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जीव और कर्मफल

  • kewal sethi
  • Jul 12, 2020
  • 4 min read

जीव और कर्मफल

भारतीय दर्शन के दो मौलिक सिद्धाँत हैं। एक शरीर नश्चर है किन्तु आत्मा अमर है। और दूसरे कर्म का फल मिलता ही है चाहे इस जन्म में मिले या अगले जन्म में। प्रश्न यह है कि कर्मफल कैसे मिलता है। यह एक जीवन से दूसरे जीवन में जाता कैसे है। चूँकि यह बिन्दु मौलिक हैं अत: इन पर भारतीय दर्शन में गम्भीर रूप से विचार किया गया है।

मीमांसा दर्शन में यह मान्यता है कि हर कर्म एक अदृश्य शक्ति को जन्म देता है जिसे ''अपूर्व अथवा ''अद़ष्ट कहा जाता है। मनुष्य के जीवन भर के कृत्य, धर्म और अधर्म, इस में संचित होते रहते हैं। समय आने पर तथा परिस्थिति अनुकूल होने पर यह 'अपूर्व शक्ति फल के रूप में परिलक्षित होती है। इस शक्ति को देखा नहीं जा सकता किन्तु उस के प्रभाव लक्षित होते हैं। जिस प्रकार अगिन का प्रभाव प्रकट होता है यधपि वह दिखाई नहीं देता। न्याय तथा सांख्य दर्शन इस शक्ति को अग्नि का गुण ही मानते हैं किन्तु मीमांसा के लिये यह अपने में विशिष्ट पदार्थ है।

किसी भी कर्म से एक संस्कार उत्पन्न होता है जो आत्मा में ही वास करता है। उन का आत्मा के साथ तदात्मय हो जाता है अर्थात वह एक हो जाते हैं। उस के साथ ही यह एक शरीर से दूसरे में जाता है तथा अपना प्रभाव प्रस्तुत करता है। अपना फल देने के पश्चात यह समाप्त हो जाता है। एक बार इन सब का प्रभाव समाप्त हो जाने पर आत्मा मुक्त हो जाती है। कुछ मीमांसकों द्वारा इस शक्ति को नियति भी कहा गया है और कुछ के द्वारा विधि। पर यह स्पष्ट है कि मनुष्य अपने कार्य के द्वारा ही इसे उत्पन्न करता है।

जैन मत के अनुसार आत्मा असीमित है किन्तु शरीर के अनुरूप है और विकसित अथवा संकुचित हो सकती है। आत्मा अपने में पवित्र है। इस के साथ कर्म के अंश चिपक जाते हैं। इस से आत्मा का स्वरूप अपवित्र हो जाता है। मुक्त होने के लिये मनुष्य को सब से पहले समस्त कर्म का संवार करना चाहिये। इस के पश्चात उसे पूर्व कर्मों - प्रारब्ध कर्म - की निर्झरता अर्थात उन का फल समाप्त करने के लिये कार्य करना चाहिये। यह प्रायशिचत के माध्यम से हो सकता है। इस से न केवल नये कर्म आते नहीं हैं वरण पुराने कर्मों को भी समाप्त किया जा सकता है। मनुष्य को सभी कर्मों से ऊपर उठना चाहिये। यहाँ तक कि अंतिम पड़ाव में खाने पीने तक को छोड़ देना चाहिये।

बौद्ध मत में चार आर्य सत्यों का वर्णन किया गया है अर्थात यह संसार दुख है। इस दुख का कारण है क्योंकि बिना कारण कोई बात नहीं होती। दुख का निरोध हो सकता है। इस के लिये अष्टमार्ग पर चलना आवश्यक है। इस मार्ग में सही कर्म करने पर बल दिया गया है। इन के पालन से ही दुख का नाश होगा और निर्वाण प्राप्त हो गा। पर कौन दुख से निवार्ण पाये गा इस पर बुद्ध स्वयं केवल सांकेतिक भाषा मेंं बात करते हैं। बाद में इस बारे में बौद्ध दार्शनिकों ने विस्तृत विचार किया है। हीनयान मत के अनुसार जब तृष्णा तथा इच्छायें समाप्त हो जाती है तो सब समाप्त हो जाता है जिस प्रकार तेल समाप्त हो जाने पर दिये की रोशनी समाप्त हो जाती है। शून्यवाद के अनुसार कुछ है ही नहीं अत: कुछ समाप्त होने का प्रश्न ही नहीं है। जीवन विचारों का पुंज है और वह क्षणिक हैं। इन की श्रृंखला है। प्रत्येक क्षण दूसरे को जन्म दे कर समाप्त हो जाता है। जब यह क्रम समाप्त हो जाता है तो वह निर्वाण की स्थिति होती है। तब तक यह श्रृंखला एक जन्म से दूसरे जन्म तक चलती रहती है।

महायान के अनुसार भी ऐसी ही श्रृंखला रहती है क्रिन्तु अच्छे कर्म तथा सही ज्ञान से जन्म मृत्यु के बन्धन से छुटकारा मिलता है तथा मनुष्य शनै: शनै: ऊपर की ओर बढ़ता है। बौद्धिस्तव के स्तर पर पता चलता है कि समस्त वाह्य जगत मिथ्या है और केवन मन ही सत्य है। अन्तत: वह आनन्दमय ब्रह्रा में वास करता है। यहाँ आत्मा को परोक्ष रूप से स्वीकार किया गया है जो कर्मफल को साथ ले कर चलता है।

वेदान्त में भी आत्मा के एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने पर बल दिया गया है। यह जगत मिथ्या है। सत्य अविद्या के कारण छिपा है। वेदान्त में ज्ञान की प्राप्ति पर बल दिया गया है। सदकर्मो से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान प्राप्त हो जाने पर इस जगत के मिथ्या होने का भान होता है। कर्मफल अवश्य मिलता है। यह एक जन्म से दूसरे में जाता है। वेदान्त की मान्यता है कि आत्मा परमात्मा का ही अंश है। यह निर्लिप्त है। ऐसे में कर्म भी इस के साथ कैसे जुड़ सकते हैं। इस के समाधान के लिये अणुजीव की कल्पना की गई है। कर्मफल इस अणुजीव के साथ वास करते हैं और यह आत्मा के साथ ही दूसरे शरीर में जा कर अपना फल देता है। निष्काम कर्म से फल की उत्पत्ति नहीं होती है। कर्मफल की समाप्ति पर अणुजीव शेष नहीं रहता है। आत्मा ब्रह्रा में ही लीन हो जाती है। किन्तु मतान्तर से द्वैत मत के अनुसार वह ब्रह्रा लोक में वास करती है।


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