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ताओ वाद

ताओ वाद


चीन में तीन प्रकार की विचार धाराएं चलती है। ताओवाद, कन्फ्यूशियस वाद तथा बौद्ध विचार। तीनों का मिलन ही चीन की संस्कृति को परिभाषित करता है। इन में ताओवाद सब से पुरातन है। इसे चीनी संस्कृति में सभी पक्षों में देखा जा सकता है।


व्यापक प्रभाव के बावजूद ताओवाद की परिभाषा करना कठिन है। ये किसी व्यक्ति द्वारा आरम्भ नहीं किया गया है। बल्कि कई परंपराओं का निचोड़ है। इस में नए विचारों, नये व्यक्तियो, नये दर्शन आदि पहलुओं का सम्मिलन इस की विशेषता है। न तो कोई केंद्रीय शक्ति है। न ही कोई परंपरागत ग्रन्थ इस में आरम्भ में था। बाद में ताओ ते चिंग को मुख्य ग्रन्थ माना गया जिस के बारे में आगे जानकारी दी गई है। ताओवाद का प्रभाव प्रत्यक्ष कम, परोक्ष अधिक है। बौद्ध विचार मृत्यु उपरांत स्थिति के बारे में अधिक बात करता है। कनफुुसियस वाद शासन तथा परिवार से संबंधित बात करता है। परन्तु ताओ बाद केवल आध्यात्मक एवं सामाजिक अवस्थाओं के लिए है। कई व्यक्ति शासकीय कार्य में कनफुसियस के अनुयायी हैं, तो दोस्तों की बैठक में ताओवाद के। त्यौहार आदि भी किसी एक वाद से संबंधित होना नहीं पाया जाता। वास्तव में तीनों विचारधारायें एक दूसरे की पूरक हैं।


ताओवाद का मुख्य बिन्दु है कि एक अज्ञात, नामविहीन, निराकार, सर्व व्यापी, सर्वशक्तिमान, अवर्णनीय ताओं है जो सभी वस्तुओं को नियमबद्ध रखता है। यह एक अन्तहीन चक्र है जिस में असत से सत उत्पन्न होता है तथा पुनः असत में ही विलीन हो जाता है। इस कारण कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया जाना चाहिये जो प्रकृति के अवसान का कारण बने। ताओवाद में प्रकृति के अध्ययन को मुख्य स्थान दिया जाता है। इस के परिणाम स्वरुप कई आविष्कारों का जन्म हुआ। अमृतत्व की खोज में कई दवाइयों की खोज की गयी। प्रकृति के अध्ययन में दिशा बताने वाली चुम्बकीय शक्ति की खोज भी इन में थी जो कि भवन की दिशा तय करने का आधार है। इसे फंगशुई कहा जाता है।


ताओवाद का तर्क है कि पूरी व्यवस्था में अपने स्थान को जान कर उस के अनुसार आचरण करना चाहिये। अपने पर नियन्त्रित करने वाले व्यक्ति को असाधारण शक्ति प्राप्त हो सकती है तथा वह ताओं से निम्न वस्तुओं पर नियन्त्रण कर सकता है।


ऐत्हासिक परिपेक्ष्य

ताओ वाद की प्रथम व्यवस्थित पुस्तक ताओ ते चिंग है जो छटी शताब्दि ईसा पूर्व में लिखी गई थी। परन्तु इस में व्यक्त विचार इस से पूर्व के भी हो सकते हैं। इस के लेखक है लओज़ी। इस में ‘क्वीं’ की बात है जो शक्ति का मूल स्रोत है। इस में यिन तथा यांग की बात कही गई है, जो एक दूसरे की पूरक हैं। इन से सभी वस्तुयें आस्तित्व में आती है। इस में अनुशासन का वर्णन है जो आपस में व्यवहार करने के सम्बन्ध में निर्देश देता है। इस में शमन का भी वर्णन है जो कि असाधारण शक्तियां प्राप्त करने के लिये ध्यान देने के संदर्भ में हैं।


ईसरी सन के आरम्भ होने तक लाओज़ी को भगवान का दर्जा दे दिया गया। और उसे ताई शॉन लओथुन - उच्चतम स्वामी ताओ - कहा गया।


ताओ चे चिंग के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक जुआंगज़ी है जो चौथी शताब्दि ईसा पूर्व में लिखी गई थी। एक अन्य पुस्तक दूसरी शताब्दि ईसा पूर्व की हुवैनान्ज़ी है। इस के अतिरिक्त तीसरी शताब्दि ईसवीं में लिखी पुस्तक लाईज़ी है। इन सब में ताओं के बारे में कहा गया है जिन में मुख्य बात यह है कि हमें केोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये जो प्रकृति के विरुद्ध हो।


