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तीन बन्दर

तीन बन्दर


उस दिन काफी हाउस में बैठे थे। पुराने ज़माने का काफी हाउस जहाँ लोग सिर्फ बैठने आते थे। बतियाने आते थे। आधा धण्टा बैठने के बाद एक एक कप काफी का आर्डर देते थे ताकि काफी हाउस वाले को इतमीनान रहे कि यह काफी हाउस ही है, कमेटी का पार्क नहीं। फिर उस काफी के कप को देखते रहते थे और बातों का सिलसिला जारी रखते थे। काफी हाउस की एक खासियत थी। अखबार मुफत में पढ़ने को मिल जाता था। उस का एक एक पन्ना एक एक मेज़ पर होता था। समय बीतने पर एक मेज़ से दूसरी मेज़ पर चला जाता था। इसी पर्चे पर से कई सवाल उठते। कई बातें सामने आतीं। ज़ोरदार बहस होती। कभी सोशलिज़म पर, कभी लड़के लड़कियों के बदलते फैशन पर। कभी मौहल्ले के नत्थू धोबी पर। उस दिन चर्चा के दौरान यह बात उठीं क्योंकि अखबार में गाँधी जी की फोटो दिख गई।


एक सज्जन (कहानी में सब को सज्जन ही लिखना पड़ता है यद्यपि बोलने वाले अभी ज़मानत पर थे) ने शुरू किया। गाँधी जी दो साल पहले 150 वर्ष के हो गये थे। उन का बेटा यानि कि राष्ट्र अगले वर्ष 75 का होने वाला है। ऐसे मौके पर गाँधी जी को याद करना बहुत ज़रूरी है। पर उन को याद करने के साथ उन के तीन बन्दरों को भी याद करना बनता है। बिना बन्दरों के गाँधी कुछ भी नहीं थे। अगर बन्दर न होते तो गाँधी भी न होते। वे तीन थे। पर उन तीनों के गुण गाँधी जी में थे। वह जीवन भर उन का पालन करते रहे। वह जहाँ जाते इन बन्दरों को साथ ले जाते। उन का पूरा जीवन इन बन्दरों की देख भाल में बीता। उन्हीं के कारण यह बन्दर आज भी विद्यमान हैं।


वह सिर्फ बन्दरों को साथ रखते ही नहीं थे, उन के आदेशों को भी मानते थे। जैसे कि पहला बन्दर कहता था कि बुरा मत देखो। इस लिये कभी उन्हों ने बुरा नहीं देखा। केरल में मोपला विद्रोह हुआ, उन्हों ने नहीं देखा। देखा पर बुरा नहीं देखा। हज़ारों हिन्दु मारे गये पर उस में भी उन को धार्मिक आस्था दिखी। बुराई नहीं दिखी। किसी ने स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या कर दी। गाँधी जी ने इस में बुरा नहीं देखा। उन्हों ने हत्यारे राशिद को भाई माना। उन का विचार था कि यह हिन्दु बनाने को काम ही गल्त था। हत्या तो कर्तव्य था। उस में बुरा क्या था।


अब दूसरे गुण की बात लें। उन्हों ने कभी बुरा नहीं बोला। अंग्रेज़ों ने महायुद्ध किया। देश की फौज को उन्हों ने खूब इस्तेमाल किया। हज़ारों फौजी मारे गये पर गाँधीजी ने कभी इसे बुरा नहीं बोला। वैसे वह अहिंसा के पुजारी थे पर हिंसा के खिलाफ बोलना भी उन की आस्था के विरुद्ध था। इस लिये उन्हों ने बन्दर की बात मानते हुये इस के बारे में कुछ नहीं बोला। पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया, लूट पाट की पर गाँधी जी ने इस पर कुछ नहीं बोला। बोला तो अच्छा ही बोला। पाकिस्तान को 55 करोड़ दे दो। अच्छा कर्म करो और सरकार ने ऐसा ही किया।


