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झूटी कहानी

झूटी कहानी

सादत हसन मिण्टो

सार - केवल कृष्ण सेठी


आज एक पुरानी कहानी पढ़ने को मिली जिस का शीर्षक ऊपर दिया गया है। यह 8 अक्तूबर 1951 को लिखी गई थी। इस का सार नीचे दिया गया है पर कहानी से न्याय हो सका या नहीं, ज्ञात नही। और यह आज भी लागू होती है यह नहीं, यह भी तय नहीं। (मूल कहानी 11 पन्नों की है तथा पढ़ने योग्य है)।


किस्सा यह है कि जब सभी ने अपने अपने अधिकारों की रक्षा के लिये संगठन बना लिया तो चोरों, डकैतों, जेब कतरों ने भी अपना एक संगठन बना लिया। इस के विरुद्ध काफी हो हल्ला हुआ किन्तु धीरे धीरे यह कम होता गया। एक आध अखबार ने जो अचानक ही बहुत प्रसिद्ध तथा काफी संख्या वाले हो गये, ने भी दबे शब्दों में इस के पक्ष में लेख लिखने आरम्भ कर दिये।


लोगों में फिर से इस संगठन के विरुद्ध वातावरण बनाने के लिये एक बड़ी सभा का आयोजन किया गया। इस में काफी लोग आये क्योंकि नेताओं, उच्च अधिकारियों के अतिरिक्त नामी ग्रामी फिल्म स्टार भी थे। सम्मेलन में सभी वक्ताओं द्वारा जम कर इस संगठन की निन्दा की गई।


सम्मेलन समाप्त होने वाला ही था कि एक व्यक्ति ने बड़ी शालीनता से अपने विचार व्यक्त करने का अवसर माँगा। वैसे तो सभापति इस के विरुद्ध थे पर उस व्यक्ति का आचार व्यवहार ऐसा था कि लोग उसे सुनने के लालायित हो गये तथा सभापति को उसे बोलने की अनुमति देना पड़ी। उस ने अपनी बात इस तरह कही।


‘‘इस सम्मेलन में उस संगठन के, जिस का मैं प्रतिनिधि हूँ इतनी गालियाँ दी गई हैं तथा अपमान किया गया है कि कहने को जी चाहता है

‘लो वो भी कहते हैं कि यह बे नंगो नाम हो गया’

मुझे इस सब बुराई से कोई आश्चर्य नहीं हुआ वरन् प्रसन्नता हुई। कहते हैं कि

‘गरचे है किस किस बुराई सेवले बा ईं हमा

ज़िकर मेरा मुझ से बेहतर है कि इस महफिल में है’

हमारे संगठन को केवल इस कारण से नफरत व हकारत से देखा जाता है कि हम चोरों, डाकुओं, रहज़नों की जमात हैं पर यह सोचने की बात है कि जिस तरह बाकी लोगों के अधिकार होते हैं वैसे हमारे क्यों नहीं। आप सब से पहले इन्सान हैं फिर अधिकारी, मन्त्री, सेठ। इसी तरह हम भी पहले इन्सान हैं। हमारा सदस्य भी शादी करता है, बच्चे पैदा करता है, उन्हे सच बोलने और चोरी न करने की हिदायत देता है। बस उस का काम अलग सा हैं कहते हैं कि

न लुटता दिन को तो कब रात को यूँ बेखबर सोता

रहा खटका न चोरी का, दुआ देता हूँ रहज़न को

हम चोरी करते हैं, डाका डालते है पर उसे कोई और नाम नहीं देते। यह महानुभाव बद तरीन किस्म की डाकाज़नी करते हैं मगर यह जायज़ समझी जाती है। मन्त्रीगण मन्त्रीमण्डल की सान पर उस्तरा तेज़ कर मुलक की रोज़ हजामत करते हैं, यह कोई जुर्म नहीं। हम किसी की जेब से बड़ी सफ़ाई से बटवा चुरा कर गुनाहगार बन जाते हैं। यह कोई राज़ की बात नहीं है कि हर विभाग में रिश्वतखोरी का ज़ोर है। परिवारवाद तथा चापलूसी के चलते सख्त खरदिमाग, अयोग्य, बदमाश किस्म के लोग बड़े बड़े पद सम्भाले बैठे हैं। पर कोई चोर अपने किसी अज़ीज़ को बड़ी चोरी के लिये नहीं चुने गा, इस लिये कि इस में दिल गुरदे की आवश्यकता, अभ्यास तथा योग्यता की आवश्यकता होती है, रिश्तेदारी नहीं चलती। हर व्यक्ति का काम ही उस की परीक्षा होती है।


मैं बदकारी माफ़ कर सकता हूँ पर खामगारी माफ नहीं कर सकता। यह व्यक्ति बड़े ही भोंडे तरीके से मुल्क की दौलत लूटते हैं, इतने भोंडे तरीके से कि उन की भाँडे सर्रे राह फूटते हैं पर वह बच निकलते हैं। इन के नाम भी दस नम्बरियों में नहीं आते। अंधे इन्साफ़ का खून यहीं पर होता है। और भी कई वध स्थल ऐसे है जहाँ न्याय, इन्सानियत, शराफत और दीन दुनिया की बलि चढ़ाई जाती है। मैं पूछना चाहता हूँ कि मनुष्यों की अधिकारों का व्यापार करने वाले हम हैं कि आप। दूसरी वस्तुओं की तरह ईमान में मिलावट कर के आप बेचते हैं या हम। संक्षेप में हर ओर ईमान फरोश, ज़मीर फ़रोश, वतन फरोश या मिल्लत फरोश हैं। यह भी कोई बेचने की वस्तुयें हैं। इन्हें तो आदमी ज़रूरत के समय गिरवी भी नहीं रख सकता। बात तलख है परन्तु

रखियो गालिब मुझे इस तलखनवाई से माफ़

आज कुछ दर्द मेरे दिल का सवा होता है’’



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