ईसवी सन के आरम्भ मे चीन में बौद्ध मत का प्रचार आरम्भ हुआ जिस के प्रभाव से ताओ वाद के कई नये गुट बने। इन में से एक ‘‘पीली पगड़ी’’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह अध्यात्मिका के माध्यम से स्वर्णयुग लाने की बात करते थे। इस गुट ने पूर्वी चीन में विद्रोह कर अपने को स्थापित किया। इन्हों ने एक नये संवत को भी शुरू किया। किन्तु विद्रोह को विफल कर दिया गया। परन्तु इस के एक गुट ने सेज़वान क्षेत्र में ‘‘दैविक आचार्य’’ नाम से स्थापना कर ली। इस का प्रभाव दक्षिण चीन में फैला। इस की नींव ज्यान दओल्रिग ने डाली थी। इस में श्रेणीबद्ध व्यवस्था थी। इस में पाप स्वीकृति तथा पश्चाताप का प्रावधान था। दाओलिंग के पोते ने अपनी दैविक दावे को छोड़ दिया तथा उसे राजवंश से मान्यता प्राप्त हो गई।


चौथी शताब्दि में दैविक आचार्य ने दक्षिण चीन में चल रहे एक धार्मिक एवं औषैाधीय अनुष्ठान वाले समूह से विलय कर लिया तथा शानकिवंग (सर्वोच्च पवित्रता) नाम से नया सम्प्रदाय बना लिया। इसी समय महायान बौद्ध मत के सिद्धॉंतों को शामिल करते हुये ताओ वदियों का एक नया गुट भी बना। वर्ष 265 से वर्ष 589 तक बौद्ध तथा ताओवाद में तनातनी ही़ रही। वर्ष 618 से 987 तक तांग राजवंश के समय क्वानज़ैन ताओवाद का वर्चस्व रहा। इस काल में राज्य में पूजागृहों तथा मठों की स्थापना करवाई गई। बाद में सांग राजवंश (960-1209) ने भी इस नीति को अपनाया। सांग राजवंश तथा उस के बाद युवान राजवंश (1249-1568) के बीच कई गुट बने जिन में से दो अभी भी सक्रिय है। एक क्वानज़ैन जिस में पुजारी को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। दूसरा ज़ैंगयी जिस में ऐसी बंदिश नहीं है। यह दोनों सम्प्रदाय तीनों धाराओं - ताओवाद, कनफफुसियस तथा बौद्ध - को साथ ले कर चलते हैं। ज़ैंगयी वास्तव में दैविक आचार्य का ही रूप है। इस के 64 वें आचार्य अभी ताईवान में रह रहे हैं।


साम्यवाद के आने के बाद सभी धार्मिक गुटों को झटका लगा।ं धार्मिक क्रियायों पर पाबन्दी लगा दी गई। विशेषतया तथाकथित सांस्कृतिज्ञ अन्दोलन के समय बहुत से मठो एवं मंदिरों को नष्ट कर दिया गया। किन्तु अब इन का पुनर्जागरण हो रहा है।


दैविक स्वरूप

ताओवाद में माना जाता है कि सब वस्तुयें ताओं से आती है तथा उसी में विलीन हो जाती हैं। ताओं निराकार, निवर्चनीय है। सृष्टि के अन्त में सब कुछ ताओं में ही समा जाता है। वह सब का नियन्ता है तथा सब में वही विद्यमान है। वही सब में विशिष्ट शक्ति प्रदान करता है जिसे ‘दे’ कहा जाता है। ताओं से ही ‘क्वी’ का उद्भाव होता है तथा उस से यिन तथा यांग का। यिन तथा यांग से ही अन्य वस्तुयें बनती हैं।

ताओं का पता देवताओं के माध्यम से ही चलता है। इन में ही लाओज़ी भी हैं जिन्हें ताईशांगलाओजुन कहा गया है। लाओज़ी से ही ताओवाद के कई रहस्य प्रकट हुये जिन में कुछ रहस्य दाओलिेग को वर्ष 142 में प्रदान किये गये थे। लाओज़ी का अवतरण कई बार अलग अलग समय में हुआ। कुछ में वह सम्राटों के परामर्शदाता भी रहे। एक किंदवती यह भी है कि वे भारत में भी गये जहॉं बुद्ध के रूप में उन्हों ने ताओ का प्रचार किया। सातवीं शताब्दि में राजवंश द्वारा उन की पूजा का आदेश दिया गया।


दूसरे देवताओं को तीन तीन के समूह में प्रस्तुत किया जाता है। एक समूह को त्रिमूर्ती कहा गया है तथा वह न केवल ब्रह्मण्ड में वरन् प्रत्येक शरीर में निवास करते हैं। उन्हें शरीर, प्राण तथा वीर्य के रूप में भी वर्णित किया जाता है। यह एक अमर प्राणी के रूप में हैं। एक अन्य समूह को पवित्र त्रिक कहा जाता है जिस में मूलरूप, अलौकिक भूषण तथा ताओ एवं ते का स्वर्गीय रूप (जो वास्तव में लाओज़ी ही हैं) बताये जाते हैं। उन का आवाहन सामुदायिक सम्बन्धों का नवीनीकरण करने के लिये किया जाता है।


