• kewal sethi

दिलेरी

दिलेरी


आज मैं आप को दिलेरी राम के बारे में बताने जा रहा हूॅं। इस देश में जहॉं सब से पहले जाति पूछी जाती है, उस की कोई जाति नहीं थी। पर नहीं, उस की जाति थी। वह भारत सरकार में उच्च श्रेणी लिपिक था। दिलेरी को बस एक ही शौक था - बोलने का। वह बोलता बहुत था।

दिलेरी लंच के समय अपनी जाति वालों के साथ लान पर आ जाता था। वैसे तो लंच का समय एक से डेढ़ होता था परन्तु इसे खींचा जा सकता था। कई बार तो यह दो तक खिंच जता था। कितना खिंचे का, यह अधीक्षक के ऊपर निर्भर करता था। अगर वह अपनी जाति वालों के साथ उठता बैठता था तो लंच टाईम में तो दो क्या, ढाई भी खिंचना कोई मतलब नहीं रखता था। पर वह सीट पर हो तो पौने दो पर ही गहरी गम्भीर नज़र से घूरता था।

बात चीत करने के लिये इन्हें किसी टापिक की ज़रूरत नहीं होती थी। जो मन में आ जाये या जो अखबार की सुर्खी में आ जाये। अब एक दिन सुर्खी थी पद यात्रा की। अब सब ने बतियाना शुय किया। यह केवल शोशेबाज़ी है। इस से पार्टी मज़बूत हो गी। इस से व्यक्ति की सेहत भी अच्छी हो जाये गी। इस से उस के सोचने का ढंग बदल जाये गा। अच्छा फोटोशाप अवसर है। दिलेरी ऐसे मौके पर कहॉं चूकने वाला था। कूद पड़ा। उस ने कहना था कि यह पदयात्रा सब बकवास है। यह भी कोई यात्रा हुई। तीर्थ यात्रा हो, तो बात बनती है। किसी पहाड़ी स्थान की यात्रा हो तो बात बने। वैसेे ही पैदल यात्रा का क्या मतलब।ं करना ही थी तो साईकल यात्रा करते। थोड़ी मेहनत भी होती। साईकल चलाने में बहुत अक्ल लगाना पड़ती हैं। पैदल चलने में क्या है। मुॅंह उठाया और चल दिये। साईकल यात्रा से तो गड्ढे देखना पड़ते हैं। उन से बचना पड़ता है। अरे हम रोज़ साईकल यात्रा करते हैं, सुबह शाम दोनों टाईम। रास्ते के सब गड्ढे भी हमें याद हो गये हैं। वह भी हम को जान गये हैं। इसी वजह से तो बिना स्पीड कम किये हम चले आते हैं। इस से ही दिमाग तेज़ होता है। पैदल चलने में क्या है। न दिमाग की ज़रूरत न ही किसी से बचने का झंझट। कोई रास्ते में मिल गया तो।

एक दूसरे ने आपत्ति कीं - साईकल यात्रा में कोई दम नहीं है। किसी से हाथ भी नहीं मिला सकते। गले भी नहीं लगा सकते। किसी के तस्में भी नहीं बॉंध सकते। और फोटो तो बिल्कुल ही नहीं खिंचवा सकते। उस के बिना यात्रा का क्या मतलब। तुम यात्रा करते हो रोज़, सही है। महीने के आखिर में पगार भी तुम लेते हो। पैदल यात्रा में किसी भुगतान का सवाल नहीं। यह तो बिना मेवा के सेवा है। एक और कहें - सेवा, किस की सेवा। अपनी कर लें, वही बहुत है।

तीसरे ने कहा - अरे और कोई फायदा हो या न हो, एक फायदा तो है। रोज़ अखबार में ख्बर आ जाती है। अब हमारे उस दोस्त की तरह थोड़े ही है जो हमारे पीछे पड़ा रहता था कि हमारी खबर अखबार में छपवा दो। तुम्हें मिलने, बिल पास करवाने तो सब पत्रकार आते हैं न। एकाध को कह दो। सो जब बहुत ज़ोर दिया तो हम ने कहा कि खबर क्या, फोटो भी छपवा दें गे। पर पैसा लगे गा। पैसा मिला तो दूसरे दिन उस की फोटो आ गई अखबार में। नीचे लिखा था - गुमशुदा की तलाश। अब भाई पैदल यात्रा वाले को कुछ खर्च भी नहीं करना पड़ता। बिना पैसा खर्च किये फोटो आ जाती है। वह किस्सा है कि एक आदमी हाथ में बड़ा शीशा ले कर उलटा चलता था। दो चार रोज़ लोगों ने देखा, फिर पत्रकारों ने देखा, बस आ गई उस की फोटो अखबार में। अब चाहे उसे पागल कहो या बुद्धिमान फोटो तो आ गई और वह भी बिना पैसा खर्च किये।

इतने में किसी ने कहा। आज जाईंट सैकटरी भी आया हुआ है और उस की खिड़की भी इधर ही खुलती है। इतना सुनना था कि महफिल बर्खास्त हो गई।



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