• kewal sethi

एक अध्ययन - चमचागिरी के सिद्धॉंत



चमचागिरी के सिद्धॉंत







केवल कृष्ण सेठी

© सर्वाधिकार सुरक्षित

लेखक - केवल कृष्ण सेठी


















प्रकाशक - केविसा कर्मस्थली

जी -002 गार्डन रैज़ीडैंस

चूना भट्टी, भोपाल

462016


मूल्य - एक सौ बीस रुपये केवल

प्रथम संस्करण -- 2021

चमचागिरी के सिद्धांत

विषय प्रवेश


एक स्वतन्त्र विषय के रूप में चमचागिरी का विशय स्थापित नहीं हो पाया है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि इस के विधिवत अध्ययन का यह प्रथम प्रयास है (हम ने कई स्थानों पर कुछ विद्वानों के मत उल्लेखित किये हैं) परन्तु जहां तक जानकारी है, इस विषय पर सामग्री का एकजाईकरण नहीं किया जा सका है।


चमचागिरी को कई नामों से जाना जाता है। इन में कुछ हैं - चापलूसी, चाटुकारिता, मक्खन लगाना, मस्का लगाना। हर भाषा में, हर देश में इस के बारे में अनेकानेक शब्द उपलब्ध हो सकते हैं क्योंकि चमाचागिरी विश्व व्यापक संवृति है। हम ने इस अध्ययन में चमचागरी तथा चाटुकारिता के शब्द ही प्रयोग में लाये हैं जो अन्य पर्यायवाची शब्दों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।


चमचागिरी कोई सामान्य ज्ञान नहीं है। यह संस्कृति के मूल तत्व का प्रतिबिम्ब है। यह तिरस्कार की बात नहीं है वरन् लोकमत के हृदय की धड़कन है। जनता जनार्दन की मनोवृति और आकांक्षाओं को संजोती हुई अपने में पूर्ण कला है, विज्ञान है। इस का अध्ययन मानव विज्ञान का अध्ययन है। यह मानवता के पूर्व से विद्यमान है तथा प्रत्येक काल में इस में प्रगति ही होती रही है। मानव समूहों ने सदैव प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का प्रयास किया है तथा चमचागिरी इस में सदैव उस की भागीदार रही है।


आगे हम समय समय पर इतिहास से इस के उदाहरण दें गे जिस से सिद्ध हो गा कि इस का महत्व कितना है।




परिभाषायें


पहले हम परिभाषाओं से आरम्भ करते हैं —


1. चमचागिरी - चमचागिरी से मुराद प्रशंसा के वह पुल बांधना है जो व्यक्ति के गुण दोष के आधार पर आश्रित न हों, वरन् दूसरे प्रयोजन से हों। इसे अन्य नामों से भी जाना जाता है जैसे चाटुकारिता, खुशामद , मक्खन लगाना, मस्का लगाना इत्यादि जो अर्थ प्रयोग से पता चलता है।

2. चमचा - वह व्यक्ति जो चमचागिरी करता है। इस में चमचों के चमचों को भी शामिल किया जा सकता है। इसे मुसाहिब, खुशामदी, चाटुकार अथवा मक्खनबाज़ भी कहा जाता है।

3. प्रशंसा - किसी के गुण के बारे में उस के सामने अथवा उस की अनुपस्थिति में बिना बढ़ाये चढ़ाये वर्णन करना प्रशसा कहलाता है।

4. स्तुति - जब प्रशंसा किसी अव्यक्त वस्तु, कल्पित अथवा वास्तविक, के लिये की जाती है तो वह स्तुति कहलाती है।

5. चाटुकरित - इस का तात्पर्य उस व्यक्ति अथवा अव्यक्त से है जिस की चमचागिरी की जाये। (इस का तथा इष्ट का अन्तर समझना आवश्यक है यद्यपि कई बार इसे समानार्थक माना जता है)

6. श्रद्धा - इस से तात्पर्य उस भावना से है जो किसी अन्य व्यक्ति - भौतिक अथवा अलौकिक - के प्रति रखी जाती है।

7. इष्ट - वह व्यक्ति - भौतिक अथवा अलौकिक - जिस पर श्रद्धा रखी जाये।

8. भक्त - जिस व्यक्ति की अपने इष्ट पर श्रद्धा होती है, उसे भक्त कहा जाता है। और उस श्रद्धा के भाव को भक्ति कहा जाता हैं

