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नेतृत्त्व

नेतृत्त्व


नेतृत्त्व की संकल्पना जिस रूप में इस समय हमारे देश में व्याप्त है वह कुछ एक पाश्चात्य विचारकों की देन है जिन का वास्तविक आधार सत्ता की राजनीति रहीं है। जब से हमें स्वतंत्रता मिली तथा देश में लोक शक्ति की प्रतीक लोकसभा तथा विधानसभाओं इत्यादि के लिए बहुसंख्यक वोटों के आधार पर चुनाव की प्रणाली आरंभ हुई, सत्ता के लिये संघर्ष आरंभ हो गया। तभी से स्वार्थ की पूर्ति प्रधान लक्ष्य बन गया, राजनीति एक ‘कोठा’ बन गई। दूसरों को खिला कर तब खाने की हमारी भारतीय अवधारणाएं पीछे छूट गई। सारा गड्डमड्ड हो गया। इस स्थिति में यह विचार करना आवश्यक हो गया है कि हमारा नेतृत्व कौन करें - सन्त, विचारक अथवा वे जिन की दृष्टि सत्ता प्राप्त करने तक सीमित रहती है। देशहित तथा राष्ट्रहित पीछे छूट जाता है। ‘मैं’ की भावना प्रबल हो जाती है। सत्य पर सभ्यता तथा भावना पर व्यवहारपटुता हावी हो जाती है।


इस का एक मात्र समाधान यह है कि उस शक्ति को जागृत किया जाये जिसे हम भूल चुके हैं। सत्य के अन्वेषण, समाज के कल्याण की जो भावना हमारे मनीषियों में थी, उसे जागृत किया जाये। जब स्वार्थ को त्याग कर जन कल्याण की बात सोची जाये गी, तभी व्यक्ति नेतृत्व के लिये योग्य हो गा।


निस्सवार्थ नेतृत्व का एक उदाहरण का उल्लेख करना उचित हो गा। इटली की राजनीतिक एकता के नायक थे जोसेफ मैजिनी। उन्हों ने अपने धुआंधार प्रचार से इटली की एकता के लिए संघर्ष किया. उन के प्रयास से इटलीवासियों में एकता की भावना जागृत हुई। जब आस्ट्रिया से प्रत्यक्ष युद्ध का अवसर आया तो उन्हों ने कहा कि यह सही है कि आप मुझे नेता मानते हैं परंतु युद्ध शास्त्र मेरा क्षेत्र नहीं है। इस के लिए गैरीबाल्डी ही उपयुक्त होंगे। उन्हें सैनापति बनाया जाये और मैं उन के अधीन कार्य करूंगा।


गैरीबाल्डी ने युद्ध में विजय प्राप्त की। रोम में प्रवेश किया और घोषित निर्णय के अनुसार विक्टर एमेन्यूल का राज्याभिषेक किया। उस के बाद उन्हों ने अनुमति मांगी कि अब देश को राजनीति और कूटनीति की आवश्यकता है और यह काम आप के प्रधानमंत्री कैहर ही कर सकते हैं। मुझे छुट्टी दी जाए ताकि मैं अपने गांव कैप्री जा कर खेती करूं। यदि आवश्यकता हो तो मुझे फिर बुलाया जा सकता है।


इस प्रकार के नेता जो अपनी सीमाएं भी जानते हैं तथा जिन के मन में इस प्रकार के त्याग की भावना रहती है तथा जिन में अपने राष्ट्र के प्रति इस प्रकार की भावना होती है वही असली नेतृत्व कर सकते हैं।


(लेख श्री देवेश चन्द्र द्वारा एक पुस्तक ‘नेतृत्व’ के परिचय से तथा पुस्तक में के एक लेख पर आधारित है। परन्तु पूर्णतः नकल नहीं है। पुस्तक के लेखक हैं भानु प्रताप शुक्ल)


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