तीसरा गुण। बुरा मत सुनो। बल्कि वह तो इस से भी आगे चले गये। बुरा तो क्या सुनना था, कुछ भी नहीं सुना। जो मन में आई वह किया। जब आई तब किया। जिन्ना ने, औरों ने कहा कि खिलाफत अन्दोलन बेवकूफी का अन्दोलन है, इस का हिनदुस्तान से कुछ लेना देना नहीं है। पर उन्हों ने नहीं सुना। भगत सिंह ने, आज़ाद ने, अन्य कई ने कहा - इंकलाब ज़िंदाबाद। उन्हों ने नहीं सुना। वह अपनी ही करते रहे। एक बार अचानक वह नमक बनाने चल दिये। लोगों ने कहा कि नमक तो दो आने सेर है, (यह अलग बात है कि आजकल टाटा देश का असली नमक कह कर उसे 22 रुपये किलो में बेचता है) इस को लेने के लिये इतनी दूर चल कर जाने का क्या मतलब। पर उन्हों ने नहीं सुना। चल दिये। जल्दी में थे इस लिये घोड़ा गाड़ी नहीं लिये, पैदल ही चल दिये। पर बन्दर उन के साथ थे न, इस कारण कोई असर नहीं हुआ। कुछ नहीं सुना, बस चल दिये।


दूसरे सज्जन (पहले वाली टिप्पणी को याद करें) बोले - यार क्या कहते हो। इन्हीं गुणों की वजह से तो हमें आज़ादी मिली। वह हमारी छटी क्लास की उर्दू की किताब में एक सबक होता था - अंग्रेज़ी राज की नेहमतें। इस में बताया गया था कि उन्हों ने रेल बनाई, सड़क बनाई, स्कूल बनाये। यह सब हमारी तहज़ीब पर हमला था। बुरा था इस लिये हम ने नहीं देखा। उन के पास भी नहीं गये। हमें तो हमारी बैलगाड़ी अच्छी थी, कच्चे रस्ते पर फुर्र से चली जाती थी। गुरू जी ज़मीन पर बैठ कर अच्छी अच्छी बात बताते थे। स्कूल की पढ़ाई बुरी थी। हम ने नहीं देखी। हम ने वह सबक नहीं सुने। पर हम इन के खिलाफ बोले भी नहीं। क्योंकि बोलना मना था। बन्दरों ने मना कर रखा था। कुछ नालायक लोग इन बन्दरों की बात नहीं माने। आज भुगत रहे हैं। नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं।


तीसरे सज्जन बोले कि गाँधी तो चले गये। उन के बन्दर भी साथ ही चले गये। अब तो सब जगह यही बात चल रही है कि बुरा देखो, बुरा सुनो, बुरा बोलो। चाहे कोई भी बात हो, इन्हें बुरा ही दिखाई्र देता है। सरकार ने नोटबन्दी की, बहत बुरा किया। एक ने बुराई की, दूसरे ने सुनी। सब बुरा ही बुरा बोलने लगे। फौज के लिये हवाई जहाज़ खरीदे, इन्हें बुरा ही दिखा। खूब बोले. चौकीदार भी चोर दिखाई दिया क्योंकि देखना ही बुरा है। जो भी किया, बुरा ही किया। संसद की कार्रवाई ठप कर दी। बुरा ही किया। अच्छा तो कुछ दिखा ही नहीं। शायद इन के बन्दर नई बात सीख गये हैं कि अच्छा मत देखो, अच्छा मत सुनो, अच्छा मत बोलो। सरकार ने कितने गैस के सिलैण्डर बाँटे पर इन्हों ने देखा ही नहीं। सड़कें अच्छी कर दीं पर इन्हों ने देखना ही नहीं है। बुरा दिखे तो काँव काँव कर झुण्ड के झुएड उमड़ पड़ते हैं।


एक और भी थे - कहने लगे कि नालायकों की अभी भी कमी नहीं। उन्हें कुछ बुरा ही नहीं दिखता। अच्छा ही अच्छा दिखता है। नदी में लाशें हैं पर बुरी बात है, इस लिये दिखती नहीं। कोविड के कारण लोग पैदल चले जा रहे है पर इन्हें उस में कुछ बुरा ही नहीं दिखता। सभी विरोधी दल दिन रात चिल्लाते रहे हैं . यह ठीक नहीं, वह ठीक नहीं पर इन्हों ने कभी नहीं सुना। बुरा सुनना ही नहीं है। यह तो गनीमत है कि चौथा बन्दर नहीं था नहीं जो कहता कि बुरा मत करो। पर इन को तो बुरा ही बुरा करना है। कुछ अच्छा तो करना ही नहीं।


एक सज्जन उठते हुये बोले कि दोनों तरफ की बात सही है। काफी तो अच्छी थी पर उस के पैसे वेटर द्वारा माँगना बहुत बुुरी बात है। काश हम इसे न सुन पाते।


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