(स्पष्टीकरण - भक्त की अपने इष्ट पर अथाह श्रद्धा होती है जबकि चमचों की कोई श्रद्धा नहीं होती। वह निहित स्वार्थों के कारण चमचे बन जाते हैं। चमचे के अपने एजेंडे होते हैं जिस से वह अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। परन्तु कई बार पराकाष्ठा की स्थिति में चमचे भी चाटुकरित के प्रति श्रद्धा रख सकते हैं)


यह उल्लेखनीय है कि जिस की चमचागिरी की जाती है, उस के लिये भाषा में कोई विशिष्ट शब्द नहीं है। हम ने इस के लिये ऊपर एक शब्द दिया है जो हमारी कृति है। आगे चल कर इस पर विस्तृत विचार किया जाये गा।




उत्पत्ति तथा विकास


चमचागिरी का चलन कब से है, इस में कोई संदेह नहीं हो गा। इन्सान के पैदा होने के साथ ही इस का शुभारम्भ हो गया था। सम्भवतः यह उस से पहले भी विद्यमान था। प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि खुदा ने पहले फरिश्तों को बनाया। इन की संख्या तो असीमित बताई जाती है पर इन में एक अबलीस था। अबलीस बहुत नेक और शरीफ फरिश्ता था। उस ने खुदा की अबादत में हज़ारों साल गुज़ारे। वक्त गुज़रने के बाद खुदा ने एक अपनी ही शक्ल के एक बन्दे का तसुव्वर किया जो सब फरिश्तों से बढ़ कर हो। उस ने आदम बनाया और उसे वह रुतबा अता किया जो किसी भी फरिश्ते को प्राप्त न था। खुदा ने फिर तमाम फरिश्तों को हुकुम दिया कि वह इस को सजदा करें। यह चमचागिरी का सबूत है कि खुदा के हुकुम की तामील करते हुये सभी फरिश्तों ने इन्सान को सजदा किया। सिर्फ अबलीस ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उस ने तर्क किया कि जब उसे बनाया गया था तो खुदा ने हुकुम दिया था कि उस के सिवा किसी को सजदा न किया जाये। इस तरह खुदा की आज्ञा पालन न करने का नतीजा यह हुआ कि अबलीस को जन्नत से निकाल दिया गया। कहने का सार यह है कि इन्सान के आने के साथ ही सजदा और चमचागिरी का चलन आरम्भ हो गया। समय के साथ साथ इस का विस्तार काफी हुआ। अबलीस को शैतान अथवा डैविल भी कहा जाता है।


उन देशों में जहां आदम को प्रथम इन्सान नहीं माना जाता है वरन् क्रमित विकास की बात कही जाती है, चाटुकारिता का प्रारम्भ प्रकृति के कारण हुआ। प्रारम्भ में यह विचार था कि प्रकृति ने हमें जो बख्शा है (जैसे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि इत्यादि) वह अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं तथा वह चाहें तो अपनी करुणा का मुंह मोड़ सकते हैं। इन से लाभ के इच्छा रखी जाना आवश्यक है एवं उन की खुशामद की गई कि वह मनुष्य के प्रति दयावान रहें। इन प्रकृति की वस्तुओं से जीवन में सहूलियत आती थी तथा भय भी लगता था अतः उन की प्रशंसा से चाटुकारिता विधा का जन्म हुआ। इस प्रवृति को पूरे संसार में पाया जाता है चाहे वह भारत की संस्कृति हो अथवा माया संस्कृति हो अथवा न्यूज़ीलैण्ड की मावरी संस्कृति। आकाश, भूमि, वन को पूज्य मान कर उन के लिये गीत गाये जाते हैं। उन का आभार माना जाता है तथा उन के अपने पक्ष में रहने के लिये निवेदन किया जाता है।


यदि भारत को देखें तो समय बीतने के साथ यह महसूस किया गया कि प्रकृति के यह तत्व भी अपने में स्वतन्त्र नहीं हैं वरन् किसी अन्य शक्ति के आधीन हैं। ऋगवेद में इसे ऋत का नाम दिया गया। परन्तु इस से मूल प्रकृति के तत्वों की अवमानना नहीं हुई। उन्हें प्रसन्न करने की क्रिया यथावत रही। समय पा कर चाटुकारिता का यह रूप स्तुति कहलाया। ऐसा इस कारण हुआ कि सामान्य अनुभव था कि चाटुकारिता का इन प्राकृतिक विधाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह भी नियम से बंधे हैं एवं उसे वह बदल नहीं सकते हैं। इस कारण यह माना गया कि उन की प्रशंसा के गीत एवं पाठ को चाटुकारिता कहना ही गल्त है। पर फिर भी यह विद्यमान तो हैं तथा मौसम इत्यादि को प्रभावित करते हैं अतः गुणगाण करना उचित हो गा।


