गल्त है। किसान को यह मालूम है कि कौन सी फसल कब बोई जाना है। कब खर पतवार से उस की रक्षा करना हो गी। यह बातें नगरवासी नहीं जानता पर इस के लिये नगरवासी को पिछड़ा हुआ नहीं माना जाता। यह मान कर चला जाये कि निरक्षर को भी संसारिक बातों का ज्ञान है। कमी केवल साक्षरता की है। इसी संदर्भ में यह भी देखने को आया कि भाषा की तथाकथित शुद्धता पर नगरवासियों का ज़ोर कुछ अधिक ही रहता है। कृष्ण का यदि कोई किशन कहता है तो उसे ऐसा लगता है कि दूसरे को भाषा का ज्ञान नहीं है। यह मान्य नहीं किया जाता कि भाषा के कई रूप हो सकते हैं। साहित्यक रूप तथा आम बोल चाल के रूप में अन्तर होता है।


हमारे विचार में साक्षर होने के लिये लिखने का ज्ञान होना भी आवश्यक नहीं है। केवल पढ़ना आ जाये तो वह भी काफी है। एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा देखना हो गी। पढ़ने की कला का सहज प्रयोग भी काफी माना जाना चाहिये। महाजन अपनी पुस्तक में ऋण की राशि कितनी लिख रहा है, यदि यह ऋण लेने वाला पढ़ सकता है तो उस से भी शोषण में कमी आ सकती है। बैंक में व्याज दर क्या है, यह जान लेना भी उपलब्धि है। जहाँ तक ठगे जाने की बात है तो विद्यावान भी ठगे जाते हैं। उस से बचने के लिये साक्षर होना काफी नहीं है। दूसरी बातें भी उस में निहित हैं।


पर सब से बड़ी बात यह है कि इन सफलताओं को समारोहों तथा संगोष्ठियों में तर्क वितर्क का विषय न बनाया जाये। उच्च विचार व्यक्त कर इन कम स्तर की प्राप्तियों को नकारा न जाये। साक्षरता को जानकारी के समकक्ष मानने की ज़िद छोड़ दी जाये। एक केवल ज्ञान है दूसरी पढ़ने की कला है। साक्षरता जानकारी की दिशा में एक कदम हो सकता है पर केवल जानकारी साक्षरता की ओर नहीं ले जा सकती। उस के लिये आज के युग में और भी साधन हो सकते हैं। इस बात को मान्य किया जाना चाहिये।


यहाँ पर प्रश्न उठता है कि शासन की इस में क्या भूमिका होगी। यह सभी पक्षों द्वारा मान्य किया जाये गा कि प्रशासन एक अवैयक्तिक संगठन है। इस में मनुष्य की महत्ता नहीं होती, लक्ष्यों की होती है, संगठन की होती है। प्रशासन स्वयं में स्वतन्त्र भी नहीं है। वह अशासकीय संगठनों की तरह त्वरित गति से निर्णय लेने में सक्षम नहीं है। उस का निर्णय केवल आज के संदर्भ में ही नहीं देखा जाता है। उसे भविष्य में भी कसौटियों पर पूरा उतरना चाहिये। प्रशासन केवल संगठनात्मक स्तर पर ही निर्णय ले सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहींे है जिस में किसी अधिकारी को अपने निर्णय के बारे में न्यायालय के समक्ष, महालेखापरीक्षक के समच या किसी आयोग के समक्ष अथवा फिर किसी अन्य समिति के समक्ष अपने निर्णय को सही ठहराने का प्रयास करना पड़ा हो। इस कारण उस का निर्णय न केवल सही होना चाहिये वरन् उस का पूरा विवरण भी होना चाहिये। उस के निर्णय को पश्चातवर्ती ज्ञान के आधार पर गलत या अनावश्यक ठहराने वालों की कमी भी नहीं है। उस समय की परिस्थितियों का ज्ञान नस्ती में ही होना चाहिये। इसी कारण शासकीय अधिकारी द्वारा निर्णय लेते समय विभिन्न पहलुओं पर विचार करना पड़ता है तथा उन्हें अभिलेख में लाना पड़ता है जो अशासकीय व्य७ियों को अटपटा लगता है।


