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  • kewal sethi

दिलेरी और बीमारी

दिलेरी और बीमारी

दिलेरी दफतर जाने के लिए तैयार हो ही रहा था कि उस की बीवी ने कहा कि उसे जुकाम हो गया है, और तुरंत दवाई लेने के लिये डिस्पैंसरी जाना है। दिलेरी ने दिलासा देते हुए कहा कि ज़ुकाम तो 7 दिन में अपने आप ठीक हो जाता है। इस के लिए दवाई की क्या जरूरत है? उस की बीवी इस जवाब के लिये तैयार थी। फौरन ही बोली और अब यह कहो गे कि दवा लेने से एक हफते में ठीक हो जाऊॅं गी। परन्तु यह तर्क नहीं चल पाये गा। दवाई चाहिये और आज ही चाहिये। ये जो हालत चल रही है, इसे देखते हुये तुम्हे तो आज डिस्पैंसरी जाना ही है।

दिलेरी क्या करता, क्या कहता। झोला उठाया और चल दिया। डिस्पैंसरी पहुूंचा तो दरवाजे पर ही देखा कि रजिस्ट्रेशन वाली खिड़की बिल्कुल खाली है। उस का दिल बाग बाग हो गया। आज तो कमाल है, जल्दी से छुटकारा पा जायें गे। वो जल्दी से अंदर पहुंचा। लेकिन जैसे ही वो खिड़की पर पहुॅंचा, खुशी हवा हो गई। उस ने देखा कि खिड़की के इस तरफ भी कोई नहीं है, तो खिड़की के दूसरी तरफ भी कोई नहीं है। अब वो पशोपेश में पड़ गया कि क्या करें। हो सकता है, बाबू चाय पीने चल दिया हो। कब तक चाय पिएगा, कब आएगा, क्या पता? इधर उधर लोग भी बैठे हुए थे। इंतजार में, शायद उन का नम्बर लग चुका था? पर एक ने आवाज दे कर कहा, बाबूजी, वहाँ क्या कर रहे हो, लाईन नहीं आ रही, इसलिए यही आ कर बैठ जाओ। हम सब लाईन का इंतज़ार कर रहे हैं।

दिलेरी जा कर बैठ गया। जैसा कि अकसर हेता है, थोड़ी देर चुप्पी के बाद बातें शुरू हो गईं। हमेशा आदान प्रदान इस बात से ही शुरू होती है - आप कौन से दफ्तर में काम करते हो, क्या काम करते हो, किस कौम से हो? वगैरह वगैरह। फिर लाईन की बात शुरू हो गई। जब देखो तभी नैट नहीं आ रहा। पहले आदमी हाथ से काम करता था तो कभी यह नहीं होता था कि कलम नहीं आ रही। जब नैट आने लगा तो सब ने कहा, अब ज़िदगी सुधर गई। सब कुछ आराम से हो जाये गा। मिनटों में डाक्टर भी कम्प्यूटर पर दवाइ लिखे गा। स्टोरकीपर वहीं से जान जाये गा कि कौन सी दवाई देनी है। दो मिनट में देने भी लगे गा। कागज़ खतम। दूसरे ने कहा - अरे भाई आत्मा तो अमर है। वह कभी खत्म नहीं हो सकती। यही हाल कागज़ का है। वह कभी खत्म नहीं हो सकता। रूप बदल सकता है पर उसे समाप्त नहीं किया जा सकता। तीसरे ने कहा कि कागज़ का वही हाल है जैसे फाईल का। कोई फाईल खत्म नहीं हो सकती। किसी दफतर में उसे खत्म करने की बात हुई पर यह भी कहा गया कि पहले उस की नकल रख लेना। कागज़ का भी वही हाल है।

बैठे बैठे, बतियाते बतियाते, कुछ समय गुजरा। अचानक कमरे से किसी की आवाज आई - नैट आ गया। बाहर बैठे एक व्यक्ति ने कहा - नैट आ गया। उस की बात सुन एक और ने कहा कि नैट आ गया। दूसरे ने कहा, तीसरे ने कहा। एक खुशी की लहर चारों तरफ फैल गयी। सब बैठे हुये उठ कर रजिस्ट्रेशन खिड़की के सामने आ गये। थोड़ी बहुत बहस हुई कि कौन पहले आया, कोैन बाद में। कुछ कहा सुनी हुई पर कतार तो बन ही गई। दिलेरी को पांचवां नंबर मिला। कुछ तो मिला। अब इंतज़ार शुरू। दिक्कत यह हुईं कि डॉक्टर दो थे पर एक अभी तक आया नहीं था। शायद वो भी बाहर चहल कदमी कर रहा हो गा। क्योंकि यहाँ तो लाइन ही नहीं थी तो काम हो ही नहीं सकता था। कुछ लोग बाहर गये, उसे डूॅंढ कर बताने के लिये कि लाईन आ गई। उस के कमरे के समाने कतार लग गई। कुछ देर लगी पर आखिर डाक्टर मिल गया, आ गया। गाड़ी चल पड़ी। एक दूसरे को ही कह कर कि मैं तुम्हारे पीछे हूँ, तुम मेरे आगे हो, अपनी जगह सब ने तय कर ली। एकाध अपनी जगह इस प्रकार सुनिश्चित कर कुर्सियां पर बैठ गये। जब वहॉं चैन नहीं पड़ा तो फिर से आ कर लाईन में लग गये और दरवाजे पर आ गए। हालांकि आगे अभी तीन आदमी थे। डॉक्टर साहब आराम से रोेगी की बात सुनते, नुसखा देखते थे और कम्प्यूटर पर दवाई क नाम तलाश्ते और उस को प्रिण्टर में भिजवा देते। कुछ देरी इस कारण लगी कि दिलेरी के आगे वाला व्यक्ति के पास हॉस्पिटल का जो पर्चा था, उस पर बारह दवाईयॉं लिखी थी। उस पर तुर्रा यह कि वह व्यक्ति हर दवाई के बारे में डॉक्टर का बताते जाते थे, उस पर बहस करते। कितनी बार लेनी है, कब लेनी है। क्या पानी के साथ ले लें। पानी गर्म हो या ठण्डा। सोते समय ले लें क्या। समय तो लगना ही था। पर आखिर दिलेरी की बारी आ गई।