इस संदर्भ में भारतीय संस्कृति का विवरण हम बाद में विस्तार से प्रस्तुत करें गे क्योंकि इस में कुछ विशिष्टायें हैं।



चमचागिरी - कला या विज्ञान


इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि चमचागिरी कला है या विज्ञान। दोनों विचारों के पक्ष में तथा विपक्ष में अनेक तर्क दिये जा सकते हैं। आगे चल कर हम देखें गे कि चमचागिरी हर किसी के बस की बात नहीं है। चमचागिरी करने वाले सभी एक ही स्तर के हों गे, इस बात को सोचा भी नहीं जा सकता। हर एक का चमचागिरी करने का ढंग अलग अलग है और इसे एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को सिखाया जाना अथवा अन्तरित किया जाना भी संभव नहीं है। पुराने जमाने में राज दरबारों में इस बात की होड़ लगी रहती थी कि अधिक सफल चमचागिरी कौन कर सकता है। वास्तव में इसी से इस कला के विकास में गति आई एवं इसे बल मिला। इसी कारण अनेक विद्वानों का मत है कि चमचागिरी एक कला है। चित्रकारी या गाना गाने की तरह उस का भी व्यक्तिगत रूप ही रहता है। विज्ञान का मौलिक रूप यह है कि किसी विशेष परिस्थिति होने पर वही परिणाम हर बार मिले गा। जैसे कोयले को जलायें गे तो कार्बन डाययक्साईड ही पैदा हो गी। उस की मात्रा का भी अनुमान लगाया जा सकता है। चाटुकारिता में अथवा चमचागिरी में इस प्रकार की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। परिणाम चाटुकार के तरीके पर तथा पारंगत होने पर निर्भर रहता है अतः इसे विज्ञान मानना अनुचित हो गा। यह शुद्ध रूप से कला ही है।

दूसरी ओर के विद्वानों का कहना है यह सही नहीं है कि चमचागिरी एक व्यक्तिगत उपलब्धि है। उन का तर्क है कि चमचागिरी का व्यापक रूप ही इस बात को जितलाता है कि चमचागिरी कला नहीं है। कोई भी कला इतनी व्यापक रूप से फैल नहीं सकती है कि सभी व्यक्ति कलाकार बन सके। हर व्यक्ति जिस का गला है, गायक नहीं हो सकता, सफल गायक होना तो अलग बात है। इसी प्रकार कागज़ पर रंग तो हर कोई बिखेर सकता है पर इस से उसे चित्रकार नहीं कहा जा सकता। परन्तु जहाॅं तक चमचागिरी का प्रश्न है, यह व्यापक है। कोई भी व्यक्ति चमचागिरी कर सकता है तथा समय पड़़ने पर करता भी है। यह सही है कि हर व्यक्ति सफल चमचा नहीं बने सकता। उन का तर्क है कि चमचागिरी के निश्चित सिद्धाॅंत हैं तथां इन चमचागिरी के सिद्धांतों का पालन करना चमचों के लिए आवश्यक है। यह अलग बात है कि वह सफल हों या ना हों। यदि इन मौलिक सिद्धाॅंतों की अनदेखी की जाये तो चमचागिरी के परिणाम अपेक्षा के विपरीत भी हो सकते है।


अर्थशास्त्र में उपलब्धि एवं मांग के नियम की बात थी, इसी तरह चमचागिरी के भी अपने नियम होते हैं। इसी प्रकार मनोविज्ञान के नियम चमचागिरी को आधार देते हैं। समाजशास्त्र की तरह उसे भी समाज की परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है। समाज के विभिन्न अंगों के आपसी मेलजोल का हिसाब चमचागिरी का मूल नियम है और इसलिए चमचागिरी को विज्ञान की श्रेणी में ही रखा जा सकता है.


