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नवाज़ शरीफ़ की पाती मुजाईदीन के नाम

  • kewal sethi
  • Jul 19, 2020
  • 2 min read

time for another of my poems. as usual, this is a period poem and will be understood when you recall the times in which it was written.

pakistan launched an attack in kargil - the aim was to quickly run over the area but it did not go that way. the international community did not take it kindly. pakistan had to seek a ceasefire and we, as usual, were ready to oblige. pakistan claimed that volunteers had launched the attack. what he told them urging them to withdraw is depicted here.


नवाज़ शरीफ़ की पाती मुजाईदीन के नाम


हे मेरे प्यारे मुजाईदीन भाईयो, अब लौट आओ

तुम्हारी बहादुरी ने पाकिस्तान का नाम डुबो दिया है।

थोड़ी बहुत इज़्ज़त बची थी जग में, उसे धो दिया है।।

तुम्हें कश्मीर समस्या को बीनअलाकवामी बनाना था।

है मुसलिम कश्मीर अपने मुल्क का यह जतलाना था।।

दुश्मन की फौजों को बहुत कमज़ोर दिखलाना था।

कश्मारियों में असुरक्षा की भावना को जगाना था।।

तुम ने आज यह सब क्या कर दिखा दिया है।

बस सब उलटा पुलटा कर के काम किया है।।

इस लिये हे मुजाहदीन भाईयो, अब लौट आओ


आज सारा संसार पाकिस्तान के पीछे खड़ा है।

फर्क यह है कि डंडा ले के हमारे पीछे पड़ा है।

मुसलिम कश्मीर में तो जूं तक नहीं रेंगी है।

उलटे वहां पर सैलानियों की संख्या बढ़ी है।।

हमारे फौजी मार खा कर पसपा होते आ रहे हैं।

हिन्दूस्तानी सैनिक चौकी दर चौकी बढ़े आ रहे हैं।

आगे बढ़ना दूर अपने स्थान पर भी टिक नहीं पाए।

बढ़ते हुए भारतीय एक क्षण भी तुम से रुक न पाए।।

इस लिये हे मुजाहदीन भाईयो, अब लौट आओ


मैं ने विदेश मंत्री को दिल्ली भेजा तुम्हारी खातिर।

शायद इसी बदौलत आ जाओ तुम जान बचा कर।।

फिर अपना गुप्त संदेशवाहक भी मैं ने भिजवाया।

पर वह भी खाली हाथ ही लौट कर था आया।।

मैं भागा भागा चीन के नेताओं से भी मिल आया।

पर उन्हों ने तुम्हें बचाने का राह कोई न सुझाया।।

फिर मैं ने वाशिोंटन जा कर अपना पासा फैंका।

पर कलिन्टन ने भी दिखा दिया मुझ को ठैंगा।।

लंदन जा कर ब्लेयर के पास रोना रो आया।

पर उन्हों ने भी अपने को असमर्थ ही पाया।।

इस लिये हे मुजाहदीन भाईयो, अब लौट आओ


यूं सब से कह दिया है मेरा तुम्हारा वास्ता नहीं।

इस के सिवा बदनामी से छुटकारे का रास्ता नहीं।।

पैसे दिये, हथियार दिये, अपने पास ठहराया उकस़ाया।

मैं ने ही तुम्हें कश्मीर जाने का सबक सिखाया।।

यह सब इस उम्मीद में कि तुम कुछ कर दिखाओ।

पूरा कश्मीर न सही एक हिस्सा तो हमें दिलवाओ।।

पर क्या मालूम था यह तुम्हारे बूते की बात नहीं।

भारतीय सैना के सामने तुम्हारी कोई बिसात नहीं।।

बस मुल्क में ही घुर्राते रहना आता है आप को।

कर दिया तबाह तुम ने पाकिस्तान के नाम को।।

इस लिये हे मुजाहदीन भाईयो, अब लौट आओ


बहुत हो चुका अब और नाक न कटवाओ।।

इस लिये हे मुजाहदीन भाईयो, अब लौट आओ


केवल कष्ण सेठी जुला्ई 11, 1999


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