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प्रजातन्त्र का आदर्श स्वरूप


प्रजातन्त्र का आदर्श स्वरूप

केवल कृष्ण सेठी


चुनाव प्रजातन्त्र के अभिन्न अंग हैं। विश्व के सब से बड़े जनतन्त्र में चुनाव का अपना अलग ही स्थान है। एक उत्सव है जो इस बार (लोक सभा का चुनाव) दो महीने से अधिक चला। इस में कई पात्र आये] कुछ नायक, कुछ खलनायक। कुछ प्रवाचक, कुछ विदूषक। खूब नौटंकी रही। कुछ अप्रिय घटनायें भी हुईं जिन पर सब ने अफसोस व्यक्त किया परन्तु उत्सव अपने रंग पर वलता रहा।


प्रजातन्त्र के चुनाव सम्पन्न हो गये पर क्या वास्तव में यह प्रजातन्त्र है। यह अटपटा सा प्रष्न है पर पूछना आवश्यक है। क्या प्रजातन्त्र में मतदान करना ही प्रजातन्त्र है? अब मतदाताओं की प्रजातन्त्र में भागीदारी समाप्त हो गई है। अब जिन्हें चुन लिया गया है, उन को अपना खेल खेलना है। कुछ को प्रशासन का भार दिया गया है, वे प्रशासन चलायें गे। कुछ को आज्ञा मिलने पर अपना हाथ उठाने का दायित्व सौंपा गया है। वे अपना हाथ आज्ञा मिलने पर उठायें गे। सत्ता से वंचित कुछ ने सत्ता से निरन्तर युद्ध करने की ठान ली है यद्यपि वेतन, भत्ते, सुख सुविधा तथा स्थानीय क्षेत्र विकास राशि को वह भी नहीं नकारें गे। उन का युद्ध केवल वाकयुद्ध हो गा अथवा वाकआउट युद्ध हो गा। नेता की आज्ञा है कि विरोध करना है सो वह विरोध करें गे तथा आदेश मिलने पर हाथ उठायें गे कि वह समर्थन नहीं करते। दूरदर्शन वाले उन के कृत्य का दिखायें गे, कुछ तथाकथित विषेशज्ञ उस पर टिप्पणी करें गे। तीखी बहस करें गे, नोंक झोंक हो गी, गर्मी हो गी, और फिर एक साथ चाय पीने चल दें गे। सब का भुगतान हो जाये गा। कुल मिला कर जीवन अपनी गति से चलता रहे गा।


पर क्या इस का कोई विकल्प भी है। क्या यही प्रजातन्त्र का आदर्श स्वरूप हैं या कोई परिवर्तन भी हो सकता है। ऐसा परिर्वतन जिस में सामान्य नागरिक के विचार भी सुने जायें। उस की प्राथमिकता भी देखी जाये, उस को भी भागीदारी का अहसास हो।


चलिये इतिहास पर दृष्टि डालते हैं। बताया जाता है कि कभी देश में सभी निर्णय नागरिक मिल कर लेते थे। वैशाली के गणराज्य की बात की जाती है। पंच परमेश्वर की बात की जाती है। सभा की बात की जाती है। विद्वान लोगों की, राजगुरू की बात की जाती है। यह सब सही हो सकता है। होता ही हो गा। न मानने का कारण नहीं है। पर हम ने कभी इस के बारे में शोध नहीं किया कि वास्तव में कैसे होता था यह सब। वास्तविक स्थिति क्या थी। राजा कितना निर्कुंश हो सकता था तथा कितना घर्म के आधीन, कितना सभा के आधीन।


यहीं पर यूनान हम से बाज़ी मार ले जाता है। उन्हों ने बाकायदा लिखा कि हम क्या करते हैं। एथेन्स का उदाहरण लें। सभी निर्णय नागरिकों की सभा में लिये जाते थे। यह सही है कि नागरिक की परिभाषा थोड़ी क्या काफी संकीर्ण थी। महिलायें तो बाहर थीं ही, तीस वर्ष से कम पुरुष भी बाहर ही थे। दास लोग तो बाहर रहें गे ही। पर कम से कम सम्पत्ति होने की शर्त नहीं थी जो इंगलैण्ड में उन्नीसवीं शताब्दि तक मतदान देने के लिये भी रही।

ऐसी ही एक सभा में निर्णय लिया गया कि स्पार्टा के विरुद्ध युद्ध किया जाये। युद्ध हुआ तथा इस में ऐथन्स बुरी तरह पिटा। कारण जो भी रहे हों। पर परिणाम यह हुआ कि प्रजातन्त्र के रूप में परिवर्तन करना पड़ा। सभा तो पूर्ववत रही पर इस बात का प्रयास किया गया कि प्रखर वक्ता अपने शब्द चातुर्य से नागरिकों के मन को विचलित कर मनमाने निर्णय न ले पाये। इस के लिये 500 नागरिकों की एक समिति बनाई गई जिसे नोमोथेेतई का नाम दिया गया। यह 500 सदस्य चयनित प्रतिनिधि नहीं थे। उन्हें चुना नहीं जाता था। नागरिकों की एक सूची बनाई गई तथा उन में से 500 व्यक्ति याद्दृछिक रूप से चुने जाते थे। हर बैठक के लिये यह प्रक्रिया अपनाई जाती थी। इस कारण किसी एक का वर्चस्व नहीं रहता था। कोई चमत्कारिक वक्ता आ सकता था पर यह सहज रूप से होता था। सभा द्वारा जो निर्णय लिये जाते थे, उन की पुष्टि इस नोमोथेतई में होना आवश्यक थी। एक चैक रहता था उन के निर्णय पर तथा आम व्यक्ति इस पर विचार कर अपना मत निश्चित करते थे। चूँकि नाम बदलते रहते थे अतः यह पाया गया कि हर तीसरा अर्हता प्राप्त नागरिक कभी न कभी नोमोथेतई का सदस्य रहा। प्रजातन्त्र का नियन्त्रण नामित व्यक्तियों ने ले लिया।


यह स्पष्ट है कि इस पद्धति से शासन का कार्य केवल शासकों के हाथ से निकाल कर प्रजा को दे दिया गया था। चूूंकि कोई चुनाव नहीं होता था अतः इस को अनावश्यक दबाव से दूर रखा गया था। यद्यपि यह नोमोथेतई के सदस्य बनने की क्या अर्हता थी, यह स्पश्ट नहीं है।


क्या आज के युग में इस प्रकार की व्यवस्था सम्भव है। कम जनसंख्या वाले नगरीय पर्यावरण में यह व्यवहारिक था पर जब नगर से निकल कर राज्य तक पहुँचे तो यह प्रक्रिया स्वयंमेव ही समाप्त हो गई। सिकन्दर ने विश्व विजय पर निकलने से पहले जनता की राय ली थी, इसे माना नहीं जा सकता। और अब तो देश काफी विशाल हो चुके हैं। अतः यह व्यवस्था समाप्त हो गई। भारत में भी वैशाली गणराज्य की बात की जाती है पर मौर्य साम्राज्य का समय आया तो इस प्रकार की व्यवस्था अप्रासंगिक हो गई।


अब जब कि संचार व्यवस्था इतनी विकसित हो चुकी है कि लाखों लोग एक साथ अपनी राय दे सकते हैं, इस प्रकार की पद्धति को किसी संशोधित रूप में अपनाया जा सकता है। क्या इस का कोई उदाहरण है।


एक उदाहरण लिया जाये। गुलशन कुमार ने संगीत में एक प्रतियोगिता आरम्भ की थी। इस में गायक भाग लेते थे तथा कुछ संगीत में ख्याति प्राप्त व्यक्ति उस पर अपनी राय व्यक्त करते थे कि कौन सब से उत्तम गायक है। इन में से कुछ को आगे वल कर चलचित्रों में काम भी मिला। परन्तु कुछ विचारशील लोगों ने सोचा कि इस में जनता की भागीदारी तो है ही नहीं। प्रजातन्त्र का तकाज़ा है कि उन्हें भी अपनी राय व्यक्त करने को मौका दिया जाये। सो विशेषज्ञ तो अपने स्थान पर रहे और अपनी राय भी व्यक्त करते रहे पर इस के साथ ही दूरदर्शन के श्रोताओं को भी कहा गया कि वह अपना मत भेजें कि कौन गायक पुरस्कार का हकदार है। दो चार निर्णायक के स्थान पर हज़ारों निर्णायक हो गये।


यह सिलसिला अच्छा चला। एक ओर कार्यक्रम का अच्छा प्रचार हुआ, दूसरी ओर गायक के नाम से अधिक लोग परिचित हुये। तीसरी ओर सही चयन हुआ। चौथी ओर मोबाईल वालों ने खूब कमाया। इस की सफलता देखते हुये संगीत से आगे नृत्य पर भी यही तरकीब अपनाई गई।


पर रंग में भंग तब पड़ा जब एक प्रदेश के मुख्य मन्त्री ने कहा कि अपने प्रदेश के गायक को जिताने के लिये भारी संख्या में एस एम एस भेजें जाये। इस से संगीत की महिमा के स्थान पर स्थान की महिमा बाज़ी मार ले गई। वास्तविक प्रतिभा गौण हो गई। विशेष रूप से नृत्य प्रतियोगिताओं पर इस का प्रभाव अधिक पड़ा। कला पीछे रह गई, प्रदर्शन आगे आ गया। नौटंकी ने अपना रंग जमा लिया।