हमारा विचार है कि यह सही है कि चमचागिरी भौतिक विज्ञान नहीं है। रसायन शास्त्र अथवा भौतिकी शास्त्र इत्यादि की तरह इस के नियन्त्रित प्रयोग नहीं किये जा सकते। चमचागिरी से प्राप्त होने वाले परिणामों को किसी मापदंड से आंका नहीं जा सकता। यह इस कारण नहीं हो पाता कि चमचागिरी में केवल एक ही शक्ति कार्य नहीं करती है बल्कि अनेक प्रकार के आधार, विचार एवं प्रकार इस में रहते हैं। इस में किस का कितना योगदान रहता है, यह भी समय, स्थिति, चमचे की योग्यता, तथा चाटुकरित के स्वभाव पर निर्भर रहता है।


संक्षेप में यह कहना हो गा कि इसे वैज्ञानिक रूप देने लिए नियन्त्रित प्रयोग नहीं हो पाते परन्तु भौतिकी विज्ञान में जैसे प्रकाश को तरंग तथा द्रव्य दोनों माना जाता है, वैसे ही चमचागिरी में दोनों प्रकार की स्थिति रहती है। क्वाण्टम विज्ञान की भांति किसी स्थिति विशेष का आंकलन नहीं किया जा सकता। एलैक्ट्रोन कौन से स्थान पर हो गा, इस की केवल सम्भावना ही बताई जा सकती है। इस को परखने पर उस की स्थिति बदल जाती है अर्थात पर्यवेक्षक का इस में हस्तक्षेप रहता है। इसी भांति चमचागिरी में केवल सम्भावना व्यक्त की जा सकती है कि इस का प्रतिफल कितना तथा किस प्रकार का हो गा।, निश्चित रूप से परिणाम नहीं बताया जा सकता क्योंकि इस में चाटुकरित की प्रतिक्रिया भी शामिल रहती है जिस के बारे में आगे विचार किया गया है। अतः चमचागिरी को सामाजिक विज्ञान कहा जा सकता है जिस प्रकार अर्थशास्त्र अथवा समाज शास्त्र को कहा जाता है।




चमचागिरी का महत्व एवं विकास


चमचागिरी इतनी व्यापक है तथा इस का अपनाने वालों की संख्या इतनी अधिक है कि इस का महत्व बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह स्वयंसिद्ध है। चमचागिरी समाज के सभी अंगों में व्याप्त है। समाज और समाज से सम्बन्धित समस्याओं से चमचागिरी का गहरा सम्बन्ध है। परन्तु फिर भी हम पाते हैं कि कुछ लोग सफल चाटुकार होते है तथा कुछ इस में पारंगत नहीं हो पाते क्योंकि वह मूल सिद्धांतों का पालन नहीं करते। इस कारण चमचागिरी शास्त्र की जानकारी एवं अध्ययन आवश्यक है। इसी से चाटुकरित व्यक्ति की योग्यता, कमज़ोरी, आकांक्षा, इत्यादि का सही परिचय मिलता है। इस के बिना चमचागिरी एक मृतप्रायः विचार हो गा। आधुनिक युग में संस्कृति और सभ्यता के विकास ने तथा सामाजिक समस्याओं की जटिलता ने चमचागिरी की तथा इस के सिद्धांतों के अध्ययन की आवश्यकता को और बढ़ा दिया है।


पूर्व में राज्य की गतिविधियां सीमित होती थीं। प्रशासन में वास्तविक विकेन्द्रीकरण था। अंग्रेज़ी काल से पूर्व केन्द्रीय शासन ग्रामों में दखल नहीं देता था जब तक कि उस के द्वारा प्राप्य भू राजस्व में कमी नहीं आती थी। अंग्रेज़ी काल में प्रथम बार सीढ़ी दर सीढ़ी प्रशासकीय व्यवस्था ग्राम स्तर से ले कर सचिवालय स्तर तक स्थापित हुई। इस में नीचे के कर्मचारी अथवा अधिकारी के सेवा काल की सार्थकता वरिष्ठ अधिकारी पर निर्भर हो गई। इस से चाटुकारिता को बहुत बल मिला और इस के नये कीर्तिमान स्थापित हो गये।