उपरोक्त कारणों से ही आज की धारणा है कि शासन तथा प्रशासन का कम से कम हस्ताक्षेप किसी गतिविधि के संचालन में होना चाहिये। शासन द्वारा किसी विकास कार्यक्रम के लक्ष्य, संगठन तथा कार्ययोजना तो तैयार करना चाहिये तथा इस के लिये धन की व्यवस्था भी करना चाहिये पर उसे स्वयं इन में आगे नहीं आना चाहिये जब तक ऐसी परिस्थितियाँ न हों कि उस के बिना काम ही न चल पाये।


एक बार जब साक्षरता को औपचारिकता, पूर्व निर्धारित मान्यताओं, विदेशी विचारों से मुक्त किया जा सके गा तो सरकार की इस में विशेष भूमिका नहीं रह जाये गी। आम तौर पर देखा गया है कि जब किसी कार्यक्रम को सरकार के माध्यम से अथवा उस के नाम पर चलाया जाता है तो उस से लोगों की अन्य क्षेत्रों में अपेक्षायें बढ़ जाती हैं। जैसे यह माना जाता है कि सरकार द्वारा संचालित किसी परीक्षा को पास करने से शासकीय औपारिक शिक्षा के किसी स्तर के बराबर उसे मान्यता दी जाये गी तथा उस के लिये शासकीय नौकरी का मार्ग प्रशस्त हो सके गा। भारत का वर्तमान संकट बढ़ती हुई अपेक्षाओं का परिणाम है। परन्तु इस का अर्थ यह नहीं कि सरकार का कोई दायित्व ही नहीं हो गा। सरकार का एक बड़ा योगदान धन की व्यवस्था करना है। यह सही है कि धन की व्यवस्था शासन द्वारा भी की जा सकती है तथा अन्यथा भी हो सकती है परन्तु इतने बड़े अभियान के लिये बिना शासन के वित्तीय सहयोग से कोई कारवाई नहीं की जा सकती। यह भी स्पष्ट है कि जब शासन द्वारा पैसा दिया जाये गा तो उस के उपयोग के बारे में भी जाँच पड़ताल करना हो गी। यह जाँच पड़ताल पैसे के उचित एव सक्षम उपयोग तक ही सीमित रहे तथा इसे किसी पूर्व निर्धारित नीति को लागू करने के लिये प्रयोग में न लाया जाये तभी इस का वास्तविक लाभ होगा।


इस में जनता की, समाज की क्या भूमिका होगी। यह तो स्पष्ट है कि जब सरकार की भूमिका कम हो जाये गी तो उसी अनुपात में समाज की भूमिका बढ़े गी, सभ्य समाज की भूमिका बढ़े गी। समाज की भूमिका को समझने के लिये हम थोड़ा से रास्ते से अलग हो कर समानन्तर गतिविधि पर विचार करें।


यह सामान्य अनुभव हैं कि जब कोई व्य७ि चोरी करते हुए पकड़ा जाये तो उस की प्रशंसा करने वाला कोई भी नहीं होता। भ्रष्ट से भ्रष्ट व्यक्ति भी किसी अन्य भ्रष्ट के पकड़े जाने पर अपनी नाराज़गी ही प्रकट करे गा तथा ईमानदारी का ही पक्ष ले गा। आप इसे दोगलापन कह सकते हैं परन्तु हमारे संस्कार ही इस प्रकार के हैं कि हम इस के अतिरि७ कुछ कर भी नहीं सकते। थोड़ा और गहराई में जायें तो हम देखें गे कि समाज के ऊपर कितना निर्भर करता है। अमरीकी समाज में किसी लडके लड़की के मिलने पर कोई विपरीत प्रतिक्रिया नहीं हो गी। भारत में कुछ ऐसे अत्यन्त सीमित वर्ग को छोड़ कर जो पूरी तरह पाश्चात्य रंग में रंग गया है, प्रतिक्रिया इस के अनुकूल नहीं हो गी। समाज के संस्कार ही इस बात को तय करते हैं कि व्य७ि की प्रतिक्रिया क्या होगी।