और हम अपने विषय से भटक गये। शायद भटके नहीं, इन उदाहरणों से प्रेरणा ले कर कुछ बेहतर तरीका सोचने के लिये मजबूर हो गये। किस प्रकार प्रजातन्त्र को अधिक सक्षम बनाया जाये ताकि वह वास्तव में प्रजा का राज हो। इस ओर ध्यान आकर्षित करना हो गा कि उपरोक्त तरीके में मतदान करने वालों की अर्हता की परख नहीं हो सकती थी। इस बात को वैकल्पिक तरीका खोजने में ध्यान में रखना हो गा।


प्रजातन्त्र में चार प्रकार की प्रवृतियाँ पाई जाती हैं। प्रथम द्वन्दात्मक प्रवृति। यह राजनीतिक दलों पर आधारित रहता है। दल अपने प्रत्याशी चुनता है तथा उस के पश्चात अलग अलग संसदीय क्षेत्रों में उन का अधिकाधिक प्रचार किया जाता है। इस में प्रतिद्वन्दी (दो अथवा अधिक) मतदाता को अपनी ओर झुकाने का प्रयास करते है। इस के लिये वह कुछ वचन देते हैं, कुछ अपने पूर्व की उपलब्धियों को बखान करते हैं तथा अन्य पक्ष की कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। मतदाता का कर्तव्य इन प्रतिद्वन्दियों में एक को चुनने का होता है। चयन के पश्चात यह प्रतिद्वन्दी आगे के क्रियाकलाप के लिये स्वतन्त्र होते हैं तथा मतदाता का इस में हस्तक्षेप नगण्य रहता है। सदस्यों के द्वारा अपने नेता का चुनाव किया जाता है। वह शासन का कार्य देखता है किन्तु अन्य चुने गये व्यक्तियों का उस में किसी सीमा तक हस्तक्षेप रहता है। परन्तु क्रमशः जैसे जैसे प्रशासन का कार्य जटिल होता है, इस हस्तक्षेप की तीब्रता कम होती जाती है। भारत में दल बदल कानून बनाये जाने के बाद, इस की सम्भवना समाप्त प्रायः है। केवल औपचारिकता निभाई जाती है। कुछ देशों में पद्धति है कि कुछ सदस्य उपरोक्त प्रकार से तथा कुछ राजनैतिक दल को मिले मतदान से दल द्वारा नामित किये जोते हैं परन्तु शेष परिस्थिति वैसी ही रहती है।


दूसरा विकल्प सीधे ही नेता को चुनने का है। इस प्रजातन्त्रिक पद्धति का नाम अध्यक्षीय प्रणाली है। इस में नेता को अधिक अघिकार प्राप्त होते हैं। कुछ परीक्षण तथा संतुलन के प्रावधान होते हैं परन्तु उन का प्रभावीपन भी अब कम हो चला है।


तीसरा विकलप प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र का है। इस में महत्वपूर्ण कार्य के लिये कौन सा विकल्प चुना जाये, इस पर मतदाताओं की सीधी राय ली जाती है तथा तदानुसार कार्य किया जाता है। मतदाता भी कहीं कहीं किसी विषय पर मतसंग्रह करने का प्रस्ताव कर सकते हैं किन्तु अधिॅकाँशतः संसद अथवा शासन तय करता है कि मतसंग्रह किस विषय पर हो। सामान्य क्रियाकलाप के लिये इन देशों में भी प्रथम दो विकल्प में से ही चुना जाता है।


मतदान संग्रह में स्विटज़रलैण्ड को प्रधान उदाहरण प्रेरक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वहाँ पर वर्ष में चार बार तक मतसंग्रह होता है। इन में संघीय शासन द्वारा प्रस्तुत विषयों पर मत व्यक्त किया जाता है। इस के अतिरिक्त कैण्टन अपने स्तर पर भी अपने अधिकार क्षेत्र सम्बन्धी कुछ विषय प्रस्तावित कर सकते हैं। 18 वर्ष तक की आयु वाले सभी नागरिक इस में भाग ले सकते हैं। मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 53 लाख है। मतसंग्रह के विषय शासन द्वारा तय किये जाते हैं किनतु संविधान संशोधन सम्बन्धी विषय अनिवार्यतः मतसंग्रह के लिये रहते हैं। यदि 50,000 मतदाता से अधिक किसी विषय के लिये मतसंग्रह की माँग करें तो उसे भी शामिल किया जा जाता है।


कई देश यह प्रावधान भी करते हैं कि नगर स्तर पर सामान्य बैठकों में प्रशासन सम्बन्धी निर्णय लिये जायें। इन बैठकों में सभी मतदाता भाग ले सकते हैं। एक तो इन के निर्णय समान्यतः बन्धनकारी नहीं होते हैं। दूसरे सामान्यतः इन बैठकों में मतदाताओं की उदासीनता देखी जा सकती है। संयुक्त राज्य अमरीका में कई राज्यों में नगरों में विभिन्न विषयों पर विचार करने के लिये संविधान में ही प्रावधान है। न्यू इंगलैण्ड, रोड आईलैण्ड, वरमाउण्ट इत्यादि राज्यों में इस का प्रावधान किया गया है।


पर वास्तव में इस में जनता की भागीदारी कितनी रहती है। यह जानने के लिये वरमाउण्ट में ब्रायन ने एक 350 की जनसंख्या वाले नगर में लगभग 1400 ऐसी बैठकों का अध्ययन किया। उन का निष्कर्ष था कि केवल 19 प्रतिशत लोग ही इन बैठकों में आते थे। इन में से भी केवल सात प्रतिशत ने ही चर्चा में भाग लिया। इस कारण यह पाया गया कि केवल र्बैठक आयोजित करना ही प्रजातन्त्र का विकेन्द्रीकरण नहीं है। लगभग 24 राज्यों ने हस्ताक्षर अभियान से संविधान संशोघन प्रस्तावित करने का प्रावधान भी किया है। इस का भी विशेष लाभ नहीं हुआ है। व्यवहार में इस प्रकार मतदाताओं के किसी याचिका पर हस्ताक्षर प्राप्त करने के लिये धन तथा जन बल की आवश्यकता होती है। इस के लिये केवल वहीे लोग ही सामने आ सकते हैं जिन के हित प्रभावित होते हों। सामान्यतः उन के हित तथा जनता के एक बड़े भाग के हित में सामंजस्य नहीं होता। स्विटज़रलैण्ड का अनुभव भी बताता है कि जनसंख्या के बढ़ने के साथ इस प्रकार की चर्चा में कमी आती है। जीन जैक्स रूसो का भी मत था कि जितने अधिक मतदाता हों गे, उतना ही प्रजातन्त्र कम हो गा।


वास्तव में यह उदासीनता इस कारण होती है कि जब मतदाता अधिक हो जाते हैं तो वह इस बात को समय का व्यर्थ उपयोग मानते हैं कि विषय का गम्भीर अध्ययन किया जाये जब कि उन की राय का मूल्य नगण्य है। वे इस में अधिक विश्वास करते हैं कि किसी अगुआ की राय को अपना लें। तब बात विश्वास की हो जाती है तथा जानकारी की कम। यह उल्लेखनीय है कि सब से उत्तम व्यवस्था में भी मतसंग्रह के लिये सीमित विषय ही हो गा तथा जीवन में इस का विशेष महत्व नहीं हो गा। कई बार यह मतदान भावना प्रधान हो जाते हैं तथा तर्कों का केवल परिमेयकरण ही होता है।


प्रजातन्त्र का एक मौलिक सिद्धाँत यह है कि वह उन बातों के प्रति अधिक समर्पित हो जो जनता द्वारा चाही जाती है। हम ने इस के बारे में एथेन्स में कुछ झलक देखी। उस में विशिष्ट संस्था थीं जो इसी दृष्टि से गठित की गई थीं। ऐसी संस्थायें लोगों के विचारों को व्यक्त करती थीं। इन के द्वारा सभा के निर्णयों को भी उलटने का अधिकार भी था। इन संस्थाओं में किसी विषय के दोनों पक्ष के तर्कों को सुना जा सकता था। वैसे कई देशों में दो प्रकार के सदन रहते हैं जिन की मंशा यही होती है कि विषयों पर पुनर्विचार किया जा सके। परन्तु अधिकतर यह दोनो सदन राजनीति से प्रभावित रहते हैं तथा उन में स्वतन्त्र विचार केवल नाम के लिये होता है। ऐथन्स में जहाँ पर रैण्डम तौर पर पुनरीक्षण करने वाली संस्था के सदस्य चुने जाते हैं, उन में इस प्रकार के राजनैतिक प्रभाव को कम किया जा सकता है।


