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पूर्व निर्मित भवन बाबत

  • kewal sethi
  • Jul 3
  • 2 min read

पूर्व निर्मित भवन बाबत

आज की बैठक का विषय था ‘‘पूर्व निर्मित सामान से भवन निर्माण’’। विचार यह था कि दीवारें इत्यादि कारखाने में बनाई जायें तथा इन्हें मौके पर ला कर उसे जोड़ने को कार्य किया जायें। इस पद्धति से एक तो समय बचे गा तथा दूसरा नगरों में जो प्रदूषण होता है उस से निजात मिले गी। कारखाने में जो सामान बने गा, वह सुरक्षा को ध्यान में रख कर बनाया जाये गा। इस से बिजली शार्टेज के कारण आग लगने का अथवा बरसात में छत से पानी टपकने का खतरा नही ंहो गा। इस प्रकार के भवन की आयु भी अधिक हो गी। एक और लाभ यह बताया गया कि वर्तमान में मज़दूरों को अपने गॉंव से दूर जा कर कार्य करना पड़ता है। इस से घरू जीवन प्रभावित होता है। कृत्रिम बुद्धि (ए आई) के द्वारा जो विषिष्ट सामान तैयार किया जाये गा, वह अधिक स्थाई, मौके की आवश्यकता के अनुसार, और शीघ्र तैयार हो सके गा।

इन में से कोई भी बात गलत नहीं है। परन्तु इस का एक पहलू और भी है। भारत में रोज़गार की कमी है विषेष रूप से कम पढ़े लिखों के लिये। एक बड़ा वर्ग भवन निर्माण में रोज़ी रोटी कमाता है। उन का क्या हो गा। यह कहना आसान है कि उन्हें कोई दूसरा काम मिल जाये गा। पर कहॉ।, कब और कैेसे, यह कभी स्पष्ट नहीं किया जाता। प्रषिक्षण से अवष्य दूरा कार्य कर सकते हैं परन्तु उस में समय लगता है। इस बीच क्या हो गा। पूर्वनिम्रित सामान बनाने वाली कम्पनी के समूह का फैम्पलैअ देख रहा था। कहा है ‘‘जो कार्य 100 मज़दूरों द्वारा आठ महीने में किया जाता है वह इस पद्धति से 40 से 50 वर्कर द्वारा कारखाने में तथा 20 से 30 वर्कर द्वारा साईट पर दो महीने में किया जा सके गा। गणना की जाये तो वर्तमान पद्धति से 19200 कार्यदिवस का जोड़ बैठता है। तकनालोजी के द्वारा यह 3,840 कार्यदिवस में हो जाये गा। इस का अर्थ है कि 80 प्रतिशत तक कार्यदिवस कम हों गे। ं

जहॉं तक लागत का प्रश्न है, उस में केवन सामान की लागत ही नहीं देखी जाये गीं। कारखाने की लागत, मशीनों पर व्यय, वर्कर के प्रशिक्षण का व्यय तथा उन के वेतन इत्यादि को भी देखा जाना है। साथ ही यदि विचार है कि कारखाना मज़दूरों के पैत्रिक घर के पास हो गा तो परिवहन का व्यय भी जाोड़ना पड़े गा।

एक बात यह कही गई है कि तकनालोलाजी को रोका नहीं जा सकता है। वह तो आये गी ही। मैं पूर्णतया सहमत हूॅं किन्तु उस की गति क्या हो, यह समय को तय करने दिया जाये। अभी भी मिक्सर इत्यादि आ गये हैं जो मौके पर ही कनक्रीट बनाते हैं। यह काम पहले मज़दूर ही करते थे। तकनालोजी को आने दिया जाये पर अपने समयसारणी के अनुसार और वैकल्पिक तैयारी के साथ।

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