इन देवताओं का वर्गीकरण शासकीय सेवकों की भॉंति ही किया जाता है। हर एक का अपना प्रयोजन तथा कार्य है। समय समय पर महत्वपूर्ण व्यक्तियों का देवत्व मान्य किया जाता है। इन में सम्राट हुवांगदी भी हैं जो आदर्श शासक माने जाते हैं। महारानी शिवांग मू के बारे में कहा जाता है कि उन्हों ने ताओ की प्राप्ति की थी। उन की पूजा राजवंश और सामान्य लोग, सभी करते थे। उन का निवास कुनलुन पर्वत था जिस में ऐसा फल होता है जो अमरत्व प्रदान करता है। इन्हीं में जेड सम्राट भी है जिन्हें इन देवताओं का राजा माना जाता है। देवी मू को दो सौ वर्ष तक लोकप्रिय माने जाने के पश्चात उन्हें देवी स्वीकार किया गया। सत्तारवीं शताब्दि में उन्हें जेड सम्राट की सम्राज्ञी स्वीकार किया गया। एक अन्य देवता ग्वाण्डी, एक सामान्य नागरिक था, पर था हिम्मती और विश्वसनीय। उसे 219 ईसवी में मत्युदण्ड दिया गया परन्तु था वह आम जनता में अत्यन्त लोकप्रिय। उस को काफी काल पश्चात देवता रूप में मान्यता दी गई।


ताओ साहित्य

ताओं साहित्य अत्यन्त समृद्ध है। यह 1120 खण्डों में विभक्त है। इन की हस्तलिखित प्रतियॉं मंदिरों में तथा मठों में ही थी। कुछ साहित्य ग्यारहवीं शताब्दि में छनहुवांग कन्द्रा में सील बन्द कर दिया गया था तथा इसे बीसवीं शताब्दि में ही खोला गया। और भी कई पाण्डुलिपियॉं पत्थर पर तथा पीतल पर लिखी हुई पाई गई हैं।


जैसा कि पूर्व में कहा गया है, मूल ग्रन्थ ताओं ते चिंग है। यह एक संत द्वारा लिखा गया था जो दरबारी जीवन से उकता गया था तथा पश्चिम चीन के ओर चल दिया। यह केवल 5000 चीनी चिन्हों का लेख है तथा इस की भाषा रहस्यमयी है। दूसरा प्रसिद्ध ग्रन्थ ज़ुवांगज़ी है जो इसी नाम के लेखक द्वारा लिखा गया है। यह आम आदमी को सम्बोधित है तथा इस में ताओं के बारे में तथा मानवीय मूल्यों के बारे में बताया गया है। बताया गया है कि वास्तविक्ता क्या है तथा किन विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। इस में देवताओं का वर्णन है जो पहाड़ों पर केवल वायु तथा ओस पर ही रहते हैं। एक विचार है कि ज़वागज़ी ने स्वयं सात अध्याय ही लिखे थे तथा शेष 26 उन के शिष्यों ने लिखे थे।


दो अन्य दार्शनिक ग्रन्थ हुवाईनन्ज़ी तथा लाईज़ी हैं। प्रथम दूसरी शताब्दी में तथा दूसरा चौथी शताब्दि ईसवी में लिखे गये थे। इन के अतिक्ति कई अन्य पस्तकें है। इन में प्रसिद्ध गे होग की पुस्तक बाओ पाज़ी है जो शानक्विंग सम्प्रदाय से सम्बन्धित है। इस में ध्यान करने के तरीके बताये गये हैं जिन में फोंगशी भी शामिल है। युवान राजवंश के समय इस सब साहित्य को एकत्रित किया गया जिस के 7,000 अध्याय थे। कुबले खान में बौद्ध तथा ताओं मत में विवाद के समय ताई ते चिंग को छोड़ कर सारा साहित्य नष्ट करने के आदेश दिये किन्तु इसे पुनः लिखा गया।


पूरे साहित्य को तीन भागों में बॉंटा जा सकता है। यह हैं यानक्विंग, ल्रिगबाओ, तथा सानहुवांग। प्रथम में देैविक प्रकटीकरण है, दूसरे में इन का स्पष्टीकरण तथा तीसरे में ताओं संतों की जीवनियॉ।। कुछ में भजन, नैतिक सिद्धॉंत तथा ध्यान के तरीके भी हैं। ताओं धर्म ईश्वरीय दर्शन है जिस में विश्व की उत्पत्ति में प्रथम श्वास (युवनकी) से ले कर दूसरे रहस्य जो संतों को बताये गये, शामिल है। काफी साहित्य गूढ़ भाषा में हैं जो गुरू के द्वारा उन्हीं शिष्यों को बताया जाता था जिन्हें इस लायक समझा जाता था।