यदि बड़े परिमाण पर मतदाता की राय सामने आने में कठिनाई आती है तो क्या विकल्प के तौर पर छोटे समूह द्वारा यह कार्य किया जा सकता है। इसे सामूहिक प्रजातन्त्र का नाम दिया जा सकता है। पर समूहों का प्रजातन्त्र कैसे लाया जाये, इस पर थोडी दिक्कत है। इन समूहों में भी कोई प्रधान वक्ता महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर अपने मत को समूह का मत बता कर सामने नहीं आयें गे, इस की गारण्टी नहीं है। कितने समूह हो गे। इन की सदस्यता किस की तथा कितनी हो सकती है। इन सब बातों पर विचार किया जाना आवश्यक है। इस से पहले कि हम इस विषय पर आगे चर्चा करें। समूहों के गठन तथा उन के क्रियाकलाप पर कुछ विचार करना उचित हो गा।


यहाँ पर थोड़ा विषय परिवर्तन किया जा सकता है। कई बार जनता शासन से प्रसन्न नहीं रहती है परन्तु उस का आक्रोष व्यक्त नहीं हो पाता है। जब वह प्रकट होता है तो विकराल रूप धारण कर सकता है। यह सदैव हिंसक हो, यह आवश्यक नहीं है। इस का एक बड़ा उदाहरण फिलीपीन्स का है। 1986 में जनता तानाशाह मारकोस के विरुद्ध सड़क पर उतर आई। लाखों लोग जब सड़क पर आ गये तो एक गम्भीर स्थित उत्पन्न हो गई। पुलिस तथा फिर सैना ने इन निहत्थे व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई करने से इंकार कर दिया। परिणामतः मारकोस देश छोड़ कर भागने पर मजबूर हो गये। इसे पीपल पावर - जन शक्ति - का नाम दिया गया। इस के बाद 1988 में दक्षिण कोरिया के भ्रष्ट राष्ट्रपति को अपने पद से जनता के व्यापक प्रदर्षन के फलस्वरूप हटना पड़ा। इन प्रदर्शनों में जनता का आक्रोश था जो उन्हें सड़कों पर ले आया। इन प्रदर्शनों में, जो स्वतःप्रवर्तित थे, में कोई संगठन नहीं था किन्तु विकल्प के तौर पर दूसरा नाम उपलब्ध था। फिलीपीन्स में एक विख्यात विरोधी नेता, जिस की मारकोस ने हत्या करवा दी थी, की पत्नि कोराज़न अकीनो प्रतीक के रूप में थी और उसे सत्ता सौंपी गई। कोरिया में भी विरोधी दल का प्रत्याशी था।


इस के विपरीत निकट भूतकाल में अरब स्प्रिंग के नाम से विख्यात जनता के विशाल प्रदर्शन का प्रभाव टयूनिस, मिस्र तथा अन्य देशों में देखने को मिला। यहाँ पर तानाशाहों को अपने पद से हटना पड़ा। तथा राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव सम्पन्न हुआ। परन्तु इन देशों में पहले से किसी वैकल्पिक नेता का नाम सामने नहीं था। केवल इण्टरनैट पर प्रसारित सन्देशों से प्रेरित हो कर लोग हज़ारों की संख्या में काहिरा के तहरीर चैक पर एकत्र हो गये तथा तानाशाह को हटना पड़ा। इसी प्रकार टयूनिस में भी हुआ।


तानाशाहों को हटाने के दूसरे उदाहरण में समूहों अथवा संगठनों की भागीददारी थी। पौलैण्ड में सालीडैरिटी नामक श्रमिक संस्था ने षासन से व्यापक सुधारों की माँग की। प्रबल समर्थन के कारण सरकार को चुनाव कराने पर राज़ी होना पड़ा। सालडिैरिटी को ऐसे चुनाव में, जिस में हेरा फेरी का पूरा डर था, में एक छोड़ कर सभी स्थान मिले तथा इस बात ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। यह अलग बात है कि पौलेण्ड, अथवा मिस्र में विशेष परिवर्तन देखने को नहीं मिले। पोलैण्ड में राजनैतिक उथल पुथल रही और सालिडेरिटी भी जनता का विश्वास स्थापित नहीं रख पाई। उधर मिस्र में सैना ने फिर से सत्ता पर अधिकार कर लिया। टयूनिस में अवश्य प्रजातन्त्र का प्रयोग कुछ सफल रहा।


यह उल्लेखनीय है कि इन प्रयासों में आक्रोष की मुख्य भूमिका थी। यह अचानक उत्पन्न हुआ अथवा वर्षों से गुस्सा पनप रहा था, यह गौण बात है। परन्तु इस लेख में हमारा आश्य एक चुनी हुई सरकार को अधिक सक्षम बनाने पर है। इन उदाहरणों को केवल यह सिद्ध करने का प्रयोजन है कि जनता अपनी बात बिना हिंसा के भी मनवा सकती है। सामान्य प्रक्रिया में इस प्रकार सत्ता परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। दूसरे शब्दों में हमारा आश्य पूरक भूमिका अपनाने की है, किसी स्थापित शासन को पदच्युत करने का आष्य नहीं है। अतः इस को ध्यान में रखते हुये हम सामूहिक प्रजातन्त्र की अवधारणा पर लौट सकते हैं।


समूहों का गठन किस प्रकार हो गा, इस पर विचार आवश्यक है। इस के लिये कई बार सभ्य समाज की भूमिका बताई जाती है। यह जानना आवश्यक है कि सभ्य समाज से क्या मुराद है। इस शब्द का प्रचलन गत शताब्दि के आठवें दशक में हुआ। यह उन समूहों के बारे में था जिन में समान विचारों वाले मनुष्य सार्वजनिक विषयों पर आपस में चर्चा करते थे। वे शासन का अंग नहीं थे। उन में किसी विशिष्ट विषय पर विचार करना आवश्यक नहीं था तथा न ही संख्या को कोई बंदिश थी। कभी कभी ऐसे समूह जन्य भी होते हैं तथा परिस्थिति के परिवर्तन के साथ उन का भी अवसान हो जाता है। परन्तु कई समूह दीर्घ अवधि तक भी चलते हैं।


यह तो सर्वविदित है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। सभ्यता का आरम्भ ही इस कारण हुआ कि मनुष्य को एक दूसरे के साथ मिल कर रहने पर मजबूर होना पड़ा। आखेट के लिये समूह का होना आवश्यक था। इसी ने आगे चल कर समाज का रूप ले लिया। जैसे जैसे मनुश्य की आवश्यकतायें बढ़ीं , वैसे वैसे ही समाज का आकार बढ़ता गया। जब व्यवस्था की आवश्यकता हुई तो आपस में मिल बैठ कर फैसले लेने का चलन हुआ। जब आकार और बढ़ा तो सब का मिल बैठना कठिन हो गया तो यह दायित्व किन्ही लोगों को दे दिया गया। आकार बढ़ने के साथ शासक अधिक बलशाली हो गये और सामान्य जन से कटते गये। ईश्वर द्वारा नियुक्त शासक की बात आई पर जब इस से कष्ट बढ़े तो फिर से जनता को जोड़ने की प्रक्रिया आरम्भ हुई जिसे प्रजातन्त्र का नाम दिया गया। पर जैसे रूसो ने कहा, यह प्रजातन्त्र केवल नाम का था। व्यवस्था पुरानी ही रही। कानून बनाने का काम कुछ लोगों के हाथ में ही रहा। अब जब कि संचार व्यवस्था विकसित हो गई है, एक बार फिर जनता की माँग है कि उसे शासन में भागीदार बनाया जाये। इस लेख में हम ने इस के लिये क्या किया जा सकता है, इस पर विचार किया है।


इस लेख में हम समूहों के बारे में चर्चा कर रहे हैं जिन के माध्यम से जनता की भागीदारी बढ़ सकती है। इन के विचार कई बार शासन को प्रभावित भी करते हैं। परन्तु इस की कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं है। यह समूह कई बार केवल आपसी विचार विमर्श के लिये ही होते हैं परन्तु फिर भी इन का परोक्ष प्रभाव जनता की भावना को व्यक्त करने का रहता है। जब यह अधिक संगठित हो कर कार्य करते हैं तो शासन को भी इन के आस्तित्व का संज्ञान लेना पड़ता है। इन समूहों को अशासकीय संस्था भी कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र संगठन ने अपने अनुच्छेद 71 में अशासकीय संस्थाओं को परामर्श देने के लिये मान्यता देने का प्रावधान किया है। इसी के अनुरूप विभिन्न देशों ने भी इस प्रकार के प्रावधान किये हैं।


चूँकि यह संस्थायें शासन तथा जनता के बीच कड़ी का कार्य करती हैं अतः यह स्वाभाविक ही है कि राजनेता भी इन से सम्बद्ध हो जाते हैं। इस से वह जनता के निकट आने का प्रयास करते है। इस में कोई बुरोई नहीं है जब तक वह इस का वर्चस्व प्राप्त नहीं करते। वैसे राजनैतिक दल भी समूह ही है परन्तु उन के सदस्यों की संख्या इतनी अधिक हो जाती है तथा उन के हित इतने व्यापक होते हैं कि वे वह भूमिका नहीं निभा पाते जिस पर हम विचार कर रहे हैं अर्थात शासन को सक्षम प्रजातन्त्र बनाने का।


