नाम तो याद नहीं
- kewal sethi
- 6 days ago
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नाम तो याद नहीं
जब मसूरी में 3 जून का उपस्थिति दी तो वहों कुल मिला कर 105 परिवीक्षाघीन अधिकारी थे। उस समय निदेशक का पद रिक्त था तथा उप निदेशक श्री एम ए एस राजन ही प्रभार में थे। स्पष्ट ही सभी परिवीक्षाधीन अधिकारियों को उन को अपना परिचय देना आवश्यक ही था। प्रशिक्षण का प्रथम चरण सैना के साथ प्रशिक्षण का था। पॉंच एक दिन के पश्चत सभी परिवीक्षाधीन अधिकारी रवाना हुये। कश्मीर में श्रीनगर में प्रथम कार्यक्रम राज्य प्रमुख के साथ मुलाकात का था। उस में श्री राजन ने सभी अधिकारियों का परिचय कराया। प्रत्येक का नाम उन्हें याद था। उन की यह योग्यता मैं कभी नहीं भूल पाया।
वही बात कई राजनैतिज्ञों के साथ भी होती है। मुझे विश्वास है कि उन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितने लोगों के नाम तथा काम को याद रख सकते हें। उन का जन लोगों से सम्पर्क होता है उन की संख्या असीमित नहीं तो काफी अधिक तो होती ही है। परन्तु उन को तो सभी का नाम व काम याद रखना पड़ता है। जो ऐसा नहीं कर पाते वह छुटभैये ही रह जाते हैं।
मेरी स्थिति इस के बिल्कुल उलअ हैं मुझे नाम याद ही नहीं रहते। चेहरा याद रह जाता हेै पर नाम याद नहीं रहता। यहॉं तक कि अपने चपड़ासी जिस से रेाज़ ही वास्ता पड़ता है, उस का नाम भी याद नहीं रहता। वैसे घण्टी बजाने पर वह हाज़िर हो जाता है, नाम लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती परन्तु यदि कहीं उस के बारे में बात करना हो तो नाम नदारद रहने के कारण कर नहीं पाता। बस में एक सज्जन मिले। पहचान में तो आ गये पर नाम तो याद आना नहीं था। बात चीत होती रही, पुराने दिनों की। अलग होते वक्त मैं पूछ बैठा, भई, और तो सब ठीक है पर नाम याद नहीं आ रहा। पता नहीं, उन को कैसा महसूस हुआ हो गा।
पर आम तौर पर बिन नाम के ही काम चल जाता है। कहीं पढ़ा था एक सज्जन अपने 65 साल की पत्नि को डार्लिंग कह कर पुकारते थे। दोस्त ने कहा — यह होती हे मोहब्बत। वह बोले कहॉं की मोहब्बत, नाम भूल गया हूॅं और पूछते हुये शर्म आती है। कुछ वैसा ही किस्सा मेरे साथ भी है पर बीवी का आधार कार्ड देख कर नाम याद आ जाता है। पर एक बैठक में पास बैठे व्यक्ति से बात हुई। वह पूछ बैठे — मेरा नाम क्या है। मुझे लगा कि शायद वह अपना नाम भूल गये हों गे पर मुझे ही कौन सा याद था। उन्हों ने खुद ही बताया कि उन का नाम लूथरा है। मैं ने तुरन्त कहा - बिल्कुल, और आप भिलाई में थे। यह कह कर अपनी लाज बचाई।
पर कभी कभी नाम याद रहते हैं पर काम नहीं आते। हरीश नाम के एक मित्र घर पर आये और दरवाज़े पर से आवाज़ दी- सेठी। मैं ने अपने पिता जी को कहा कि आप को कोई बुला रहा है। वह बाहर निकले और फिर आ कर बताया कि उन्हें नहीं, मुढे बुलाया जा रहा है। में ने हरीश से पूछा कि भाई मेरा नाम ले कर क्यों नहीं पुकारा। उस ने बताया कि उन्हें याद ही नहीं आया। और कालेज में पुकारे गये सम्बोधन को वह दौहराना नहीं चाहते थे ताकि पड़ौसी न जान पायें। कालेज में तो इस तरह के प्रचलित नाम रखे ही जाते है और वही याद रह जाते हैं, इसी नाम तो रह ही जाते हैं अब हमारे एक प्रोफैसर थे जिन का नाम था प्रणाम सिंह। यह प्रचलित नाम था। उन की आदत थी कि क्लास में आते ही वह झुक कर बात शुरू करते थे, इसी से उन का यह नाम था। वास्तविक नाम तो, यदि मुझे सही याद है तो, प्रमाण सिंह था।
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