एक अलग प्रकार का साहित्य पवित्र पर्वतों तथा स्थानों के बारे में है। इस में वहॉं स्थित मंदिर, मठ इत्यादि का वर्णन है। ताओं मत का कहना है कि शरीर की बनावट में तथा विश्व की बनावट में साम्य हैं। वाह्य संरचना के अध्ययन से शरीर की रचना भी समझी जा सकती है।


पवित्र पात्र

ताओवाद में अनेकानेक पवित्र आत्मायें हुई हैं। कई के द्वारा विभिन्न सम्प्रदायों की नींव रखी गई है। उन्हें राजसी सम्मान भी प्राप्त हुये हैं तथा उन में ऐसे भी हैं जिन्हों ने संसार को त्याग दिया है। स्थानीय पण्डित विभिन्न अवसरों पर उपचार करने, दुष्ट आत्माओं से मुक्ति दिलाने का कार्य करते हैं। इन स्थानीय विद्वानों के दो मुख्य सम्प्रदाय हैं - काली टोपी वाले तथा लाल टोपी वाले। लाल टोपी वाले वास्तव में शमन हैं जो आत्माओं का आवाहन कर सकते है तथा दुष्ट आत्माओं से लोगों को मुक्त करा सकते हैं। काली टोपी वाले साक्षर तथा विद्वान हैं। उन्हें लम्बे समय तक प्रशिक्षण भी दिया जाता है। सामान्य तौर पर पिता अपने पुत्र को प्रशिक्षित करता है। वह सामान्य मौकों पर पूजा अर्चना के लिये आमंत्रित किये जा सकते हैं। लाल टोपी वालों को भी आमंत्रित किया जाता है जब दुष्ट आत्माओं से छुटकारा पाना उद्देश्य हो।


इन विद्वानों में दोनों प्रकार के लोग है। कुछ गृहस्थी है जिन्हें अग्निवासी कहा जाता है। अन्य संसार को त्याग कर मठों में रहते हैं तथा आत्म चिंतन करते हैं। इन में बारह से बीस वर्ष के बच्चों को लिया जाता है तथा शारीरिक परिश्रम से आरम्भ कर पूजा अर्चना का तरीका बताया जाता है। कुछ मठ सभी प्रकार के व्यक्तियों को आत्म शुद्धि तथा आत्म नियन्त्रण प्रशिक्षण हेतु ले सकते हैं। ऐसे मठों में क्वैनज़ैन मठ प्रसिद्ध है।


कहा जाता है कि ताओं पण्डित आत्माओं का आवाहन कर सकते हैं। इस के लिये वह विभिन्न प्रकार के मन्त्र पढ़ते हैं। इस रस्म में एक नृत्य जिसे यू कहा जाता है, भी किया जा सकता है। इन आवाहन के माध्यम से पापों का प्रायश्चित किया जा सकता है।


कुछ प्रसिद्ध ताओं मनीशियों के नाम इस प्रकार हैं -

1. ज़ांगनू जो 235 ईसवी के आस पास हुये और जिन्हों ने अपनी शक्तियॉ सम्राट को दे दीं।

2. कोनक्विांगज़ी - 365-448 - जिन्हों ने सम्राट को बौद्ध धर्म को अमान्य करने के लिये कहा

3. कु क्वांगटिंग - 850-933 - तांग राजवंश के सलाहकार

4. सम्राट हविसंग - 1101-1125 - जिन्हों ने अपने को ताओ पंथ का प्रमुख घोषित किया


चीनी साहित्य में अमर आत्माओं का ज़िकर मिलता है जो पर्वतों पर तथा द्वीपों पर रहते थे, जो वायु एवं ओस पर ही रहते थे। न अग्नि उन्हें जला सकती थी, न जल उन्हें गीला कर सकता था। वह अपना आकार बदल सकते थे सूक्षम से ले कर बहृत तक। इन में एक आठ अमर आत्माओं का समूह प्रसिद्ध है। इस में बूढ़े, जवान, अमीर, गरीब, उच्च वर्ग के, समाान्यजन, स्त्री, पुरुष सभी थे। परन्तु मस्त मौला, सामाजिक नियमों से मुक्त, ताओं साधु के बारे में कई स्थानों पर, कई पुस्तकों में ज़िकर आया है।