सभ्य समाज शासकीय नीतियों को प्रभावित कर सकता है अतः सभ्य समाज का एक रूप विकासशील देषों में देखने को मिला जहाँ पश्चिम के देशों ने कई अशासकीय संस्थाओं को अपने लक्ष्य पूरे करने का साधन बनाया तथा उन्हें भरपूर आर्थिक सहायता दी। परियोजनाओं का विरोध उन्हें स्थगित करने के लिये अथवा अपनी मंशा के अनुरूप बनाने का प्रयास किया गया। कई राष्टों ने इस का समाधान शासन पोषित अशासकीय संस्थायें बना कर दिया जो जनता के समक्ष शासन का पक्ष इस प्रकार रख सकती थी जैसा कि शासन के अधिकारी नहीं कर पाते।

सामूहिक चर्चा का एक और तरीका है जो अनौपचारिक है। काफी हाउस जैसी संस्थाओं में देश की समस्याओं के बारे में खुली बहस होना व्यापक प्रक्रिया है। इस से प्रत्यक्ष परिणाम भले ही न दिखता हो परन्तु कई बार नीति को प्रभावित करने के यह काम में आते हैं।


सभ्य समाज का एक अन्य पहलू प्रभाव समूहों का है। यह समूह किसी एक विशय में रुचि रखते हैं तथा उस के बारे में सरकार को तथा जनता को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं। यह शुद्ध व्यापारिक विषयों के बारे में हो सकता है तथा किसी विशेष विषय जैसे पर्यावरण सुरक्षा, वन्य प्रणी सुरक्षा, बाल श्रमिक कल्याण, दृश्टिहीन कल्याण इत्यादि के सम्बन्ध में भी हो सकते हैं। प्रभाव समूह कई बार जनता के अन्य हितों के विरुद्ध भी हो सकते हैं जैसे श्रमिक संघ श्रमिकों के हित की तो सोचता है किन्तु उन में व्यापक हित की बात गौण रहती है। कई बार यह समूह कियी विशिष्ट लक्ष्य के लिये भी बनते हैं जिन में केवल तत्कालिक समस्या के सामधान की अभिलाशा निहित होती है जैसे कि अन्ना हज़ारे का अभियान भ्रष्टाचार के विरुद्ध हुआ था जिस में पूरे देश से बड़ी संख्या में व्यक्ति जुड़ते गये। इसी प्रकार किसानों का दिल्ली मार्च भी इस वर्ग में आता है। इन का कोई स्थायीत्व नहीं होता है। परन्तु एक और प्रकार का विरोघ भी हो सकता है जिस में जनता प्रत्यक्ष रूप से सामने न आ कर परोक्ष रूप से अपना विरोध दर्ज कराती है। जैसे ग्राम के सभी मतदाता यह निश्चय कर लें कि वह मतदान नहीं करें गे जब तक उन की समस्या का समाधान नहीं हो जाता। इस स्थिति में शासन को आम तौर पर उन्हें मनाना ही पड़ता है।

भारत में विशेष रूप से जाति समूह महत्वपूर्ण हैं। इन का सामाजिक लक्ष्य भी होता है तथा आर्थिक एवं राजनैतिक स्तर पर भी यह कार्यरत रहते हैं। सरकार पर दबाव डालने के लिये इन का उपयोग होता है तथा आँतरिक प्रयासों से जाति विशेष के उत्थान के लिये भी यह कार्य करते हैं।


एक अन्य प्रकार के समूहों का भी वर्णन करना भी उचित हो गा। यह औपचारिक होते हैं तथा इन के दो लक्ष्य होते हैं। एक समान व्यवसाय वालों को सामाजिक आदान प्रदान हेतु एक स्थान पर लाना तथा दूसरे व्यवसाय के उन्नति के लिये सरकार पर दबाव बनाना। उदाहरण ऐसाकैम, उद्योग चैम्बर, बार कौंसिल।


यह आवश्यक नहीं है कि इन समूहों के सदस्य केवल एक ही संगठन के सदस्य हों। व्यक्ति कई समूहों का सदस्य हो सकता है। यदि उन का आपस में हित न टकराते हों तो इस में कोई हर्ज नहीं है।


जहाँ तक शासन की नीतियों को प्रभावित करने का प्रश्न है, विचार समूहों का गठन मतदाताओं द्वारा किसी सार्वजनिक समस्या पर विचार करने के लिये होता है। इस कारण इस में सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व होना आवश्यक है। जनता की राय जानने के लिये इन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है -

1. जो समूह चुना जाये वह जनता के विभिन्न वर्गों का पूर्ण प्रतिनिधित्व करता हो।

2. समूह के सदस्यों को समस्या के बारे में पूर्ण जानकारी उपलब्ध हो।

3. समूह में विचारों का आदान प्रदान मुक्त एवं विस्तारपूर्वक हो।

4. समूह के विभिन्न वर्गों जैसे उच्च आय वर्ग, उच्च शिक्षा वर्ग के कारण कोई विकृति या विरूपन नहीं हो।

5. जिन मुद्दों पर विचार किया जाना है, वे सुप्रभाषित होना चाहिये।


यहाँ पर यह उचित हो गा कि हम कुछ देशों के सम्बन्ध में मतदाताओं की राय जाने के लिये किये गये प्रयोगों के बारे में अध्ययन करें। इन अध्ययन में कुछ लोागों को रैण्डम तरीके से चुना गया था जिन में विभिन्न वर्गों के अनुपात को ध्यान में रखा गया था। (इन अध्ययनों के बारे में सामग्री जेम्स फिशकिन की पस्तक ‘डैमोक्रेसी वैन पीपल आर थिंक्रिग’ - प्रकाशक आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रैस - से ली गई है)।


जून 2011 में कैलिफोर्निया में मतदाताओं के प्रतिनिधियों की कार्यशाला आयोजित की गई जिसे ‘‘कैलिफोर्निया, आगे क्या’’ नाम दिया गया। इस सम्मेलन में 39 ऐसे सुधार प्रस्तावों पर विचार किया जाना था जो कई अशासकीय संस्थाओं ने समय-समय पर प्रस्तावित किये थे। इस सम्मेलन का उद्देश्य मतदाताओं के समक्ष अथवा विधानसभा के समक्ष इन प्रस्तावों के बारे में जनता का विचार दर्ज करवाना था। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए फोन द्वारा रैण्डम तौर पर मतदाताओं से सम्पर्क किया गया। कुल 439 मतदाताओं ने इस में भाग लेना स्वीकार किया परन्तु अंत में 412 व्यक्ति ही टोरंट्ज में पहुंच सके जहां पर यह सम्मेलन होना था। इस के अतिरिक्त 300 मतदाता फोन द्वारा ऐसे भी चुनें गये जिन्हें इन प्रस्तावों के बारे में समस्त जानकारी भेजी गई थी और उन के विचार फोन पर पता लगाये गये। इस के लिए इन मतदाताओं को 10 बार तक फोन किए गये। इन सभी मतदाताओं मैं चयन में यह ध्यान रखा गया कि वे जनता के सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व करें।


इन प्रतिनिधिगण को छोटे-छोटे समूहों में बांटा गया जिस में विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के बारे में बताया गया। यह प्रावधान किया गया कि सम्मेलन के समय कोई नये प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किये जायें गे। जो पूर्व से प्रस्तावित सुधार थे, उन्हीं पर विचार किया जाना था। ऐसा इस कारण था कि मौके पर किये गये प्रस्ताव के बारे में प्रतिनिधिगण को विस्तृत जानकारी नहीं दी जा सकती थी। जो लोग चर्चा का मार्ग दर्शन कर रहे थे उन को यह समझाईश दी गर्द थी कि वे अपने विचार व्यक्त नहीं करें गे। इस सम्मेलन में सभी प्रतिनिधिगण को अपने विचार व्यक्त करने का समय मिल रहा था। प्रस्तावित विषयों के बारे में सामग्री सभी प्रतिनिधियों को पूर्व में भेजी गई थी ताकि उन्हें प्रस्तावित विषयों के बारे में पूरी जानकारी प्रदान की जा सकें। .