अंग्रेज़ी राज में अधीनस्थ कर्मचारियो की पदोन्नति वरिष्ठ अधिकारियों की राय पर निर्भर रहती थी। इसे सी आर का नाम दिया अर्थात गोपनीय प्रतिवेदन। सामान्यतः वर्ष की समाप्ति पर इसे लिखा जाता था जिस में वर्ष भर में सम्पन्न कार्य पर टीप दी जाती थी। सरकारी फाईलों में इस बात के ढेर सारे निर्देश हैं कि यह राय वास्तविक कार्य पर तथा वस्तुपरक ही होना चाहिये तथा इस का लक्ष्य कर्मचारी के कार्य में सुधार लाना है। इस का ध्येय अधीनस्थ कर्मचारियों की कर्तव्य निष्ठा का प्रतिबिम्ब होना चाहिये। इन अनुदेशों का संकलित रूप अपने में ही एक बहृत ग्रन्थ हो गा जो हमारे अभी के विषय से सम्बन्धित नहीं है। परन्तु यह इस कारण वर्णित है कि इन सब प्रयासों के बावजूद सी आर केवल चाटुकारिता का ही प्रतिबिम्ब रही है और इस में कोई संदेह नहीं कि यह ऐसी ही रहे गी। यह सी आर अधीनस्थ तथा वरिष्ठ के आपसी सम्बन्धों पर निर्भर रहती है तथा रहे गीै तथा इस कारण चाटुकारिता का सदैव इस में योगदान रहे गा।


स्वतन्त्रता के पश्चात एक नये वर्ग ने भी चाटुकरितों की श्रेणी में अपना स्थान बनाया है। जनतन्त्र में जन प्रतिनिधियों का विशेष महत्व होता है तथा उन्हें कई प्रकार के अधिकार प्रदत्त हैं। इसी ने चमचागिरी को विशेष प्रोत्साहन दिया है। देखा जाये तो चमचागिरी का व्यापक प्रचार प्रसार इसी काल की देन है अथवा पूर्व में चाटुकारिता का योगदान तुलनात्मक रूप से सीमित ही कहा जाये गा। शासकीय सेवा में फिर भी व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य का विवरण सी आर का भाग ही होता है विशेषतः जब इस के बारे में अनेकानेक आदेश जारी किये गये हैं। राजनीति में भी शासकीय सेवाओं की तरह कई तल होते हैं तथा इन में आगे बढ़ने का दारोमदार चमचागिरी पर ही होता है विशेषतः इस कारण कि इस में चारित्रावली की कोई औपचारिकता पदोन्नति के लिये आवश्यक नहीं है तथा इस का पूरा श्रेय चमचागिरी को दिया जा सकता है।


इस कारण चमचागिरी के सिद्धांतों का अध्ययन और भी आवश्यक हो गया है। बीसवीं सदी के महान चाटुकार श्री रामानुजचारी का कथन था कि राजनीति में चमचागिरी का स्थान वही है जो इंजिन में चिकनाई - लूब्रिकैण्ट - का होता है। इस के बिना इंजिन ठीक से कार्य नहीं कर पाता है।


चमचागिरी का एक और व्यापक क्षेत्र प्रैस एवं मीडिया का है। इस क्षेत्र में यह विशेष बात ध्यान में रखने योग्य है कि यहां चमचागिरी दो तरफा होती है। शासकीय सेवा में तथा राजनीति में यह नीचे से ऊपर की ओर चढ़ती है जब कि मीडिया में यह दोनों तरफ से होती है। अर्थात मीडिया चमचागिरी करता भी है और करवाता भी है। इस पर भी बाद में विस्तार से बात की जाये गी।


चमचागिरी का एक और व्यापक क्षेत्र नर नारी के प्रेम का है। यह प्रेम स्वयं में ही व्यापक क्षेत्र है तथा इस में चमचागिरी की आवश्यकता सदैव रहती है। प्रेमिका के मुखड़े की, नयनों की, बाल की, चाल की तुलना किस किस से नहीं की गई है। एक पूरा साहित्य ही इस से भरा हुआ है। इसी प्रकार प्रेमी की हिम्मत, वीरता, लगन तथा स्थाईत्व के बारे में अनेक कथायें प्रसिद्ध हैं।


संक्षेप में चमचागिरी सफल होती है क्योंकि हम अपने बारे में अच्छी अच्छी बातों में विश्वास करना चाहते हैं। इंगलैण्ड के वोंक अध्ययनकर्ता द्वारा प्रतिपादित है कि इस मौलिक विचार के कारण ही हम चमचों की बात का सकारात्मक रूप ही देखते हैं जैसे कि हमारे वस्त्र सदैव स्वच्छ तथा आधुनिक रहते हैं अथवा हमारी रसिकता की प्रवृति अनुकरणीय है। तथा इसी कारण चमचागिरी उत्तरोतर प्रबति की राह में ही रहती है।


उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि चमचागिरी का अध्ययन क्यों आवश्यक है।



चमचागिरी के मौलिक सिद्धांत


किसी भी विज्ञान की तरह चमचागिरी के भी कुछ मौलिक सिद्धांत हैं जो अटल तो नहीं हैं किन्तु जिन का पालन सफल चमचागिरी करने तथा सफल चाटुकार बनने के लिये आवश्यक हैं। संक्षेप में यह सिद्धांत इस प्रकार हैं –


1. चमचागिरी का सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं है किन्तु चमचागिरी तभी की जा सकती हे जब चाटुकरित व्यक्ति में कुछ गुण सम्भाव्य हो, चाहे उस की मात्रा कितनी ही कम क्यों न हो।

2. चमचागिरी तभी की जा सकती है जब चाटुकरित व्यक्ति कुछ देने की स्थिति में हो। प्राप्य वस्तु पदार्थ के रूप में हो, यह आवश्यक नहीं है।

3. चमचागिरी आम तौर पर चाटुकरित की उपस्थिति में ही होना चाहिये। परन्तु जहां यह निश्चित हो कि सामने मौजूद व्यक्ति व्यक्त विचारों को चाटुकरित तक बिना घटाये बढ़ाये पहूंचा दे गा, चाटुकारिता की जा सकती है।

4. चमचागिरी तथा अतिश्योक्ति का चोली दामन का साथ है किन्तु इस में सीमा का ध्यान रखना आवश्यक है अन्यथा चाटुकरित व्यक्ति इसे उपहास या कटाक्ष मान सकता है।

5. तृतीय (अनुपस्थित) व्यक्ति की चाटुकारी की जा सकती है यदि इस का आश्य उपस्थित व्यक्ति के भाव को प्रभावित करने के लिये हो अथवा व्यक्त विचारों की इच्छित व्यक्ति तक पहूंचने की प्रबल सम्भावना हो।


यहां पर हम इस विषय पर चर्चा कर सकते हैं कि जिस व्यक्ति की चमचागिरी की जाती है, उस की क्या प्रतिक्रिया होती है। यह एक शाश्वत तथ्य है कि कोई भी व्यक्ति यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होता कि उसे चमचागिरी से कुछ लेना देना है अथवा वह उस से प्रभावित होता है। इस कारण ऐसे व्यक्ति के लिये कोई भी शब्द किसी भाषा के शब्दकोष में नहीं है (हम ने इस के लिये नया शब्द बनाया है - देखिये परिभाषा)। अंग्रेज़ी में flatter से flattered का शब्द भी कत्रिम रूप से बनाया गया है। परन्तु दूसरी ओर कोई भी व्यक्ति इस से अछूता नहीं है। शेकस्पीयर ने अपने नाटक में अपने पात्र ब्रटुस से कहलवाया है but when i tell him that he hates flatterers, he says he does, being then the most flattered. अर्थात जब में उस से कहता हूं कि वह चाटुकारों से नफरत करता है, तो वह कहता है कि हां और तब वह सब से बड़ा चाटुकरित होता है।


वास्तव में यह बात सब के लिये सही है। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे चाटुकारी पसन्द न हो। यहां यह बात उल्लेखित है कि कुछ व्यक्ति जान बूझ कर चमचे रखना चहते हैं और इस बात को जानते हैं कि वह चमचों से घिरे हुये हैं। ऐसा वह इस कारण करते हैं कि इस से वह व्यक्ति प्रभावित होता है जिन से उस की अपेक्षायें हैं। वास्तव में वह स्वयं चाटुकार है और अपने इर्द गिर्द चमचे रख कर वह चमचागिरी कर रहा होता है। आम अनुभव है कि वास्तव में राजनैतिज्ञों का स्तर ही इस से देखा जाता है कि उस के कितने चमचे हैं।


इस का एक उदाहरण देना उचित हो गा। एक भूतपूर्व अधिकारी एक भूतपूर्व मुख्य मन्त्री के साथ रेल से यात्रा कर रहा था। दोनों का गन्तव्य स्थान एक ही था। स्टेशन आने पर भूतपूर्व मुख्य मन्त्री ने अधिकारी से कहा कि वह पहले उतर जाये तब वह अपने स्थान से उठें गे वरना चमचे उन को भी घेर लें गे और निकलना कठिन हो जाये गा। वस्तुतः यह बात सही थी। पूर्व सूचना दे कर यात्रा इसी लिये की जा रही थी कि स्टेशन पर उन्हें घेर लिया जाये।