नैतिक सिद्धॉंत

ताओंवाद का मूल मन्त्र है कि ताओं तटस्थ हैं। न वह बुरा करता है न भला। न तो स्वर्ग न ही पृथ्वी शुभ कार्याें का ईनाम देने वाली हैं। हर वस्तु, जिन में मनुष्य भी शामिल है, अपना कर्य करने के पश्चात लौट जाती है। न तो सुन्दर एवं न ही असुन्दर; न ही अच्छा, न बुरा; न तो मूल्सवान, न बेकार के कोई महत्व है। जब इन में भेद किया जाता है तभी इच्छायें और तृष्णा जन्म लेती हैं। व्यक्ति को प्रकृति के अनुरूप आचरण करना चाहिये और उसे कोई हानि नहीं पहुॅंचाना चाहिये। आकाशीय तूंबी - सुखाया गया कद्दू - जिसे हुण्डन कहा गया है - सृष्टि की रचनात्मक क्षमता का द्योतक है। वह सभी को मनवॉंछित फल देता है किन्तु लालची व्यक्ति उस में छेद कर अधिक प्राप्त करना चाहता है।। इस से हुण्डन समाप्त ही हो जाता हैं।


ताओंवाद का केन्द्र बिन्दु वू वई है। वू वई का अर्थ है हस्ताक्षेप न करना। व्यक्ति को चाहिये कि वह प्राकृतिक नियमों के अनुरूप चले न कि उन के विपरीत।ं जैसे ताओं पक्षपात नहीं करता वैसे ही संतजन भी पक्षपात नहीं करते।


बाद में ताओंवाद ने अन्य सदगुण ग्रहण किये जो कनुयूशियस मत तथा बौद्ध मत से लिये गये यथा तीनों - स्वर्ग, भूमि तथा साधू अच्छे के प्रति अच्छे हैं परन्तु बुरे के प्रति बुरे नहीं। नम्र रहना, संतोष अपनाना तथा इच्छाओं पर नियन्त्रण रखना आवश्यक है। इन के साथ स्त्रीत्वोचित गुण - वात्सल्य, संवेदना, लावण्य - भी होना चाहिये। नैतिक सिद्धॉंतों को स्वास्थ्य तथा आत्मविश्वास के लिये आवश्यक समझा जाता हैं। अपने गुनाहों की माफी सार्वजनिक कार्य - सड़क निमार्ण, भण्डारा आयोजन - द्वारा मॉंगी जा सकती है। तीनों अधिकारियों - आकाश, भूमि, अग्नि - की वर्ष में तीन बार पूजा की जाती है क्योंकि वह व्यक्ति के दोष का लेखा रखते हैं। अपने गुनाहों को लिख कर इन्हें समर्पित किया जाता है अर्थात जलाया जाता है, गाढ़ा जाता है अथवा जल को अर्पित किया जाता है। एक अन्य कर्मकाण्ड में शरीर को मिट्टी तथा कोयले से लेप किया जाता है और किसी अपराधी की भॉंति माथा टेक कर माफी मॉंगी जाती है।


गे हंग के अनुसार अपने को शुद्ध तथा पवित्र रखना चाहिये जब कि वांग ज़े के अनुसार मदिरा, मैथुन, क्रोध तथा लालच पर नियन्त्रण रखना चाहिये। शीतकाल अयनांत के समय पॉंचवीं शताब्दि से जिआओ नाम का आयोजन होता है जिस में मूल स्थिति को लौटने तथा नवीनीकाण के लिये प्रार्थना की जाती है। शुद्ध आचरण पूरे विश्व को शॉति की ओर ले जाये गा जब कि बुराई के कारण पूरे विश्व में तबाही हो सकती है। यह विचार आज भी विद्यमान है तथा पण्डित आज भी अपने अन्तर्मन को शुद्ध रखते हैं। वह ही जिआओ आयोेजन को कर सकते हैं।


पवित्र स्थान

ताओ मत के अनुसार पूरी सृष्टि ही पवित्र स्थान है परन्तु इस में प्राकृतिक स्थान पहाड़, नदियॉं, कन्द्रायें विशेष महत्व की हैं। ऐसे स्थानों की यात्रा की जाती है। सारी सृष्टि ताओं से जनित होती है। सब से पूर्व क्वी - मूल तत्व - उत्पन्न होता है जो यिन क्वी तथा यांग क्वी में बट जाता है। यिन क्वि भारी होता है और नीचे की ओर आता है। यांग क्वि हलका रहता है और ऊपर की ओर जाता है। इन दोनों के संयोग से ही सभी वस्तुओं का निर्माण होता है। इन से पॉंच तत्व निर्मित होते हैं। कुछ तत्व एक प्रकार से साथ आयें तो नाशात्मक होते हैं, और दूसरे तरह से साथ आयें तो रचनात्मक। इन्हीं की अन्तक्रियासे पूरा जगत चलता है। द्रव्य में यिन तथा यांग की मात्रा में अन्तर रहता है।