प्रतिभागियों की जानकारी का आंकलन करने के लिये चर्चा से पूर्व एवं चर्चा के बाद में आठ आठ प्रश्न पूछे गये थे। यह प्रतीत हुआ कि चर्चा के कारण जानकारी में 18 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई। सभी 39 सुझावों को 4 विषयों में बांटा गया था जोकि चार मुख्य स्थिति के बारे में थे एक - नई पहल वाले प्रस्ताव, 2- विधानसभा में सुधार, 3- स्थानीय सम्बन्धों में सुधार, एवं 4- कराधान तथा व्यय। इन सब सुझाव के लिये न केवल पूरा विवरण दिया गया था बल्कि पक्ष एवं विपक्ष में दिये गये तर्कों को तालिका के रूप में दर्शाया गया था। यह पाया गया कि चर्चा के उपरांत 39 में से 21 प्रस्तावों में जो विचार व्यक्त किये गये थे, उन में समर्थन में काफी परिवर्तन चर्चा के दौरान देखने को मिला।


यह स्पष्ट है कि 2 दिन के विचार विमर्श में बहुत अधिक नई बातें सामने नहीं आ सकती परन्तु फिर भी जो बातें सामने आये वह काफी विचारपरक थी। एक प्रस्ताव था कि राज्य की विधान सभा की अवधि 2 वर्ष से बढ़ा कर 4 वर्ष कर दी जाये तथा सीनेट की अवधि 4 वर्ष से बढ़ा कर 6 वर्ष कर दी जाये। जिन लोगों ने पक्ष में कहा उन का मत था कि 2 वर्ष की अवधि होने पर सदस्य बनने वाला व्यक्ति आरम्भ से यह सोचने लगता है कि वह अगली बार कैसे चुना जाये गा। इस कारण उसे उन व्यक्तियों का, जो उसे आर्थिक सहायता देते हैं, कल्याण देखना होता है। अवघि बढ़ने पर यह भावना थोड़ी कम हो जायेगी। एक प्रस्ताव था कि विधानसभा का कार्य अल्पकालिक हों और विधायकों को वेतन इत्यादि भी उसी दृष्टि से दिया जाये। इस के पक्ष में भी काफी समर्थन आया था। सम्मेलन के पूर्व तथा सम्मेलन के अन्त में प्रस्तावों पर उन की प्रतिक्रिया ली गई। आपसी चर्चा के कारण उन के ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई तथा उन के विचारों में परिवर्तन आया। उदाहरणतया आगमन के समय अल्पकालिक विधान सभा के पक्ष में 45 प्रतिशत समर्थक थे। चर्चा के उपरांत इन की संख्या कम हो कर 27 प्रतिशत रह गई। पक्ष में यह तर्क दिये गये कि अल्पकालिक विधायक अपने क्षेत्र को ओर अधिक ध्यान से देखें गे। दूसरा तर्क यह था कि अल्पकालिक होने के कारण वह केवल राजनीति को ही अपना पूर्णकालिक कार्य नहीं मानें गे। विपक्ष में तर्क यह था कि अल्पकालिक विधायक भ्रष्टाचार के प्रति अधिक आकर्षित होंगे। दूसरा तर्क यह था कि अल्पकालिक विधायकों को नीति संबंधी विषयों का ज्ञान कम रहे गा क्योंकि उन का ध्यान बटा रहे गा और वह अपने व्यवसाय के बारे में भी सोचें गे। यह स्पष्ट है कि विचार विमर्ष से मतदाताओं की राय पर प्रभाव पड़ता है। यही ऐसे सम्मेलनों की उपयोगिता है अर्थात पूर्ण जानकारी के आधार पर मत व्यक्त किया जाता है।


क्या इस सम्मेलन के निष्कर्षों का कोई प्रभाव पड़ा। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। देखा जाये तो दो क्षेत्रों में इस का प्रभाव हुआ था। सम्मेलन का एक प्रस्ताव था कि किसी भी विधान का अनुमोदन करने से पूर्व जनता की राय ली जाये। इसी के तारतमय में विधान सभा द्वारा यह अधिनियम पारित किया गया कि प्रस्तावित नियमों को इंटरनैट पर प्रकाशित किया जाये गा, उस पर टिप्पणी के लिये अधिक समय दिया जाये गा, सत्ता पक्ष तथा विपक्ष, दोनों के तर्क प्रस्तुत किये जायें गे जो कि इंटरनैट पर उपलब्ध रहें गे। इस प्रकार इन विधेयकों पर टिप्पणी करने वाले जानकारी सहित अपनी राय व्यक्त कर सकें गे।


संयुक्त राज्य अमरीका के इस उदाहरण के बाद हम चलें एक अन्य देश, एक अन्य सभ्यता की ओर।

एशिया के मध्य मंगोलिया नाम के देश की राजधानी उलनबतोर हैे जिस में देश के आधे से अधिक लोग निवास करते हैं। इस नगर में कौन से परियोजनायें हाथ में ली जायें, इस के बारे में चर्चा करने के लिये जनता की राय ली गई। कुल 14 परियोजनायें थी जिन के बारे में विचार किया जाना था। वर्ष 2015 में नगर के वासियों में से 1502 व्यक्तियों का समूह चुना गया जिन्हें रेंडम तरीके से चुना गया था। इन में भवनों में रहने वाले व्यक्ति तथा तंबूओं में रहने वाले व्यक्ति, दोनों का ही समावेश था। प्रारंभिक सर्वेक्षण के पश्चात इन 1502 में से 300 व्यक्ति चुने गये और अंततः 317 व्यक्तियों ने 2 दिन की चर्चा में भाग लिया। यह 317 व्यक्ति तथा शेष बचे 1185 व्यक्ति लिंग, शिक्षा, आयु, व्यवसाय, आय इत्यादि के बारे में एक जैसे थे अर्थात दोनो समूह पूरी तरह से निवासियों का प्रतिनिधित्व करते थे। ।


चर्चा के काफी दिन पहले सभी भागीदारों को लिखित सामग्री प्रदाय की गई थी जिस में सभी परियोजनाओं के बारे में जानकारी दी गई थी। जब यह व्यक्ति बैठक के लिये आये तो उन्हें लगभग पंद्रह पंद्रह के समूह में बाँटा गया। इन समूहों को मार्गदर्शन देने के लिये अनुभवी व्यक्ति नियुक्त किये गये जिन को यह आदेश था कि वे केवल चर्चा को संचालन करें गे तथा स्वयं उस में भाग नहीं लें गे तथा न ही अपने कोई विचार व्यक्त करें गे। समूह की चर्चा के पश्चात सभी व्यक्तियों की सामूहिक सम्मेलन में भी उन के विचारों के बारे में चर्चा की गई।


चर्चा के पूर्व और पश्चात सभी व्यक्तियों की राय ली गई थी कि कौन सी परियोजना को क्या प्राथमिकता दी जाना है। इस में जो सब से प्रथमे प्राथमिकता की योजना थी उसे एक अंक दिया गया और जो अस्वीकार करने योग्य थी उसे शून्य। आंकलन से पाया गया कि किसी भी परियोजना को 0.644 से कम अंक नहीं मिले थे। इस में आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि सभी परियोजनाओं को वर्षों की मेहनत के बाद तैयार किया गया था। चर्चा के दौरान पाया गया कि 8 परियोजनाओं में की प्राथमिकता में काफी अंतर आया। इन में से पांच की प्राथमिकता ऊपर की ओर गई औरे 3 की नीचे की ओर। एक प्रस्ताव था - नगर में मेट्रो शुरू करना। यह परियोजना प्राथमिकता में 11 क्रम से कम हो कर 13वें स्थान पर रह गई। सब से प्रथम प्राथमिकता की परियोजना थी - शालाओं को गर्म रखने का प्रावधान। इस में आश्चर्य नहीं है क्योंकि उलनबातोर नगर विश्व के अत्यंत शीतल नगरों में गिना जाता है।


प्राथमिकता के प्रथम चार स्थानों में से ऐसे प्रस्ताव थे जिन का पर्यावरण से संबंध है जैसे कि शुद्ध ऊर्जा, ऊर्जा की बचत, नदियों का संरक्षण, तथा कचरे का निष्पादन। पांचवी प्राथमिकता पर ही आर्थिक विकास की बात कही गई थी। नीति संबंधी विषयों में जल प्रदाय को सक्षम बनाने के पक्ष में 0.963 अंक आये थे और इस के पश्चात ऊर्जा की प्रस्ताव को 0.891 अंक मिले थे।


चर्चा के उपरांत नगर प्रशासन ने घोषित किया कि जो प्राथमिकता सम्मेलन में तय की गई है, वहीं लागू की जाये गी। न केवल यह बल्कि मार्च 2017 में संसद में एक कानून भी इस संबंध में पारित किया गया कि संविधान के संशोधन के लिये, स्थानीय क्षेत्र विकास के लिये, तथा नगर विकास के लिये इस प्रकार के सम्मेलन का आयोजन हर बार किया जाये।


इन उदाहरणों के पश्चात एक और महाद्वीप की ओर चलें जो पिछड़ा हुआ गिना जाता है। इस में युगण्डा के दो ज़िलों के बारे में प्रयोग किया गया था। यह ज़िले थे - बदूदा तथा बूतालेजा। मंगोलिया के बारे में यह बताना उचित हो गा कि वहाँ पर शैक्षिक स्थिति बहुत अच्छी थी। इस के विपरीत युगण्डा में साक्षरता बहुत कम है। महिलाओं के लिये तो यह नाम मात्र है। दोनों ज़िलो की जनसंख्या लगभग दो लाख है। दोनों की अलग अलग समस्यायें हैं। बदुलेजा घाटी में स्थित है। खेती के लिये भूमि उपजाउ है किन्तु बाढ़ का भय सदैेव बना रहता है। अधिकतर लोग मुस्लिम हैं। इस के विपरीत बदूदा पहाड़ के ऊपर स्थित है। यहाँ की समस्या पहाड़ों में चट्टाने खिसकने की है। यह मुख्यतः ईसाई क्षेत्र है।


दोनों ज़िलों में प्रतिभागियों का चयन रैण्डम पद्धति से किया गया था, इस बात का ध्यान रखते हुये कि शिक्षा इत्यादि के मामले में उचित अनुपात रखा जाये। दोनों में प्रथम चरण साक्षत्कार का था। बदूदा में 210 लोगों को चुना गया और बतुलेजा में 232 लोगों को। इन में से क्रमशः 201 तथा 217 लोगों ने पूरे दो दिन चर्चा में भाग लिया। साक्षरता की कमी तथा दूरभाष के न होने के कारण अधिकतर बात आमने सामने ही हुई। साक्षात्कार लगभग तीस से चालीस मिनट के थे।


