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धार्मिक शिक्षा

धार्मिक शिक्षा

केवल कृष्ण सेठी


क्या विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा दी जाना चाहिये। जहाॅं विज्ञान, भूगोल, कला के बारे में बताया जाता है वहाॅं क्या धर्म के बारे में भी बताया जाना चाहिये। और क्या इस शिक्षा के लिये सिद्धाॅंत वही रहें गे जो सामान्य विषयों के लिये प्रचलित हैं। इस लेख में इन बातों पर विचार किया गया है।

शिक्षा का मुख्य लक्ष्य है मन को झंझोड़ना। उसे इस हद तक परिपक्व करना कि वह किसी भी विषय पर स्वतन्त्र रूप से सोच सके। उसे इस सीमा तक तैयार किया जाना कि वह अपने हित या अहित के बारे में निर्णय करने के योग्य बन सके। अध्यापक के लिये केवल जानकारी देना ही पर्याप्त नहीं है। छात्रों में विश्लेषण के तरीके, स्वतन्त्र विचार करने की शक्ति तथा नई खोज करने की जिज्ञासा भी उत्पन्न करना शिक्षा के अनिवार्य अंग के रूप में लिया जाना चाहिये। क्या धार्मिक शिक्षा इस परिधि के अन्तर्गत आती है।

धर्म के मामले में यूॅं तो सत, सत्य, सत्ता के बारे में अन्वेषण करने की अपार सम्भावनायें हैं। गणित, विज्ञान, भूगोल की सीमायें हैं पर सत्य की सीमा नहीं है। पर हमारी मंशा यहाॅं पर दर्शन की शिक्षा से नहीं है। वरन् शिक्षा के तौर तरीके पर विचार करना हमारा ध्येय है। आजकल धार्मिक शिक्षा के बारे में पाठ्यक्रम उदासीन हैं। पर यह सामान्य बात है कि सभी विद्यालय सामान्य नैतिक सिद्धाॅंतों पर ज़ोेर देते हैं। विशेष रूप से सत्य, अनुशासन, भ्रातृत्व भावना के सिद्धाॅंतों पर।

धर्म की विशिष्टता इस में है कि इस में पाॅंच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ग्रहण किये जाने वाले अनुभव से परे भी कुछ है। इस कारण से आज विद्यालयों में स्थाूल विषयों पर जो ज़ोर दिया जाता है, उस से यह मेल नहीं खाता। इस का कारण सभवतः यह भी है कि सामान्य विषयों का सार जीवन में है परन्तु धर्म का आधार मृत्यु है। इस जीवन के पश्चात क्या हो गा, यह धर्म का विषय है।

आज के युग में प्रजाताॅंत्रिक मूल्यों का केन्द्रीय स्थान है। शिक्षा में भी इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि छात्रों को शिक्षा दी नहीं जाती वरन् वह इस को ग्रहण करते हैं। अध्यापक का कार्य उस की क्षमता का विकास करना है। यह सिद्धाॅेत धर्म के प्राचीन सिद्धाॅंत विशेषतया पुस्तक आधारित धर्मों के सिद्धाॅंत के विपरीत जाता है। ईश्वर ने हमें बनाया, इस में शक करना शायद कठिन न हो पर एक मनुष्य विशेष की शरण में जाने से हम अपने कर्मों के फल से बच जायें गे, प्रजाताॅंत्रिक मूल्यों तथा सामान्य प्राकृतिक सिद्धाॅंतों से मेल नहीं खाता। परन्तु यदि इसे छोड़ दिया जाये तो धार्मिक शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा में कोई अन्तर नहीं रह जाये गा।

सामान्य अनुभव के आधार पर धार्मिक शिक्षा के संदर्भ में यह प्रश्न भी पूछा जा सकता है कि क्या मानवीय अनुभव में इतना विश्वास वाॅंछनीय है। क्या यह स्वयं को सर्व शक्तिमान मानने की भूल नहीं है। कई बार प्राकृतिक शक्तियों के सामने अपने पराभव के पश्चात भी किये जाने वाला यह दावा अधिक विश्वसनीय नहीं है।