पॉंच तत्वों के समान पॉंच पर्वतों को भी विशेष माना गया है। इन में ताई, हवा तथा सोंग के अतिरिक्त हेंग नाम के दो (अलग अलग स्थानों पर स्थित) पर्वत हैं। अलग अलग सम्प्रदाय के अपने विशिष्ट पर्वत हैं जैसे शनक्विंग का माओ पर्वत; स्वर्गीय आचार्य का लोंगू पर्वत; ताओ रक्षात्मक सम्प्रदाय का वूतांग पर्वत। कुछ पर्वत केवल किंदवती में हैं जैसे पश्चिम की सम्राज्ञी का कुनलुन पर्वत।


इन्हीं के साथ कई कन्द्रायें हैं। कुछ अपने ही नूर से प्रकाशित हैं। वह ऊर्जा की केन्द्र मानी जाती हैं। ताओवादियों ने 36 दिव्य कंन्द्राओं तथा 72 दिन्य स्थानों की पहचान की है जो पवित्र हैं। उन की मान्यता हैं कि यह आपस में पृथ्वी के अन्दर ही अन्दर जुड़ी हुई हैं। इन का सम्बन्ध पुरानी कला फेंग शुई से भी है जो ऊर्जा का दिव्य द्योतक है। फेंग शुई (वायु तथा जल) पवित्र स्थानों की पहचान का तरीका माना जाता है। फेंग शूई के विशेषज्ञ वातावरण में क्वि की मात्रा की संगणा करते हैं तथा पर्वतों, जल स्थानों इत्यादि को देख कर तय करते हैं कि उपयुक्त स्थान कौन सा है।


ताओ मत का मानना है कि सुष्टि तथा मानव शरीर में समानता है। वास्तव में शरीर पूर्ण सृष्टि का प्रतिबिम्बित रूप है। इस में ईश्वर भी है, देवता भी हैं। घाटियॉं, पर्वत, जल केन्द्र इत्यादि सभी हैं। जैसे विश्व का अमरत्व है वैसा ही व्यक्ति का भी हो सकता है। ताओं मत में तावीज़ तथा चित्रों का भी विवरण शामिल है। इन से सहायता से विशेषज्ञ ऊर्जा के केन्द्र बिन्दुओं की पहचान कर सकते हैं। यह शरीर तथा सृष्टि दोनों के लिये किया जा सकता है।


ताओं के पवित्र स्थानों में मंदिर तथा मठ भी हैं। अधिकतर पास पड़ौस के मंदिर स्थानीय लोगों द्वारा प्रबंधित हैं। ताओ विशेषज्ञ की सेवायें पूजा अर्चना के लिये प्राप्त की जा सकती हैं। इन मंदिरों में तीन पवित्र आत्माओं, आठ अमर आत्माओं, स्थानीय देवता के चित्र तथा प्रतिमायें रहती है। कुछ चित्र बौद्ध तथा कनफुशियस मत के भी रहते हैं। बड़े मंदिरोें मे नियमित रूप से ताओ विशेषज्ञ रहते हैं। इस प्रकार का एक मंदिर बीजिंग में सफैद बादल मंदिर है जो स्वर्गीय सत्य सम्प्रदाय का है। पूर्वी शिखर डोंग हवे के पास प्राचीन सम्प्रदाय का मंदिर है जिस में विभिन्न कमरों में नरक के दृश्य दिखाये गये हैं। इन में भक्तगण अपने पूर्वर्जों की अत्माओं के लिये प्रार्थना करते हैं। कई अन्य मंदिर पर्वतों के पास स्थित है। कई को भूतकाल में राजसी संरक्षण भी प्राप्त था जैसे तांग राजवंश (618-907) के समय में। प्रसिद्ध ताओ संतों के स्मारक भी है। भगवद लाओज़ी की याद में टावर अब्बे है जहॉं उन्हें ताओ ते चिंग का प्रकटीकरण हुआ था।


पवित्र समय

अन्य बातों की तरह पवित्र समय, त्यौहार तथा अनुष्ठान इत्यादि भी ताओ दर्शन में प्रकृति को साथ ले कर चलते हैं। त्यौहार का दिन सूर्य एवं चंद्रमा के हिसाब से तय किये जाते हैं। चन्द्रमा वर्ष में अधिक मास का प्रचलन भी भारतीय पद्धति के अनुरूप रहता है।


त्यौहार में यिन, यांग तथा पांच तत्व - जल, अग्नि, भूमि, वन तथा द्रव्य - को साथ ले कर चलते है। इन में केंद्र भूमि को मानते हैं।


चीनी पद्धति में समय का 12 वर्ष का एक चक्कर रहता है जिसे अलग अलग जानवरों के नाम से संबद्ध किया जाता है। इस से अगला चक्र 60 वर्ष का होता है। इन में जो पांच निम्न चक्र शामिल रहते है उन के लिये अलग अलग रंग बताये गये है। इस प्रकार किसी वर्ष को बताने में रंग और जानवर दोनों को ही बताया जाता है जैसे कि बड़े चक्र का प्रथम वर्ष नीला चूहा के नाम से चलता है।