चमचों के कितने सापेक्षित स्तर हो सकते हैं, इस बात को निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता। चमचों के चमचे होते हैं और फिर उस से आगे उन चमचों के चमचे। इन चमचों का दायित्व अपने से वरिष्ठ चमचे के लिये भीड़ जुटाना होता है ताकि उस का महत्व प्रदर्शित किया जा सके। उदाहरणार्थ एक उप महानिरीक्षक ने मुख्य मन्त्री को विश्वास दिलाया कि वह प्रधान मन्त्री की सभा के लिये दो लाख श्रोता का प्रबन्ध कर लें गे। यह तो वह नहीं कर पाये परन्तु उन का प्रयास चाटुकारी का तथा स्वयं को सफल चाटुकार प्रमाणित करने का प्रयास अनुकरणीय कहा जा सकता है।


ऊपर हम ने जो सिद्धांत बताये हैं, उन में से प्रत्येक का उदाहरण दे कर स्थिति को स्पष्ट करना उचित हो गा।


प्रथम सिद्धांत के बारे में एक उक्ति काफी हो गी। नैनसुख से वंचित व्यक्ति को महान चित्रकार कहना चमचागिरी नहीं हो सकती है। कुछ न कुछ योग्यता अथवा योग्यता की सम्भावना अनिवार्य है। उदाहरण के तौर पर उस मुख्य मन्त्री की बात लें जो केवल इस कारण मख्य मन्त्री थी कि उस का पति मुख्य मन्त्री नहीं बन सकता था। ऐसे में उस मुख्य मन्त्री को वित्तीय प्रबंधन का विशेषज्ञ कहना उसे प्रभावित नहीं करे गेा अतः यह चाटुकारिता के सिद्धांत के विरुद्ध है। परन्तु उस में भी कुछ गुण प्राप्य है, इस के बारे में सोचा जा सकता है। जैसे यह कहा जाये कि वह अपने विचार अच्छी तरह प्रस्तुत कर सकती है। (भले ही वह सब्ज़ी में छौंक लगाने के बारे में हो)। ज्ञातव्य है कि वह बाद में आम सभा में भाषण देने योग्य भी हो गई थीं। ऐसा ही उदाहरण एक प्रधान मन्त्री की विधवा के बारे में भी दिया जा सकता है।


दूसरे सिद्धांत के बारे में देखा जाये गा कि चमचागिरी कोई जन्मजात प्रवृति नहीं है। बिना प्रयोजन इस के किये जाने का कोई प्रयोजन नहीं है। कहा गया है - जिन को कछु न चाहिये, वह शाहों के शाह। जब अपेक्षा हो तथा चाटुकरित कुछ देने की स्थिति में हो और इच्छा पूर्ति में सक्षम हो, तभी चमचागिरी की जाना चाहिये। व्यर्थ में किसी का चमचा बनने का कोई अर्थ नहीं है। भिखारी को कुबेर अथवा अन्नदाता कहना निष्प्रयोजन है। यहां पर इस बात का ध्यान रखा जा सकता है कि अभ्यास के लिये जब चमचागिरी की जाती है जिस में सम्बोधित व्यक्ति कुछ देने की स्थिति में नहीं है तथा हमें यह बात ज्ञात है कि यह केवल अभ्यास है, चमचागिरी के दायरे में नहीं आती है।


उन्नीसवीं सदी के महान चाटुकार आनन्द श्ंकर का कहना है कि कई बार चाटुकारी केवल अभ्यास के लिये भी की जाती है और की जाना चाहिये। इस का प्रभाव देखने से कई सबक सीखे जा सकते हैं तथा अपनी तकनीक में सुधार लाया जा सकता है। वस्तुतः इसे चाटुकारी तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि कोई लाभ अपेक्षित नहीं है परन्तु फिर भी इस के बारे में जानना आवश्यक है। इस में यह निहित है कि यह स्मरण रखा जाये कि यह केवल अभ्यास ही हो गा।


