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  • kewal sethi

प्रायश्चित

प्रायश्चित


- सुनो, चिण्टू को स्कूल में भर्ती कराना है। उस के लिये कैपीटेशन फीस चाहिये।

- तो?

- कुछ पैसा जी पी एफ से अडवांस में ले लो।

- अभी छह महीने पहले ही लिया था तुम्हारें फ्रिज के लिये

- मेरे का क्या मतलब है। हमारा नहीं कह सकते धे।

- पुराने वाला अच्छा भला काम कर रहा था। पर बार बार बड़ा चाहिये, बड़ा चाहिये, की रट लगाई हुई थी। पता नहीं उस में क्या रखना था जो छोटा पड़ रहा था। शायद साड़ियॉं रखनी हों।

- बस मेरी साड़ियॉं ही दिखती है तुम्हें। दिखती नहीं, चुभती हैं। भला, अब कोई ढंग से भी न रहे।

- पर बजट तो देखना पड़ता है न

- तुम्हारे पिता जी ने कुछ जमा कर के रखा होता तो काम आता। पर नहीं।

- उन के पास जितना था, जी पी एफ का, कम्यूटेशन का, सब मिला कर तो यह घर तुम्हारे लिये लिया न। वरना किराया देते देते मुश्किल हो जाती।

- अब तुम्हारी मॉं भी वक्त पर छोड़ गई न। नहीं तो कुछ मदद हो जाती।

चिण्टु वहीं था, बोला - मॉं, तुम्हीें ने तो कहा था कि हम एक घर में नहीं रह सकते। इसी लिये तो दादी गईं।

-चुप कर बे। बहुत बड़ बड़ करने लगा है।

- चिण्टु तुम बाहर जा कर खेलो। बड़ों की बात में नहीं बोला करते।

चिण्टु बड़बड़ाता हुआ बाहर निकल गया। आशिश बोला

- पर कहता तो ठीक था चिण्टु।

- क्या ठीक कहता है। दादी के लाड ने बिगाड़ दिया है।

- दादी के लाड ने या ......

- हॉं हॉं, तुम भी मेरा ही दोष बताओ गे। और क्या।

- मॉं होती तो उन की फैमिली पैंशन आती, कुछ आराम हो जाता।

- पर देती क्या? सब सम्भाल कर रखा हो गा।

- सारे पैसे तो तुम्हें दे देती थी। थोड़ा बहुत मंदिर के लिये बचा कर। बाकी सब तुम्हारे हवाले।

- क्या पता, बैंक में कितना था। कभी बताया ही नहीं।

- बताती तो वह भी खर्च हो जाता। और बड़ा फ्रिज आ जाता। खैर, अभी क्या करना है, यह सोचो।

- यह तुम्हारा काम है, मेरा नहीं। बच्चे को पढ़ाना है तो कुछ इंतज़ाम करना ही हो गा। वरना तुम्हारी तरह छोटी मोटी नौकरी ही कर पाये गा।

- सुनो, तुम्हारें पिता कुछ मदद कर सकते हैं।

- वाह, आखिर आ गये अपने पर। काफी कुछ तो दिया उन्हों ने पर अभी नियत नहीं भरी।

- क्या क्या मॉंग लिया मैं ने। मॉंगना तो मुझे हमेशा ही गल्त लगा। शादी में भी कछ नहीं मांगा। जितना है, उसी में रहना ही सिखाया गया था। पर अब चिण्टु की बात है, उन का भी तो कुछ लगता है।

- क्या यह सही हो गा। उन पर बोझ डालना।

- पर और रास्ता भी क्या है।

- दिल तो नहीं करता पर मजबूरी है। शनिवार को चलें।

शनि, इतवार का प्रोग्राम बना कर आशिश आशा और चिण्टु संग सुसराल पहॅंचे।

और वहॉं पर भौंचंका रह गया। आशा भी अपनी ऑंखों पर विश्वास नहीं कर पाई।

चिण्टू चिल्लाया - दादी।

आशिश बोला -

- मॉं, तुम यहॉं क्या कर रही हो।

जवाब दिया उस के सुसर ने।

- वह अब यहीं पर रहती हैं।

- क्यों। यह हो क्या रहा है।

आशा भी अपनी मॉं से कहने लगी।

- मॉं, यह सब क्या है। उलटी गंगा क्यों बह रही है। उन का भार आप पर।

- बेटी, यह कोई भार नहीं। बेटा, हम प्रायश्चित कर रहे हैं, और कुछ नहीं।

आशिश से चुप नहीं रहा गया। बोला

- प्रायश्चित, कैसा प्रायश्चित। ऐसा क्या कर दिया आप ने जिस का प्रायश्चित करना पड़े।

- बेटा, हम अपनी बेटी को घर चलाने का नुसखा नहीं समझा पाये, उसी गल्ती का प्रायश्चित कर रहे हैं। घर सुलह सफाई से चलता है। तानों और शिकायतों से नहीं, यह बात हम उसे सिखा नहीं पाये। परमात्मा हमें माफ करे, बस यही प्रार्थना है।


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