कुछ विद्वानों का मत है कि शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य सत्य की खोज है। इस दृष्टि से देखा जाये तो तो पूरी शिक्षा - चाहे विषय कुछ भी हो - धार्मिक शिक्षा ही है। यदि शिक्षा को समग्र माना जाये तो वह धार्मिक शिक्षा ही है।

धर्म परायण लोग इस बात को नहीं मानते। उन का कहना है कि केवल मानवतावादी धार्मिक शिक्षा ही वास्तव में धार्मिक शिक्षा नहीं है। सत्य ही काफी नहीं है। दैविक सत्य पर विश्वास अनिवार्य है। मानवतावादी परमात्मा को भी एक कानूनसाज़ के रूप में मानते हैं जिस के बनाये नियम अनुभव के आधार पर सदैव दी गई परिस्थिति में एक समान रहते हैं। वह अपने को उसी स्तर पर उठाने की सोचते हैं।

जहाॅं तक सनातन (हिन्दू) धर्म का प्रश्न है, उपनिषद इस बात का सर्मथन करते हैं। प्रत्येक मनुष्य परमात्मा का ही अंश है। और जीवन का लक्ष्य है उसी में वापिस मिलना। वह क्रमशः अपने शुभ कर्मों द्वारा ऊपर उठाये जाने का प्रयास करता है यहाॅं तक कि वह लक्ष्य प्राप्त कर ले गा। यद्यपि बौद्ध धर्म ईश्वरीय सत्ता के बारे में मौन है किन्तु निर्वाण का लक्ष्य एक प्रकार का समानान्तर ध्येय ही है। पर पुस्तक आधारित धर्मों में मनुष्य स्वयं को ईश्वर के तुल्य नहीं बना जा सकता है। वह हमेशा उस से नीचे रहे गा। उस का ध्येय ‘प्रारम्भिक गुनाह’ से निजात पा कर पूर्व की स्थिति में आना है जब वह आदम के समान सदैव आनन्द में (यद्यपि वह पाप इत्यादि से अनभिज्ञ) रहे गा। इस के लिये वह स्वयं कुछ नहीं कर पाता है। उसे एक मसीहा की आवश्यकता है। और उस में विश्वास ही एक मात्र रास्ता है। शुभ कर्म भी इस विश्वास के सामने नगण्य है। यदि वह विश्वास रखता है तो उस के पाप भी क्षमा कर दिये जायें गे। जबकि सनातन (हिन्दू) तथा अन्य भारतीय धर्मों में ऐसा नहीं है। हर कर्म का फल निष्चित श्प से प्रापत हो गा।

संक्षेप में पुस्तक आधारित धर्म दैवी सत्यों पर आधारित हैं जिन के बारे में अध्यापक द्वारा बताया जाना सम्भव नहीं है क्योंकि उस में कम बढ़ नहीं की जा सकती। इसी से धार्मिक शिक्षा का मार्ग अवरुद्ध होता है। इस कारण से ही धार्मिक शिक्षा को पाठ्यक्रम से से ही निकाल दिया गया। चूॅंकि धार्मिक शिक्षा तथा अन्य विषयों की शिक्षा के आधार ही भिन्न है अतः उन को एक साथ पढ़ाना कठिन है। इन धर्मों में परमेश्वर एक राजा के समान है और मनुष्य एक विद्रोही है। उसे राजा द्वारा दण्ड दिया जाना है। उस को बचाने के लिये एक वकील की आवश्यकता है। यह कल्पना भी की जाती हे कि उस के पाप कोई अन्य अपने सिर पर ले लेता है। प्रजातन्त्र में इस प्रकार की धारणा नहीं हैं इस में राजा तथा प्रजा की कल्पना नहीं हो पाती तथा केवल नियम ही रह जाता है।