त्यौहार का सम्बन्ध मकर संक्रांति तथा कर्क संक्रॉंति से भी रहता है। मकर संक्रान्ति के समय यांग का प्रभुत्व बढ़ता है। कर्क संक्रांति के समय यिन का वर्चस्व आरम्भ होता है। यांग को विषम अंकों से भी जोड़ा जाता है। अधिकतर त्यौहार पूर्णमासी के दिन पड़ते हैं।


मकर संक्रांति के समय नवीनीकरण का जियाओं त्यौहार मनाया जाता है। कर्क्र संक्रांति के समय वसन्त का त्यौहार मनाया जाता है। यह समय परिवार मिलन को भी रहता है। इन त्यौहारों में देवी देवताओं की पूजा की जाती है। नगर की सफाई की जाती है। इस त्यौहार में विशिष्ट रंगों का अपनाया जाता है। लाल, सुनहरा तथा नारंगी रंग सभी जगह पर दिखाई देते हैं। गोल फल जैसे नारंगी का भी महत्व रहता है। ये त्यौहार 15 दिन तक चलता है। पंद्रहवें दिन को हो लालटैन त्यौहार कहा जाता है। इस दिन देवी देवताओं के नाम से जुलूस भी निकाले जाते हैं। माना जाता है कि इस दिन देवताओं क जन्म हुआ था।


जैसा कि अपेक्षित है, त्यौहार का कृषि से गहरा संबंध रहता है। पूर्णमासी का विशेष महत्त्व है। एक त्यौहार फसल कटाई के समय भी आता है जो कि आठवें चंद्रमास में पूर्णमासी को आता है।


एक अन्य त्यौहार क्विंग मिंग है। इस त्यौहार को ‘स्पष्ट तथा चमकीला’ भी कहा जाता है जो पूर्वजों की याद में मनाया जाता है। यह कर्क संक्राति के पंद्रह दिन बाद आता है। पांचवें महीने का पांचवें दिन ‘‘दोैहरा त्यौहार’’ का दिन है। इस में यिन तथा यांग के अतिशय के बारे में विचार किया जाता है। पांच विष - कनखजूरा, सर्प, बिच्छू, मैंढक तथा छिपकली - से पांच रंगों के माध्यम से रक्षा मांगी जाती है।

यह समय धान के रोपण का भी होता है।


सातवें महीने के पंद्रहवॉं दिन भूत आत्माओं का दिन है। कहा जाता है कि इस दिन नरक के द्वार खोल दिए जाते हैं, आत्माएं घूम सकती हैं और जिन्हों ने अपना प्रायश्चित पूरा कर लिया है वो वहाँ लौटती नहीं है।


एक अन्य त्यौहार ‘दौहरा नौ’ का है। यांग का प्रभावी अंक नौ है। इसलिए दौहरे नौ को अधिक प्रमुखता दी जाती है।


सभी त्यौहार के दिन ताओ संतों द्वारा तय किए जाते हैं।


इसी प्रकार परिवार से सम्बन्धित समारोह भी यिन, यांग तथा पंच तत्व के आधार पर तय होते हैं। शादी के लिये जन्त्री का मिलान किया जाता है जिस में विशेषज्ञ दोनों के यिन, यांग एवं पंच तत्वों की स्थिति का अध्ययन करते हैं। शादी समारोह में वर वधु पक्ष के बैठने का भी स्थान निश्चित है। वधु पक्ष वाले पश्चिम की ओर तथा वर पक्ष वाले पूर्वी ओर बैठते हैं।


मुत्यु के सयम भी इस का ध्यान रखा जाता है। मृत का सिर दक्षिण दिशा की ओर रहता है जो अग्नि की दिशा है तथा शुद्धिकरण का माध्यम है। यहॉं भी महिलायें पश्चिम में तथा पुरुष पूर्वी ओर रहते हैं। परिवार के पूजा स्थल को इस समय सफैद कपड़े से ढक दिया जाता है।


मृत्यु उपरान्त

ताओं दर्शन में दौहरी आत्मा की परिकल्पना की गई है। इन्हें हुन तथा पो कहा जाता है। दोनों ही एक ही मौलिक क्यी से निर्मित है। हुन आत्मा यांग क्वि से तथा पो आत्मा यिन क्वि से सम्बद्ध है। मृत्यु में हुन आत्मा ऊपर की ओर चली जाती है तथा पो आतमा नीचे की ओर। पूजा पाठ का प्रयोजन यह है कि हुन आत्मा सहायक पूर्वज की भॉंति रहे तथा पो आत्मा भूमि में आराम से रहे।