बदूदा के प्रतिनिधिगण में से दस प्रतिशत निरक्षर थे तथा 58 प्रतिशत ने केवल प्राथमिक शिक्षा ली थी। इन में से 87 प्रतिशत कृषक थे। बदूलेजा में आठ प्रतिशत निरक्षर थे तथा 57 प्रतिशत ने केवल प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी। 86 प्रतिशत कृषक थे।


चर्चा के लिये 3 विषयों के 36 विकल्प रखे गये थे। विषय थे - पुनर्वास, भू प्रबंधन, तथा जनसंख्या का दबाव। इन 36 विकल्पों में से क्रम तय करना था। सब से महत्वपूर्ण को दस अंक दिये जाना थे तथा महत्वहीन को शून्य। दूसरे प्रयोगों की भाँति इन में भी चर्चा से पूर्व तथा चर्चा के बाद की प्राथमिकता का आंकलन किया गया। देखा गया कि जिन विकल्पों को पूर्व में अधिक अंक मिले थे, उन में और वृद्धि हुई। बदूदा में अधिक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र से अन्यत्र बसने के विकल्प को 76 प्रतिशत ने उच्च प्राथमिकता दी थी तथा इन का प्रतिशतता 85 प्रतिशत तक पहुँच गई। उपजाउ भूमि से जाने की बात में बलिदान की अवधारणा थी। इन स्थान बदलने वालों की सहायता के बारे में सहायता की पेशकश 67 प्रतिशत से 78 प्रतिशत हो गई। स्थानीय आपदा राहत समितियों को सहायता देने के प्रश्न पर समर्थाकों की संख्या 58 प्रतिशत से बढ़ कर 79 प्रतिशत हो गई। मलेरिया रोकने के लिये नालियाँ बनाने के प्रश्न पर समर्थन पहले ही 87 प्रतिशत पर काफी था जो बढ़ कर 94 प्रतिशत हो गया। सब से अधिक बल इस प्रस्ताव को दिया गया कि लड़कियों की शिक्षा के लिये प्रयास किया जाना चाहिये।


इसी प्रकार बदूलेजा में भी परिचर्तन देखने को मिले। पुनर्वास के प्रश्न का आरम्भ में केवल 46 प्रतिशत समर्थन मिला जो चर्चा के उपरान्त 67 प्रतिशत तक पहुँच गया। फोन द्वारा सम्भावित भूसंकलन की जानकारी देने के प्रस्ताव का समर्थन 60 प्रतिशत से घट कर 42 प्रतिशत रह गया जो फोन व्यवस्था का सुचारु रूप से न चलने का परिचायक था। इस के विपरीत साईरन द्वारा सूचना देने के प्रस्ताव का समर्थन 79 प्रतिशत से बढ़ कर 92 प्रतिशत हो गया। परिवार नियोजन में दोनों ही क्षेत्रों में इस प्रस्ताव को समर्थन मिला कि विवाह की आयु को 18 वर्ष किया जाये। इस से लड़कियों को गर्भवती होने की अपेक्षा अधिक समय तक शाला में रहने का अवसर प्राप्त हो गा। इसी तारतम्य में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सक्षम बनाने की बात भी की गई। वर्तमान में चिकित्सा केन्द्र बहुत दूर होने की बात कही गई। तीसरी प्राथमिकता शालाओं को दूर दराज़ के ग्रामों में खोलने का कहा गया ताकि लड़कियों के लिये वहाँ जाना आसान हो सके। बूदालेजा में सर्वोच्च प्राथमिकता स्वच्छ जल की उपलब्धि थी। दूसरी प्राथमिकता शालाओं की तथा तीसरी सड़क निर्माण की थी।


उपरोक्त तीनों अध्ययन में इस बात पर विचार किया गया कि क्या किन्हीं कारणों से विचारों का प्रक्षेप विरूपन होता है। इन सभी उदाहरणों में देखने को मिला कि चयन किये गये लोगों की चर्चा में प्राथमिकतायें अधिक अर्थपूर्ण रहती हैं बजाये तब कि यह समूह स्वयं बनते हैं जिन में एक समान हित रखने वाले लोग एक समूह में आते हैं। अधिक शिक्षित लोग प्रभावित कर सकें गे अथवा सम्पन्न व्यक्ति प्रभाव डाल सकते हैं, यह आशंका थी परन्तु देखा गया कि इस प्रकार की विकृति कहीं नहीं आई।


इन प्रयोगों का प्रभाव अन्य देशों तथा क्षेत्रों में भी पड़ा है जैसे कि युगण्डा के पश्चात ऐसे ही प्रयोग घाना (तरमेले नगर), सेनेगल (तिवोने क्षेत्र), तनज़ानिया (पूरे देश में), तथा मालावी में भी किये गये। कुल मिला कर निष्कर्ष यह है कि यदि अवसर दिया जाये तो नागरिक अपने हितों के बारे में अर्थपूर्ण चर्चा कर सकते हैं।


हम ने पूर्व में प्रजातन्त्र के तीन स्वरूपों की बात की थी। इन वर्णित तीनों ही विकल्पों में चुनाव के पश्चात मतदाताओं की भागीदारी नहीं रहती है जब कि प्रजातन्त्र के लिये यह आवश्यक है कि जनता के हितों का तथा उस के विचारों का पता लगाया जाये तथा उन्हें मान्यता दी जाये। हम ने ऊपर कुछ प्रयोगों के बारे में बताया है जिस में जनता के जानकारी आधारित विचार जाने गये थे। पर यह केवल सीमित उद्देश्य के लिये सीमित संख्या में लोगों द्वारा था। इस बात का प्रयास किया गया था कि चर्चा में भाग लेने वाले यथासम्भव जनता के सभी समुदायों का प्रतिबिम्ब हों। परन्तु इस प्रकार की चर्चा का कोई संवैधानिक रूप नहीं था तथा यह शासन पर निर्भर था कि वह ऐसी सभाओ की अनुशंसा को स्वीकार करें अथवा न करें। केवल मंगोलिया में इसे संविधान में शामिल किया गया है पर वहाँ भी अंतिम निर्णय संसद का ही रहता है।


यदि ऐसी सभाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की जाये तथा इन की अनुशंसाओं पर से कार्य करना अनिवार्य हो तो एक नये प्रकार के प्रजातन्त्र का सूत्रपात हो गा। इसे हम विचारात्मक प्रजातन्त्र का नाम दे सकते हैं अथवा इसे सहकारी अथवा समूह आधारित प्रजातन्त्र कह सकते हैं।


साँख्यिकी दृष्टि से देखा जाये तो यदि प्रादर्श का चयन सही हुआ है तो वह पूरी जनता का प्रतिनिधित्व अच्छी प्रकार से करे गा। इस का एक बहुत कम प्रतिशत के अन्तर के साथ जनता का निर्देश माना जा सकता है। परन्तु यह ध्यान रखना हो गा कि कोई विशेष समूहांश इस में आवश्यकता से अधिक अतिक्रमण न करे। यह पद्धति उस से बेहतर होगी जिन में किसी मतसंग्रह द्वारा किसी प्रस्ताव पर रायशुमारी की गई जिस में जनता के लिये अन्य पक्ष के विचार जानने के कोई अवसर न हो। एक दूसरी समस्या है कि यह किस प्रकार निश्चित किया जो गा कि अधिकारी एवं शाासक वर्ग प्रदर्शित विचारों को मान्य करे गा तथा इन पर कार्रवाई की जाये गी।


उपरोक्त उदाहरणों से स्पश्ट है कि इस प्रकार के विचार विमर्ष में इन बातों पर विचार किया जाना आवष्यक है।

1. सभी भोगीदारों को काफी पूर्व प्रस्तावों के बारे मे, पक्ष में तथा विपक्ष में तर्क के बारे में जानकारी दी जाये।

2. सभी सदस्यों को चर्चा में भाग लेने का अवसर दिया जाये।

3. सभी को किसी भी तर्क पर प्रश्न उठाने का अवसर दिया जाये।

4. सभी को बिना किसी दबाव के अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया जाये।


एक अन्य बिन्दु पर विचार किया जाना आवश्यक है। यह आम अवधारणा है कि कई लोग बहुमत के साथ चलना पसन्द करें गे। आम तौर पर जनता का एक बड़ा अंश ऐसा होता है जिस की पूर्वधारित राय नहीं होती है चाहे वह जानकारी के अभाव के कारण हो अथवा उन की स्वभावजनित उदासीनता के कारण। चर्चा के दौरान उन को अधिक आरामदेह यही प्रतीत होता है कि वह बहुमत के साथ ही रहें। संख्या में ही सुरक्षा है, यह विचार अग्रणी रहता है। इस कारण ही चर्चा से पूर्व तथा चर्चा के पश्चात प्रश्नावली का उत्तर लेना उचित रहता है। जो प्रयोग ऊपर दिखाये गये हैं, उन से पता चलता है कि यदि ऐसा किया जाये तो इस प्रकार की विकृति अथवा विरूपण की सम्भावना बहुत कम रहती है। इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि उपरोक्त उदाहरणों में चर्चा समूह में प्रतिभागियों की संख्या सीमित रखी गई जिस से विचार विमर्श अधिक सुगम होता है। पूर्व के प्रयोगों में बीस या अधिक समूह बनाये गये थे। जहाँ तक राय की भिन्नता का प्रश्न है, यह स्वभाविक है। सर्वोच्च न्याायालय के न्यायधाीशों में भी मतैक्य नहीं पाया जाता है। अन्ततः प्रजातन्त्र में बहुमत का वर्चस्व रहना इस का लक्षण है।