पुस्तक आधारित धर्मों के अनुसार मनुष्य ने ‘प्रारम्भिक गुनाह’ किया है अतः वह अक्षम्य है। कैथोलिक दृष्टिकोण के अनुसार ईडन के बाग में आदम को मानवीय तथा दैवी शक्तियाॅं प्राप्त थीं। ईश्वर से विद्रोह कर उस ने अपनी दैवी शक्तियाॅं गॅंवा दी। पर उस की मानवीय शक्तियाॅं बरकरार रहीं। मानवीं शक्तियों दो थीं - एक तो बुद्धि की पूर्णता और उस का कर्मेन्द्रीयों पर पूर्ण नियन्त्रण। दूसरे अमरत्व जिस में मृत्यु तथा लालच से निजात शामिल थी। चूॅंकि मूल मानवीय शक्तियों का नाश नहीं हुआ अतः शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता पर प्रभाव नहीं पड़ा। ईसाई मत के ही दूसरे पक्ष की मान्यता है कि आदम को न केवल दैवी शक्तियों से हाथ धोना पड़ा वरन् उस की मानवीय शक्तियों में भी कमी आई। कैल्विन के मतानुसार तो मनुष्य सवयं ही निकृष्ट है तथा बिना दैवी सहायता के उस का उद्धार नहीं हो सकता। शिक्षा से कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है।

रूसो तथा बाद के समाज शास्त्रियों की मान्यता है कि मनुष्य मूलतः निकृष्ट नहीं है। उस की प्रकृति अच्छी है तथा शिक्षा से इसे और सुधारा जा सकता है। मानव के पास जो शक्तियाॅं हैं वह सदैव से हैं। उन में से न कुछ छीना गया न कुछ रोका गया। संतोषजनक सामाजिक पर्यावरण में वह ऊपर आ सकता है।

इस दृष्टि से यह समाज शास्त्री भारतीय सिद्धाॅंतों के निकट हैं। हमारी धारणा है कि मनुष्य की प्रकृति मूलतः न अच्छी है न बुरी है। सत, राजस तथा तामस प्रवृतियों का सब में वास होता है। जो प्रवृति जिस समय दूसरों को दबा लेती है तो मनष्य की प्रवृति वैसी हो जाती है। पर एक ही मानव में उन का उतार चढ़ाव रहता हैं जिस से मानव अलग अलग परिस्थिति में भिन्न भिन्न आचरण करता है। अतः मानव को सही रास्ते पर लाया जा सकता है तथा सात्विक प्रवृतियों को सुदृढ़ किया जा सकता है। यही धार्मिक शिक्षा का लक्ष्य है।

पाश्चात्य धार्मिक शिक्षा में तीन शब्द विशेष महत्व रखते हैं। पाप, पुनरोत्थान, तथा कृपा। पाप तथा गल्ती में अन्तर देखना आवश्यक है। सामान्य शिक्षा में वाॅंछित व्यवहार से भिन्न व्यवहार को गल्ती माना जाता है जब कि धर्म में इसे पाप की संज्ञा दी जाती है। पर गलती में सुधार की गुॅंजाईश निहित है। पाप का केवल परायश्चित ही किया जा सकता है। सुधार शिक्षा के माध्यम से सम्भव है। पर परायश्चित के लिये पुनरोत्थान अनिवार्य है। यह माना जाता है कि पाप हमेशा जान बूझ कर ही किया जाता है। अतः उस का निवारण परायश्चित से होता है। अपने आप को ईश्वर के हवाले करना इस का एक पक्ष है। इस में पूजा भी शामिल है। यदि ऐसा नहीं होता तो सत्य को पाना असम्भव है। एक तरह से यह संगीत को सीखने के समान है। सुर मिले गा तभी राग चल पाये गी। यह सामान्य शिक्षा से नहीं सिखाया जा सकता। जैसे कोई बहरा व्यक्ति संगीत नहीं सुन पाता, कुछ व्यक्ति जिन पर कृपा नहीं है वह यह नहीं समझ पाते। इसी तरह धर्म को सीखने के लिये भी कृपा की आवश्यकता है। कृपा केवल ईश्वरीय देन है। उसे अर्जित नहीं किया जा सकता। वह केवल एक मसीहा को मानने पर ही मिल सकती है। शिक्षा इस में कोई योगदान नहीं दे सकती। इस तरह से धर्म तथा शिक्षा में कोई सम्बन्ध स्थापित करना पुस्तक आधारित धर्मों के लिये अत्यन्त कठिन है।