एक् और उदाहरण देखिये। हमारे यहाँ काम न करना बड़प्पन माना जाता है। जो व्य७ि जितना बड़ा हो जाये गा उसे उतना ही काम से परहेज़ हो गा। एक कहावत है -

‘‘सर्दियों में सूरज भी अफसर हो जाता है।

प्रातः देर से आता है शाम को ज्रल्दी चला जाता है।।’’

इस कहावत का उद्गम इसी मनोभावना का प्रतीक है कि अधिकारी को काम नहीं करना चाहिये। उस का दायित्व अलग प्रकार का है। कार्यालय में चपड़ासी इत्यादि की संख्या से ही अधिकारी का रुतबा नापा जाता है। यदि किसी अधिकारी ने आप को बाहर बिठा कर प्रतीक्षा नहीं कराई तो वह अधिकारी कहलाये जाने योग्य नहीं है। समय पर न पहुँचना बड़प्पन की निशानी है। कई लोग विशेषतया नेता लोग इस पर गर्व भी करते हैं। उन के द्वारा विलम्ब से पहुँचने की जो माफी माँगी जाती है वह भी बड़ी अटपटी लगती है क्योंकि उस में कोई खेद झलकता नहीं है। एक तरह से वह यह जतलाते हैं कि वह इतने व्यस्त हैं कि समय पर पहुँच ही नहीं सकते।


इसी क्रम में यह बात भी आती है कि यह माना गया था कि बड़े आदमी को पढ़ने लिखने की आवश्यकता नहीं है। उस के आस पास बहुतेरे आदमी पढ़े लिखे होंगे जो उस का काम कर दें गे। धन हो तो दिमाग़ खरीदा जा सकता है ऐसा कथन कुछ व्यापारी वर्ग में सुना जाता था। इस संस्कार से पढ़ने लिखने के विरुद्ध भावना बनती है। कोई व्यक्ति जब यह कहता है कि वह अनपढ़ है तो वह ग्लानि का अनुभव नहीं करता है। वह केवल एक तथ्य बताता है। पुस्तिका ‘साक्षरता की पहली सीढ़ी’ जिस का उल्लेख पहले किया गया है में एक प्रसंग आता है। ग्वेटामाला देश में कपड़ा मिल के संचालक ने एक स्कूल खोला। उस में धारणा थी कि ‘मज़दूरों में साक्षरता के प्रसार से मालिक तथा श्रमिकों दोनों को लाभ होगा।’ संचालक ने यह भी कहा कि ‘सवाल सिर्फ हमारी मिल में उत्पादन बढ़ाने का नहीं है - देश की आर्थिक उन्नति का है।’ इस प्रकार की भावना का उदय हमारे समाज में भी होना चाहिये। निरक्षर व्य७ि केवल अपना ही नहीं देश का भी अहित करता है- यह प्रवृति अपनाना होगी। आज की प्रवृति तो है ‘मैं सुखी तो औरों का क्या’।


यदि हमें साक्षरता को सही अर्थों में सार्वभौमिक बनाना है तो इस को बदलना होगा। एक ऐसा माहौल तैयार करना होगा कि अनपढ़ व्यक्ति यह महसूस करे कि उस में कोई कमी है। यह किसी का मज़ाक उड़ाने से अथवा उस के प्रति अपमानजनक बर्ताव कर के प्रदर्शित नहीं किया जाना है। इसे हमारी स्वभाविक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आना होगा। यदि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की ऐसी प्रतिक्रिया हो गी तो चलाये जा रहे प्रौढ़ शिक्षा संस्थाओं को अपने छात्र डूँढने नहीं पड़ें गे। उन्हें प्रेरित नहीं करना होगा। वे इस प्रतिक्रिया से ही प्रेरित हो जायें गे। और उस स्थिति में देश शीघ्र ही पूर्ण साक्षरता की ओर बढ़ सके गा।