चीनी दर्शन में कई तरह की धारायें हैं जो एक दूसरे को प्रभावित करती हैं। जैसे नरक की परिकल्पना भी की गई है। बौद्ध मत से अन्तरित विचार में कर्म के आधार पर यम द्वारा निर्णय किया जाता है कि कर्म के आधार पर क्या दण्ड दिया जाये। यह दण्ड भोगने के पश्चात पुनः जन्म होता है। नरक की परिकल्पना भी पृथ्वी की संरचना के समान है। दस दण्डाधिकारी देखते हैं कि क्या निर्णय आत्मा के बारे में लिया जाना है। चीनी किन्दवतियों में इन के निर्णय में गल्ती होने का विचार भी सामने आता है।


ताओ दर्शन में अमरत्व का विचार प्रधान रहता है। पर्वतों पर अनेक जड़ी बूटियॉं रहती है जो अमरत्व प्रदान कर सकती हैं। अमरत्व के लिये शरीर होना आवश्यक है अतः इस के लिये विशेष प्रयास किये जाते हैं। अपने कर्म को शुद्ध रखना तथा शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है। गे हांग ने अपनी कृति बाओ पाज़ी में अनेक नुसखे अमरत्व पाने के लिये बताये हैं। अन्ततः इन सब का लक्ष्य अपनी असीम स्थिति को प्राप्त करना है। इस में योग, ध्यान, समाधि इत्यादि सब आ जाते हैं। अपने सांस पर नियन्तरण भी इसी का भाग है।


ताओवाद और समाज

ताओ दर्शन का चीनी समाज पर प्रभाव सभी पक्षों में देखा जा सकता है। न केवल राजवंशों पर वरन् सामान्य जनता पर भी। इस का एक बडा कारण मंदिरों में ताओ पंडितों तथा जनता के बीच सम्पर्क है। ताओंवाद की मुख्य पुस्तक ताओ ते चिंग रहस्यमयी कृति होेने के बावजूद शासन तथा समाज पर आरोपित है। दूसरी शताब्दी से ही इस का प्रभाव देखने को मिलता है जब लाओज़ी को भगवान का दर्जा दे दिया गया था। तीसरी शताब्दि में दिव्य आचार्य समूह में अपराध स्वीकृति तथा पाप मुक्ति का सिलसिला आरम्भ हो गया था। इन के काल में ही ताओं विभूतियॉं राजाओं तथा सम्राटों के शक्ति की स्रोत बन गये थे। तांग तथा सोंग राजवंश के समय इन का आपसी सम्बन्ध अधिक सुदृढ़ हुआ। वर्तमान में साम्यवादी सरकार के साथ क्या सम्बन्ध है, यह स्पष्ट नहीं है।


ताओंवाद का लम्बा प्रभाव रोगों के निदान से जुड़ा हुआ है। अमरत्व की खोज में कई औषधियों का अविष्कार हुआ जो स्वास्थ्य के लिये उपयुक्त हैं। इन में मुख्यतः यिन तथा यांग में सामंजस्य स्थापित करना लक्ष्य रहता है। ताओंवाद का प्रकृति की ओर झुकाव का प्रभाव कला पर भी पड़ा है जिस में चित्रकला तथा सुलेख भी शामिल हैं। कविता में प्रकृति की ओर झुकाव देखा जा सकता है। इस में सामान्य अपेक्षित बर्ताव से दूर हटने का प्रयास भी शामिल हैै। ताओंवाद ने बौद्ध दर्शन से भी काफी कुछ ग्रहण किया है किन्तु अपना मूल तत्व बनाये रखा है। इन में चार सम्प्रदाय महत्वपूर्ण है जो दोनों के विचार ले कर चलता है।


ताओंवाद का एक बड़ा तत्व इस में नारीतत्व का समावेश है। ताओवाद के पुजारियों में महिलाओं को भी शामिल किया जाता था। यद्यपि इन में अधिकतर महिलाये विधवा अथवा तलाकशुदा होती थी किन्तु कन्याओं को उन के श्तिेदारों की सहमति से भी पुजारिन बनाया जाता था। उन्हें ईश्वर से संवाद के लिये अधिक उपयुक्त माना गया क्योंकि उन में संकल्पना तथा सगर्भता का तत्व विद्यमान रहता है। वास्तव में पुरुष संतों से भी इन गुणों को प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती थी।


(उपरोक्त विवरण सी स्काट लिट्टन के लेख पर आधारित है। यह लेख माईकल डूगन की सम्पादकता में पुस्तक ईस्टर्न रिलीजन्स में शामिल है जिस का प्रकाशन डुनकन बेरड पब्लिकेशन द्वारा किया गया है। चीनी भाषा का ज्ञान न होने के कारण चीनी नामों में त्रुटि हो सकती है। मूल पाठ एक सौ पृष्ठ से अधिक है)

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