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दयावान

  • kewal sethi
  • Feb 14, 2024
  • 3 min read

दयावान


एक वार्तालाप जो इस दुनिया से बाहर का है।

सब्ज़ी मार्क्रट जाते हुये शार्टकट लेते हुय मैं एक छह फुट चौड़ी गली से निकलता हूॅं। इस की कोेई खास वजह नहीं है। बस यह कहें कि एक आदत बन गई है।

उस दिन जब निकला तो देखा कि दो कामगार गली में कुछ खोद रहे थे। अभी साईड से निकला जा सकता था। उन से पूछा - अरे काम चल रहा है।

- जी बिलकुल

- बाहर लिखा है कि कैलाश जी काम करा रहे हैं।

- उन्हीं का तो इलाका है।

- कैलाश जी बहुत दयालू लगते हैं।

यह सुनते ही दोनों कामगार काम छोड़ कर हंसने लगे। जब हंसी रुकी तो मैं ने पूछा -

- भाई, इस में हंसने की क्या बात थी।

- शायद आप जानते नहीं। दयालू का शब्द तो हम ने आज ही सुना है। इस लिये हंसी आ गई।

- अरे भई, जो अपने पैसे से गली की मरम्मत कराये वह दयालू तो हो गा। नहीं तो आजकल लोग पानी भी नही ंपिलाते बिना मतलब के। गली बनाना तो दूर। पैसा खर्च करना आसान नहीं है।

- बहुत आसान है पैसा खर्च करना अगर दूसरे का हो और उस में से अपने लिये भी बचे।

- दूसरे का पैसा? मतलब? इन के पास आया कहॉं से।

- पैसा तो आप का ही है।

- मेरा?

- आप सरकार को देते हो। सरकार इन को दे देती है।

- मैं सरकार को देता हूॅं। मेरे पास इतना पैसा कहॉं हैं?

- आप टैक्स देते हो।

- इतनी पगार नहीं है कि टैक्स देने लायक हो।

- विक्री कर तो देते हो गे।

- वह तो आप मैं और सभी देते हैं

- यह वही पैसा है। सरकार कैलाश जी को देती है।

- चलो फिर भी। कैलाश जी पैसे का सदुपयोग तो कर रहे हैं न।

इस पर हंसी का एक दौर और चला। रुके तो फिर बात चीत शुरू हुई।

- आप मास्टर हो।

- हॉ। पर तुम्हें कैसे मालम हुआ।

- मास्टर ही इतनी नासम्झी की बात कर सकता है। अच्छा, टयूशन भी नहीं करते हो।

- वहॉं लोगों के पास खाने को नहीं है, टयूशन की बात करते हो।

- रिश्वत भी नहीं देते।

- पगार इतनी नहीं है कि खाना भी हो जाये और रिश्वत भी।

- यही गल्ती हैं। रिश्वत बढ़ती है तो पगार बढ़ती है। जितनी रिश्वत बढ़े गी, उतनी आमदनी बढ़े गी।

- अच्छा तो तुम रिश्वत देते हो क्या

- और नहीं तो क्या। वैसे ही यह काम मिल गया क्या।

- किस को देते हो।

- मुकद्दम को। और मुकद्दम देता है मुंशी को। और मुंशी .---

- बस बस, अब कहो गे कि कैलाश जी भी रिश्वत देते हैं।

- लेते भी हैं, देते भी हैं।

- लेते किस से है। समझ गया ठेकेदार से। और देते किस को हैं।

- हमें, और किस को।

- तुम्हे? कब, कैसे, क्यों?

- चुनाव के समय। नकद कभी कभी, नहीं तो शराब कबाब के रूप में।

- चक्कर पूरा हो गया। पर पहले वाली बात तो रह ही गई। कैलाश जी भले ही सरकार का पैसा खर्च कर रहे हों पर काम तो करवा रहे हैं। ऐसा भी कौन करता है।

दोनो कामगारों में फिर हंसी को दौर शरू हो गया। जब खत्म हुआ तो बोले।

- सभी करते हैं। पर नफा नुकसान देख कर।

- मतलब?

- अब तुम्हारे ख्याल में यह गली में टाईल लगाने का काम कितने का हो गा।

- क्या मालूम। कभी न किया न करवाया। तुम्हें मालूम है क्या?

- न जी। हम इस पचड़े में नहीं पड़ते। अपने काम से काम रखते हैं।

- तो?

- मान लो पचास का है तो इस में 10 माल का दाम, आठ मज़दूरी का यानि हमारा। तीस में से कुछ ठेकेदार के, कुछ कारपोरेशन के अफसर के। बाकी कैलाश जी के। हो गया पचास का हिसाब पूरा।

- नहीं दो बच गये

- आखिर मास्टर ही ठहरे। सब हिसाब पता है। तो सुनो - दो पूजा पाठ के। मंदिर के। आखिर पाप भी तो माफ करवाना है।

- एक बात रह गई। कैलाश जी सारा तो आप को नहीे देते हों गे। कुछ तो रखते हों।

- और नहीं तो क्या। सारा खेल ही उस के लिये है। पर ठहरता उन के पास भी नहीं है।

- तो किस को देते हैं

- पार्टी को। टिकट नहीं लेना है क्या? हो गई तसल्ली। अच्छा तो राम राम।

- राम राम। आज का सबक बहुत अच्छा रहा।

- चलो भई गंगवा, मास्टर से बात करते करते हम भी मास्टर हो गये।


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