इस का परिणाम यह हुआ कि सामान्य विद्यालय धार्मिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं करते। यह केवल रविवार की कक्षाओं का विषय माना जाता है। मुस्लिम समाज में इसे मदरसों के लिये जायज़ माना जाता है। वहाॅं पर सामान्य शिक्षा नहीं दी जाती। इस से सिद्धाॅंतों का जो प्रश्न सामान्य शिक्षा में उठता है वह आड़े नहीं आता। यह अलग बात है कि यदि इस में सावधानी न बरती जाये तो वह पिछड़ापन आ जाता है जो सामान्य शिक्षा के आड़े आता है। ईसाई समाज में षिक्षा और धर्म में अलगाव का ग्रहण कर लिया गया है। उन्हें अलग रखा जाता है पर वह एक दूसरे में हस्तक्षेप नहीं करते। मुस्लिम समाज में अभी इस ओर बहुत धीमी गति से प्रगति हो रही है। सम्भवतः यही कारण है कि विज्ञान के क्षेत्र में उन का योगदान अधिक नहीं है।

मानवीय धर्म में भी पाप, कृपा इत्यादि का महत्व है पर इस के साथ साथ ही एक शैक्षणिक स्वतन्त्रता भी साथ साथ चलती है। इस देश में हमेशा से खुले शास्त्रार्थ का प्रचलन रहा है। कोई भी वाद जब तक वह अपने को मान्य सिद्धाॅंतों के अनुसार स्थापित नहीं कर पाया, पनप नहीं सका। वह तभी मान्य हुआ जब उस के प्रवर्तकों ने उसे शास्त्रार्थ में स्थापित कर दिया। धर्म के सिद्धाॅंत ज्ञान के चैक में सर्वसाधाण के सम्मुख प्रमाणित किये जाते हैं। वर्तमान काल में भी इस परम्परा को आदिशंकर तथा मण्डन मिश्र के प्रसिद्ध शास्त्रार्थ में देखा जा सकता है। उन्नीसवीं शताब्दि में स्वामी दयानन्द ने भी वाराणसी, मथुरा इत्यादि में अपने विचारों का प्रतिपादन शास्त्रार्थ में किया।

इस वैचारिक स्वतन्त्रता के कारण यहाॅं ‘छोड़ो या मानो’ ( जंाम पज वत समंअम पज ) का सिद्धाॅंत लागू नहीं होता। शैक्षणिक विकास में कोई बाधा नहीं आती। विद्या (अध्यात्मिक ज्ञान) या अविद्या (संसारिक ज्ञान) दोनों को ही ही प्राप्त होने पर अमृत प्राप्त होता है। यह उपनिषद का कथन है। इस कारण से इस देश में धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर कोई अड़चन नहीं आती है।