प्रजातन्त्र में कई बार संसदीय समिति द्वारा इण्टरनैट पर, अथवा अन्यथा, लोगों की राय जानने का प्रयास किया जाता है। वास्तव में यह अब एक नियम सा ही बन गया है। इस के साथ ही कई बार मौखिक सुनवाई की परम्परा आरम्भ की गई है। इसे जनता की भागीदारी की संज्ञा दी जाती है। परन्तु यदि इस का अध्ययन किया जाये तो यह आम जनता की राय नहीें होती है। इस में केवल वही लोग भाग लेते हैं जिन के हित प्रभावित होते हैं। बहुत कम संख्या में ऐसे लोग सामने आते हैं जो केवल सार्वजनिक हित के कारण ही इस प्रक्रिया में भाग लेते है। दूसरे इन में अन्य लोगों की राय जानने का अवसर प्राप्त नहीं होता है। जब तक विचारों का आदान प्रदान न हो तब तक इन बैठकों में वास्तविक स्थिति जो जनता के हित में हो, सामने नहीं आती।


जनता के सभी पक्षों को किसी चर्चा में शामिल करने की एक पद्धति यह हो सकती है कि छोटे छोटे समूह बनाये जायें। एक ही दिन, जिसे ‘विचार दिवस’ की संज्ञा दी जा सकती है सभी समूहों को आपस में चर्चा करने का अवसर दिया जाये। इस चर्चा से पूर्व दूरदर्शन द्वारा एवं अन्य संचार माध्यमों द्वारा विशेषज्ञों द्वारा पक्ष एवं विपक्ष के तर्कों के बारे में जानकारी दी जाये। इन समूहों में विषय पर आपसी विचार विमर्श किया जाये गा तथा उस के बाद उन की राय ली जाये गी। प्रत्येक विषय पर अलग अलग राय ली जा कर वरिष्ठ स्तर पर इसे प्रेषित किया जाये गा।

जैसा कि पूर्व में कहा गया है, विचार समूह बनाने में यह आश्वस्त होने की आवश्यकता है कि वे सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व करते हों। इस के लिेये जब व्यापक विचार विमर्श की बात आती है तथा अनेक समूह बनाये जाते हैं तो इस बात पर अम्ल करने में कठिनाई आये गी। दूसरे हमारे देश में एक तो साक्षरता दर अन्य देशों (युगण्डा को छोड़ कर) की साक्षरता दर से काफी कम है। तीसरे परम्परा से हमारे देश में व्यापक तौर पर किसी चर्चा में भाग लेने से लोग बचते हैं। पंचायतों में देखा गया है कि यद्यपि कनून के अनुसार पिछड़े वर्ग के सदस्य भी पंचायत में रहते हैं किन्तु इन में अंतिम निर्णय सरपंच अथवा किसी वरिष्ठ व्यक्ति का ही होता है तथा इन की आवाज़ दब जाती है। अपवाद अवश्य हैं। चौथे यह बात शिष्टाचार में गिनी जाती है कि किसी की बात का यथासम्भव विरोध न किया जाये, कम से कम प्रत्यक्ष रूप से नहीं। इस भलमनसाहत में खुली चर्चा नहीं हो पाती है। इस स्थिति को दूर करने के लिये मनोवृति में परिवर्तन की आवश्यकता हो गी। इस प्रयास का आरम्भ तो प्रारम्भिक वर्षों में ही हो सकता है अर्थात शालाओं में। जब तक शाला में मुक्त प्रश्नोत्तर की आदत नहीं डाली जाये गी, आगे चल कर भी इस का अभाव रहे गा।


इस स्थिति में भी कुछ प्रगति चर्चा का अवसर प्रदान करने से हो सकती है। किसी विशिष्ट प्रस्ताव के सभी पहलुओं का अध्ययन तथा उस के बारे में व्यापक प्रचार लोगों को सोचने के लिये मजबूर कर सकता है। दूसरी कठिनाई संख्या की है। कितने लोगों को प्रतिनिधि के रूप में बुलाया जा सकता है। प्रतिनिधि का चयन कैसे हो गा, इस पर विचार करना हो गा। पंचायतों से इस की अपेक्षा थी पर वह सफलीभूत नहीं हो पाई। इस का एक तरीका यह हो सकता है कि बजाये चुनाव के (जो पंचायतों में होता है) लोगों को स्वेच्छा से एक समूह में आने के लिये प्रेरित किया जाये। इस से एक समरूप समूह बन सके गा। इस समूह द्वारा अपना एक प्रतिनिधि चुना जाये गा जो उस समूह में तय मत के बारे में बाहर बताये गा। हर समूह में कोई न केोई सदस्य होता है जो अपना मत व्यक्त करने में अधिक सक्षम होता है। समूहों के इन प्रतिनिधियों में से एक ऊपर की स्तर का समूह बनाया जा सकता जो इस तरह से बनाया जाये गा कि चयन पूर्णतया रैण्डम तरीके से हो गा ताकि जनता के सभी अंगों का प्रतिनिधित्व उस में आ सके। इस समूह में वैसी चर्चा की जा सकती है जिस के उदाहरण कई देशों के दिये गये हैं।

एक तर्क यह उठाया जा सकता है कि भारत जैसे विशाल देश में कितना बड़ा समूह हो गा। पर इस की आवश्यकता नहीं है। समूह गठन कई स्तर पर हो सकता है। किसी ग्राम अथवा नगर के लिये समूह हो सकता है। इस का एक उदाहरण चीन का है। चीन, जैसा कि विदित है, एक दलीय सरकार प्रणाली का पालन करता है। परन्तु इस में भी जनता की राय ली जाना पाया जाता है। वर्ष 2005 में वैनलिंग नगर के ज़ेगाउ क्षेत्र में विकास की बात पर सामूहिक चर्चा की गई थी तथा इस में 235 प्रतिनिधि चुने गये जो पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे। तरीका वही था जिस का ज़िकर किया गया है। पहले मत प्राप्त करना, फिर विशेषज्ञों केे साथ चर्चा तथा फिर बाद में मत प्राप्ति। पाया गया कि पूर्ववर्ती तथा पश्चातवर्ती राय में काफी अन्तर था पर यह किसी दबाव का परिणाम नहीं था। इस से प्रभावित हो कर पूरे नगर के बजट निर्माण के लिये यही विधि अपनाई गई। लोगों की प्रथमिकता शुद्ध पेयजल, स्वच्छता, पर्यावरण तथा एक सार्वजनिक पार्क थे न की बड़ी आकर्षक परियोजनायें जैसी कि शासक दल की अपेक्षा थी। इस में जनता की राय को स्वीकार किया गया।


इसी पद्धति का प्रसार अब चीन में हो रहा है तथा कई नगर इसे अपना रहे हैं। शंघाई नगर के पुस्तिंग क्षेत्र में 2015 में ऐसा ही कार्य लिया गया। चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग ने 2015 में इस प्रकार की सलाह आधारित प्रजातन्त्र के बारे में व्यक्तव्य दिया। आगे क्या हो गा, यह नहीं कहा जा सकता।


इस प्रकार के सामूहिक चर्चा प्रणाली में पाँच प्रकार की रूकावटें आ सकती है। यह हैं -

1. क्या मामला ऐसा है कि आपसी सलाह का कोई स्थान नहीं है।

2. क्या सलाह तथा कार्य में सम्बन्ध इतना कमज़ोर है कि यह अर्थहीन हो जाती है।

3. क्या सिस्टम राजनेताओं द्वारा इतना प्रभावित है कि कोई विरोधी बात पनप नहीं सकती।

4. क्या सामजिक प्रादुर्भाव इतना शक्तिशाली है कि परिणाम पूर्वापेक्षित होते हैं।

5. क्या जनता की राय इतनी बट चुकी है कि एक दूसरे की बात नहीं सुनी जा सकती।


भारत में सम्भवतः अंतिम चारों की स्थिति है। परन्तु फिर भी कई बातें ऐसी हैं जहाँ राजनेताओं से आपसी चर्चा प्रभावित नहीं होती है। उस से आरम्भ किया जा सकता है। हो सकता है कि यह अरम्भ में राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं के लिये उपयुक्त न हो परन्तु नगरों से, ग्रामों से इसे आरम्भ किया जा सकता है।