दिलेरी की बारी आई औ डाक्टर ने उस की बात सुन का सात गोलियॉं वाला पर्चा उन के हाथ थमा दिया। ज़रा से ज़ुकाम के लिये सात गोलियॉं। दिलेरी को समझ नहीं आई। उसे याद आया कि उस के पिता कहा करते थे कि जब वो बीमार होते थे तब कमेटी की डिस्पेंसरी में जाते थे। वहॉं पर तीन तरह की दवाईयॉं बड़ी बड़ी बोतलों में रखी होती थीं। एक लाल रंग की दवाई, एक मटमैले रंग की और एक अन्य बिना रंग के। सीधा सा मामला था। अगर किसी ने कहा कि गला खराब है या ज़ुकाम है तो लाल रंग की दवाई मिले गी। अगर किसी का पेट खराव है तो मटमैले रंग की और बाकी सब बिमारी के लिये वह बेरंग सी। सब दवाईयां दो ढ़ाई लीटर की बोतलों में रखी हुए थीं। और उस से निकाल के कम्पाउंडर साहब मरीज़ की बोतल में उण्डेल देते थे। उस के लिए अपनी शीशियॉं ले जाना भी जरूरी था। और अगर शीशी भूल भी गए तो डिस्पैंसरी के सामने कुछ लोग बैठे रहते थे जो शीशिशॅं बेचने का ही काम करते थे। उस शीशी पर अपनी पर्ची अपने हिसाब से अपना कितना खुराक लेनी है ये उस के ऊपर चिपका लो। दिलेरी ने पूछा पर अगर बीमारी ठीक न हो तो? बाप बोलते तो सामने डाक्टर स्कूजा के यहॉं चले जाते। वह दवाई लिखता औ काम्पाउण्डर दवाईयॉं पीस कर उन की पुड़िया बना कर दे देता। रामबाण का काम करतीं।

अब तो वो ज़माना गुजर गया। अब तो सब कुछ कैप्सूल में, गोलियों में आ गया। और गोलियां भी कितनी - एक दो नही सात सात। और ये नहीं कि सब आज ही मिलें गी। कुछ आज मिले गी, कुछ 2 दिन के बाद मिलेंगी, जबकि बाजार से खरीदकर में लाई जायें गी। और अब दवाईयों के लिये दूसरी लाईन में भी लगना पड़े गा। वहाँ पर भी समय लगा। उस मेंं एक दवाई थी कैल्सियम की गोलियॉं। दिलेरी ने कहा कि अब ज़ुकाम का क्या ताल्लुक कैल्सियम से। स्टोरकीपर मुस्कराया। उस ने बताया कि यह तो हर नुस्खे के साथ ज़रूरी हैं। वह इस लिये कि इस का बहुत सा स्टाक बच गया है और एक्सपाईरी डेट पास ही है तो इसे निकालना ज़रूरी है। उस के बाद क्या? वह मरीज़ के उपर है कि वह उस का क्या करता है।

जितनी दवाईयॉं मिली, उतनी ले कर दिलेरी वापस घर लौटा। आते ही बीवी ने जवाब पूछना शुरू किया। इतनी देर कहॉं थे। कौन दोस्त मिल गया था। किस से गप लड़ा रहे थे। अब क्या बतायें कि जब लाइन ही नहीं है तो वो लाइन में कैसे लगें और जब लाइन आ गई तो वह लाइन में लगे और लाइन में लग गए तो लाइन तो धीरे धीरे ही सरके गी न। और फिर दूसरी लाईन भी तो थी। और फिर तीसरी भी। बीवी ने कहा कि लो, यह टिफन पकड़ों और दफतर जाओ। दिलेरी बोला - अभी जल्दी क्या है? इतना थक के आया हूँ, अभी ऐसे ही जल्दी थोड़ा जा सकता हूॅं। चायवाय पिलाओ। बीवी ने कहा - देर हो जाए गी, फिर मुसीबत हो गी। दिलेरी ने कहा - आज देरी का मतलब नहीं है। आज तो कोई कुछ कह ही नहीं सकता। एस ओ साहब ने पूछा तो अभी ये दवाई का पर्चा साथ ले जाता हूँ, दिखा दूं गा। सभी भुक्त भोगी है, सब को पता हे हस्पताल कैसे चलता है। कौन कहे गा कि उस में देर नहीं लगी? इसलिए आज तो आराम से दफ्तर जाएं गे। तो क्या है श्रीमती जी, अभी चाय बनाओ। फिर देखें गे।


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