ऐसा समाज तैयार करने के लिये अभियान सरीखी प्रचारात्मक कारवाई करने की आवश्यकता भी नहीं है। यह हम में से प्रत्येक को स्वयं ही करना है। यदि एक बड़ी संख्या में लोग ऐसा करें गे तो इस को फैलने में समय कम हीं लगे गा। केवल एक अनपढ़ को अपरोक्ष रूप से उस की कमी का अहसास कराना होगा। यदि ऐसा बार बार हो गा तथा विभिन्न लोगों से सुनने को मिले गा तो इस का मानस पर बड़ा प्रभाव पड़े गा। इस में करना कुछ भी नहीं है। केवल हम में से प्रत्येक व्य७ि को अपनी मनोवृति बदलना हो गी।


इस अक्रिय (निष्क्रिय नहीं कहा गया है) भूमिका के साथ साथ एक सक्रिय भूमिका का भी सोचा जा सकता है। हमारेे विचार में इस शीर्षक को चुनने के पीछे यही विचार था। किस प्रकार समाज अशासकीय संस्थाओं के माध्यम से साक्षरता फैलाने में भूमिका अदा कर सकता है। हम ने इसे थोड़ा अलग रूप दे दिया है। पर जो रूप सोचा गया है उस के बारे में भी विचार किया जा सकता है। समाज का सहयोग तो अनिवार्य है ही विशेषतया जब हम सरकार के दायित्व को कम करने की सोच रहे हैं। समाज से अपेक्षा तीन क्षेत्रों में की जा सकती है। यह हैं - समय, ऊर्जा तथा पैसा। हम ने जान बूझ कर पैसे को सब से बाद में रखा है। सब से बड़ी आवश्यकता समय की है। आज के व्यस्त पर्यावरण में समय दे पाना सब से कठिन है। चाहे वह रोटी रोज़ी के चक्कर में हो या कम से कम समय में अधिक से अधिक कमा लेने का चक्कर, समय निकाल पाना बहुत कठिन है। कुछ लोग हैं जो प्रौढ़ शिक्षा को व्यवसाय के रूप में अपना चुके हैं (यह बात किसी व्यंग्य के रूप में नहीं कही जा रही है। केवल तथ्यात्मक बात है। जैसे शाला में अध्यापन एक व्यवसाय है वैसे ही प्रौढ़ शिक्षा भी व्यवसाय हो सकता है) पर मैं उन की बात नहीं कर रहा वरन् उन की बात कर रहा हूँ जो अन्य कार्यों में, व्यवसायों में व्यस्त हैं। उन को भी कुछ समय इस पुनीत कार्य के लिये निकालना चाहिये। और कुछ नहीं तो प्रौढ़ कक्षाओं में जा कर हौसला ही बढ़ाना काफी होगा। इस के बाद यदि ऊर्जा बचती है तो कक्षायें लेना, नवसाक्षर के लिये साहित्य तैयार करने का काम लिया जा सकता है। नवसाक्षरों के लिये सब से अच्छा साहित्य उन के द्वारा तैयार किया जा सकता है जो अपने क्षेत्र में पारंगत हों। जो व्यक्ति केवल साक्षरता के क्षेत्र में हैं वह भाषा को ही प्रधानता दें गे, ऐसा देखा गया है। तीसरी बात पैसे के द्वारा सहायता करने की है। पैसे की आवश्यकता तो रहती ही है। अतः उस का योगदान भी नगण्य नहीं कहा जा सकता है। यद्यपि यह धारणा है कि अधिकतर राशि शासकीय स्रोतों से ही प्राप्त होगी क्योंकि उन का भी संकल्प है कि निरक्षरता को शीघ्रतातिशीघ्र दूर करना है।