उदाहरण के तौर पर भोपाल में निर्णय लिया गया कि हबीबगंज रेलवे स्टेशन को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का बनाया जाये गा। भोपाल की जनता को कभी यह नहीं बताया गया कि इस का उन्हें क्या लाभ हो गा। वास्तव में इस बारे में जनता की राय लेना चाहिये थी। लाभ तथा हानि दोनों के बारे में विशेषज्ञ अपनी राय दे सकते थे। इस के बारे में समूहों द्वारा चर्चा की जा सकती थी जिस में रेल अधिकारी इस से होने वाले लाभ बता सकते थे। इस के पश्चात जनता द्वारा ही निर्णय लिया जाना चाहिये था कि वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का स्टेशन चाहती है अथवा नहीं।


एक दूसरा प्रकरण शिक्षा नीति का है जिस पर गत छह वर्ष से विचार हो रहा है। स्मृति ईरानी के काल में कहा गया कि कई स्तर पर इस पर विचार हो गा। कोई एक लाख बैठकों का दावा किया जाता है। इन से क्या सुझाव सामने आये, इस का कभी खुलासा नहीं किया गया। सुभ्रमनियम की अध्यक्षता में एक समिति बनी जिस को कहा गया कि वह इन सुझावों पर विचार करे किन्तु उस का प्रतिवेदन सार्वजनिक नहीं किया गया। फिर एक नई समिति बनी कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में। स्वयं समिति के अनुसार उन्हों ने नये सिरे से शिक्षा नीति पर विचार किया। पुराने प्रस्तावों पर अथवा सुभ्रामनियम समिति के विचारों का अध्ययन नहीं किया गया। इस में 400 पृष्ठ का एक लम्बा प्रतिवेदन दिया। इस पर सुझाव माँगे गये। एक समाचार के अनुसार इस पर एक लाख से अधिक सुझाव आये थे। इन पर अधिकारियों द्वारा विचार किया गया। पर इस के बारे में जानकारी नहीं दी गई। जनता के एक लाख से अधिक विचारों का प्रतिबिम्ब तो यह अवश्य ही नहीं हो गा। कस्तुरीरंगन समिति के विषेशज्ञों की राय को सम्भवतः कुछ महत्व दिया गया हो गा परन्तु पारदर्शिता के अभाव में कुछ कहा नहीं जा सकता।


सही तरीका यह था कि दस बीस बड़े परिवर्तनों के बारे में बताया जाता तथा उस पर रायशुमारी करा ली जाती। इस रायशुमारी के लिये समूह बनाये जाते जिन में हर समाज के, हर तबके के, हर आर्थिक स्तर के लोग रहते। इन को पूर्ण जानकारी दी जाती। विशेषज्ञ प्रत्येक प्रस्ताव के पक्ष तथा विपक्ष की बात बताते तथा फिर इस पर राय ली जाती। इस से जनता की, जनता के लिये, जनता द्वारा नीति बनती। अभी तो यह विशेषज्ञों की ही नीति है। इस के कार्यान्वयन में जनता की भागदारी संदिग्ध है। उदाहरण के तौर पर एक प्रस्ताव यह है कि आँगनवाड़ी तथा कक्षा एक से तीन को साथ रखा जाये। इस पर जनता समूहों की राय ली जा सकती थी तथा इसे सार्वजनिक किया जा सकता था।


उपरोक्त सारी चर्चा का निचैड़ यह है कि सामाजिक, आर्थिक, संगठनात्मक प्रगति नीचे से ऊपर की ओर बने न कि ऊपर से नीचे की ओर। इन सभी प्रकार के समूहों में विशेष बात यह है कि यह नीचे से ऊपर की ओर योजना बनाने में सहायता करते हैं। सामान्यतः भारत में योजनायें ऊपर से नीचे की ओर जाती है। अधिकारियों को केवल क्रियान्वयन का दायित्व सोंपा जाता है। जनता का दखल न योजना निर्माण में रहता है, न उस के क्रियान्वयन पर।

प्रष्न यह है कि संचार व्यवस्था में इण्टरनैट के कारण जो व्यापकता आई है, उस का इन समूहों पर क्या प्रभाव पड़े गा। इस में मिस्र का उदाहरण सामने है जहाँ एक दूसरे को सन्देश देने भर से तहरीर चौक पर लाखों व्यक्ति एकत्र हो गये। टिवट्टर पर तथा फेसबुक पर एक समान विचार रखने वाले अपना समूह बना लेते हैं जिन से उन के विचार को एक दूसरे का समर्थन मिलता है। इस व्यवस्था को कोई नीति स्वरूप दे कर वह शासन पर दबाव भी डाल सकते हैं। वैसे पहले भी इस के बारे में कहा गया है परन्तु ऐसे समूह विघ्वंसक रूप भी ले सकते हैं। इन समूहों से प्रजातन्त्र सुदृढ़ हो सके गा, इस में संदेह व्यक्त किया गया है। वाट्स एप्प का उपयोग लिंचिंग की स्थिति भी उत्पन्न कर सकता है। ऐसे में हमें समूह में तथा भीड़ में अन्तर करना हो गा। इन की प्रकृति में एक बात समान हैं। दोनों का ही लक्ष्य होता है जिस की प्राप्ति में वह प्रयासरत रहते हैं। अन्तर होता है लक्ष्य की प्रकृति में। अन्तर होता है कार्य की प्रकृति में। समूह में समूह के हितों को सुधारने का जज़बा रहता है। भीड़ में हित की बात आती ही नहीं है। समूह कब भीड़ में बदल जाये, यह भी निश्चित नहीं है। सरकार के विरुद्ध किसी मुद्दे पर विरोध करने का मन है। षाँतिपूर्ण सभी कार्य करने का इरादा भी है। पर यह नहीं कहा जा सकता कि कब किसी रूकावट (वास्तविक अथवा परिकल्पित) पर प्रदर्शनकारी भीड़ में परिवर्तित हो जाये। ऐसे में आम तौर पर कहा जाता है कि कुछ बाहरी तत्व घुस आये थे। पर इस का मतलब यही है कि समय पर समूह के उद्देश्यों पर नियन्त्रण नहीं रखा जा सका। परन्तु इस लेख में हम उन्हीं समूहों की बात कर रहे हैं जिन के हित परिभाषित हैं तथा जिन की प्राप्ति के लिये वे वैधानिक तरीके ही अपनाते हैं। प्रयास यही है कि इस प्रक्रिया को शासन का समर्थन भी प्राप्त हो क्योंकि यह शा सन के विरुद्ध नहीं हैं वरन् दस के पूरक हैं।


आजकल के तीब्रगति वाले संसाधन भी रैण्डम तौर पर चुने गये व्यक्तियों के विचारों से शासन को तथा राजनीतिक दलों को सूचित करा सकते हैं किन्तु इन सूचना के प्रदाय में आपसी बहस की तथा विषय के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने की सम्भवना क्षीण होती है। चयनित व्यक्तियों की आपस में कोई बात चीत नहीं होतीं तथा एक दूसरे के विचार भी ज्ञात नहीं हो पाते।


हमारे विचार में श्रृंखलाबद्ध समूह होने चाहिये। प्रारम्भिक स्तर पर समूह स्वैच्छिक हों गे। इन में सदस्यों की संख्या सीमित हो गी ताकि आपसी विचार विमर्ष वास्तविक हो न कि मात्र औपचारिक। यह समूह सर्व सहमति से अपना एक प्रतिनिधि चुने गा जो समूह का मत अगले स्तर पर गठित समूह में बताये गा। इस में इस बात पर बल दिया जाये गा कि समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधि इन में रहें। इस को देखने का दायित्व ज़िला अधिकारियों का रहे गा। इन समूहों में चर्चा उपरान्त पुनः समूह का प्रतिनिधि चुना जाये गा जो ततीय स्तरीय समूह का सदस्य हो गा। इन तृतीय स्तरीय समूहों के प्रतिनिधि एक सभा का रूप लें गे जो विधान मण्डल द्वारा लिये गये निर्णयों की अथवा किसी योजना एवं परियोजना की समीक्षा करे गा तथा उन पर अंतिम निर्णय ले गा। स्पष्टतः ही यदि उत्तर प्रदेश को लेते हैं तो मतदाताओं की संख्या 1450 लाख है तो ऐसे प्रतिनिधि लगभग 600 हो जाये गे जो किसी भी विषय पर अच्छी प्रकार चर्चा कर सकें गे तथा विधान मण्डल के निर्णय की समीक्षा कर सकें गे। छोटे राज्यों में यह पद्धति और अधिक प्रभावी हों गे। वास्तव में यह छोटे राज्यों के पक्ष में एक बड़ा तर्क हो गा।


जैसा कि पूर्व में कहा गया है, तथा पुनरावृति करना उचित हो गा, लघु समूहों द्वारा चर्चित तथा निर्णित प्रस्ताव जनता के हित को अधिक भली भाँति व्यक्त करें गे। इस कार्य को ग्रामों तथा नगरों से आरम्भ किया जा सकता हैं। निहित स्वार्थ को इस में अड़चन हो गी किन्तु यदि हम वास्तव में जनता का, जनता के लिये, जनता द्वारा प्रजातन्त्र चाहते हैं तो इस पद्धति को अपनाना हो गा जिसे हम ने सामूहिक प्रजातन्त्र का नाम दिया है।

(नवम्बर 2019)



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