दुभाग्यवश हम पाश्चात्य अनुभव के आधार पर ही अपनी नीतियों का निर्णय करते हैं। चाहे वह वित्तीय व्यवस्था के क्षेत्र में हो, राजनैतिक क्षेत्र में हो, स्वाास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में हो अथवा शिक्षा के क्षेत्र में हो। चूॅंकि धार्मिक शिक्षा सामान्य शिक्षा से पाश्चात्य वातावरण में मेल नहीं खाती अतः हम ने भी इस के विरुद्ध धारणा बना ली है। हम ने भी उन की नकल करते हुए इस का बहिष्कार कर दिया। पश्चिम में एक बचत का रास्ता है। चर्च की पकड़ यद्यपि उतनी नहीं है जितनी मध्यकालीन युग में थी। पर उस कर क्रमबद्ध संरचना ीपमतंतपबींस वतहंदपेंजवद में कोई अन्तर नहीं आया है। उस के अतिरिक्त पुस्तक आधारित धर्मों में ेंइइंजी की जो पद्धति कायम की गई है वह भी एक उपलब्धि है जिस का महत्व कम कर नहीं आॅंका जा सकता। अतः पश्चिम में रविवार (यहुदियों में शनिवार, मुस्लिम समाज में शुक्रवार) पाठशाला के माध्यम से धार्मिक परम्परा को प्रचलित रखने का प्रयास चलता रहता है। और वह सामान्य जीवन को प्रभावित करते रहते हैं। एकतन्त्रवाद का यह अवशेष विद्यमान है। भारत में वातावरण ही हमेशा से प्रजातन्त्र तथा विकेन्द्रीयकरण का रहा है। अतः इस प्रकार का संगठन विद्यमान नहीं है। फलस्वरूप हम दोनों ओर से मारे जाते हैं। विद्यालय में इसे पढ़ाया नहीं जाये गा। अन्य कोई साधन है नहीं। इस कारण हमें चयन करना हो गा और हमारी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा ही एक मात्र रास्ता है।

व्यवहारिक पहलू का अध्ययन आवश्यक है। पुस्तक आधारित पंथ के अनुयायी भारत में भी बड़ी संख्या में रहते हैं। शासकीय विद्यालयों में तथा अन्यत्र भी हिन्दू पंथ के सिद्धाॅंतों को कैसे पढ़ाया जा सकता है। दूसरी ओर बहुसंख्यक समाज को क्या इस कारण जीवन की इस अमूल्य निधि से वंचित करना उचित हो गा। अल्पसंख्यक वर्ग के विश्वास की रक्षा करना भी हमारा दायित्व है। यह हो सकता है कि उन्हें इन कक्षाओं मे अनुपस्थित रहने की अनुमति दी जाये। पर क्या इस अवधि में उन्हें अपने पंथ के बारे में श्सिक्षा दी जाये। कठिनाई यह है कि इस शिक्षा के सिद्धाॅंत अन्य शिक्षा से मेल नहीं खाते। यदि सत्य की खोज न सिखाई जाये तो अंध विश्वास ही सिखाया जा सकता है। इस में अन्य पंथों की हीन समझना भी शामिल है जिस से वैमनस्य की भावना ही पनपे गी।

यदि इसे भारतीय संस्कृति मान कर ही देखा जाये तो उपरोक्त समस्या का समाधान हो सकता है। हम भारतीय हैं। यदि यह भावना प्रबल हो सके तो इस देश की प्राचीन संस्कृति के बारे में जानने तथा उस के बारे में सोचने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होगा। उस से भिन्न विचार रखने पर भी बंदिष नहीं हो गी।

क्या पाश्चात्य रंग में रंगे हमारे शिक्षाविद् इस चुनौती को स्वीकार कर धार्मिक शिक्षा के संदर्भित होने के विरुद्ध तर्कपूर्ण उत्तर दे सकें गे। यदि नहीं तो उन्हें स्वयं आगे आ कर इसे अपनाने के लिये सम्बन्धित अधिकारियों पर ज़ोर दिया जाना चाहिये। विद्यमान समस्याओं की जड़ अपनी संस्कृति, अपने धर्म से विमुख होने में है। यदि हम ने अपने पूर्वजों के प्रताप को ग्रहण कर लिया तथा परिश्रमपूर्वक उन के अनुगामी होने का प्रयास किया तो भारत को उन्नतिपथ पर चलने से कोई नहीं रोक पाये गा।

अस्तु।



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