क्या इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। साक्षर भारत के संदर्भ में शिक्षा मन्त्रालय ने कुछ आँकड़े दिये हैं। बताया गया है कि वर्ष 2018 तक 48.90 लाख अध्यापकों को वालण्टियर अध्यापक के रूप में प्रशिक्षित किया जा चुका हैं। 2.75 लाख प्रेरक तैयार किय गये हैं। 2.64 लाख मास्टर ट्रेनर तेयार किया गये है।


किसी व्यक्ति को साक्षर बनाने में कितना समय लगता है। यहाँ केवल युनैस्को की परिभाषा को ध्यान में रखें - सहज रूप से पढ़ सकता है। भाषा उसे आती है, साहित्यक भाषा सिखाने की आवश्यकता नहीं हें। उसे मार्कस के अथवा गाँधी के विचार नहीं पढ़ना है न ही ओरविन्दो के दर्शन का अध्ययन करना है। समाचारपत्र पढ़ ले, यही काफी है। उसे केवल लिपि सीखना है। लिपि को पहचानना है। हमारा विचार है कि इस के लिये एक महीना पर्याप्त हो गा। पंद्रह दिन बिना संयुक्त अक्षर के (यहाॅं हम हिन्दी की बात कर रहै हैं) के व्यंजन और स्वर तथा स्वर की मात्रायें सीखने में तथा पंद्रह दिन संयुक्त अक्षर सीखने में। अन्य भाषाओं में भी इस प्रकार की सामग्री तैयार की जा सकती है।


यदि पचास लाख प्रशिक्षक इस कार्य को केवल पाँच पाँच लोगों के लिये करें तो एक महीने में 250 लाख लोग - ढाई करोड़ लोग - साक्षर हो जायें गे। एक वर्ष में दस महीने भी यह अभियान चले तो पच्चीस करोड़ साक्षर और यही संख्या भारत में वर्तमान में निरक्षरों की है। एक वर्ष में सभी को साक्षर बनाया जा सकता है। (स्पष्ब्तः ही यह दावा थोड़ा अटपटा है। पचास लाख वालण्टियर अध्यापकों की बात ही अतिश्योक्ति प्रतीत होती है। और जो हैं, उन्हें एक साथ इस कार्य में लगाना भी दूर की कोढ़ी लाना है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि वास्तव में प्रयास किया जाये तो यह दशकों की नहीं, वर्षों की बात है)ं


साक्षर तो वे बन जायें गे परन्तु उन्हें साक्षर बनाये रखने के लिये यह आवश्यक हो गा कि उन्हें पाठ्य सामग्री मिलती रहे। किसी ज़माने में एक अभियान चला था कि मोटे अक्षरों में प्रत्येक पंचायत दिन के अथवा सप्ताह के समाचार प्रकाशित करवा कर अपने कार्यालय के सामने प्रदर्शित करे गी। यह व्यवस्था लागू की जा सकती है अथवा कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती है। ग्रामीण चल पुस्तकालयों के बारे में कई बार योजनायें बनाई गई हैं। उन में सुलभ भाषा में रचित पुस्तकें रखी जा सकती है। एक पूरा उद्योग ही नवसाक्षर साहित्य तैयार करने के लिये हो सकता है। इस में प्रचार - प्रापेगण्डा - (प्रधान मन्त्री के भाषण, स्वतन्त्रता संग्राम की कथायें, योजनाओं की सार्थकता) की भावना को दूर रखा जाये गा। धार्मिक साहित्य को तरजीह दी जाये गी क्योंकि वही नवसाक्षरों को आकर्षित कर सकता है विशेषकर अधिक आयु वालों को।


शत प्रतिशत साक्षरता प्राप्त करना कठिन नहीं है। ऐसा हो सकता है] यह मान कर चला जाये तो यह हो भी जाये गा।


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