तीसरे सिद्धांत को लिये जाये। जिस से अपेक्षा है, उस की चमचागिरी का ही महत्व है। बिना प्रयोजन के चमचागिरी व्यर्थ है। परन्तु कई बार ऐसा होता है कि उस व्यक्ति तक पहुंच ही नहीं हो पाती जिस से अपेक्षायें हैं। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति के सामने लक्षित व्यक्ति को गुणगाण किया जा सकता है जो लक्षित व्यक्ति को सूचित करने की स्थिति में हो। एक प्रकार से उस व्यक्ति से अपेक्षा है कि वह चमचागिरी की बात लक्षित व्यक्ति तक पहुंचा दे गा, इस कारण वास्तव में चमचागिरी उपस्थित व्यक्ति की ही हो रही है। चमचागिरी जिस के सामने की जा रही है उसे चमचा कहा जा सकता है। उस के समाने चमचागिरी करने वाले व्यक्ति को चमचे का चमचा कहा जा सकता है। ऐसा किस स्तर पर किया जा सकता है, इस पर विद्वान एक मत नहीं हैं। चमचागिरी का महत्व गणित के प्रति एक्सपोनैंशल सूत्र म.ग की तरह है। इस की उपयोगिता अंतिम लक्षित व्यक्ति से जितनी दूरी हो, उसी अनुपात में गति अधिक तेज़ी से कम होती जाती है।


चौथे सिद्धांत के बारे में एक उक्ति वर्णित करना उचित हो गा। महान चाटुकार देव कान्त बरुआ का कथन था - इंदिरा इज़ इण्डिया। वह एक सफल चाटुकार था जो कांग्रैस दल के अध्यक्ष पद तक पहुंचा किन्तु उस का यह कथन परिहास का उदाहरण बन कर रह गया। इस में संदेह है कि इंदिरा उस के इस कथन से प्रसन्न हुई हों गी क्योंकि इस से उन की महता सिद्ध नहीं होती वरन् पूरे देश में इस कथन का मज़ाक ही होता रहा। इस उक्ति के कारण इंदिरा गांधी को काफी नुकसान उठाना पड़ा तथा बरुआ की प्रथम अवसर पर ही छुट्टी कर दी गई। उस के बाद उन के बारे में किसी ने नहीं सुना। उन के राजनैतिक जीवन का अन्त इस उक्ति के साथ ही समाप्त हो गया।


पांचवें सिद्धांत को लिया जाये। सुभद्रा कुमारी चैहान ने अपनी नायिका की चमचागिरी इस प्रकार की है -

लक्षमी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता का अवतार

देख मराठे पुलकित होते उस की तलवारों के वार

नकली युद्ध, ब्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, यह थे उस के प्रिय खिलवाड़

यद्यपि वास्तविकता यह है कि उन की नायिका किसी भी स्थान पर नहीं टिक पाईं। वह झांसी की रानी थीं, सैना उन के साथ थी, पर वह वहां पर नहीं रह पाईं। कहा गया - रानी बढ़ी, कालपी आई - पर इस में बढ़ने की बात कहां है, यह तो पलायन है। झांसी, कालपी, ग्वालियर - कहीं भी वह काबिज़ नहीं रह पाईं, ठहर न पाईं। उस के बचपन के बारे में कोई ऐत्हासिक तथ्य नहीं पाये जाते सिवाये इस के कि वह नाना के साथ पली बढ़ी थी। परन्तु आज जो व्यक्ति उन्हें वीर मानते हैं, उन की तुष्टी इस से हो जाती है। इस कारण इसे चमचागिरी की श्रेणी में रखा जा सकता है। वास्तव में यह चाटुुकारिता उन की है जो उस देवी को आदर्श मानते हैं। यहां पर इस बात को देखा जा सकता है कि वह लड़ीं। इस कारण वीरता का कुछ अंश उन में था। कुछ भाव था जिसे परिवर्धित किया गया है।


सफल चाटुकार बनने के लिये इन सिद्धांतों को सदैव याद रखा जाना आवश्यक है। इन में से किसी के भी उल्लंघन से उद्देश्य की पूर्ति में बाधा आ सकती है।


कुछ उपयोगी प्रश्नोत्तर


क्या चमचागिरी नीचे वालों की भी की जा सकती है, यह पूछा जाता है। हमारी परिभाषा के अनुसार उस व्यक्ति की चमचागिरी की जाती है जो कुछ देने की स्थिति में हो।


मारग्रेट थैचर, ब्रिटेन की प्रधान मन्त्री, के बारे में बताया जाता है कि वह जब कहीं खाना खाती थी तो रसोई में जा कर खाना बनाने वाले की तारीफ ज़रूर करती थी। उस की इस आदत का खूब प्रचार किया गया और इस से उसे चुनाव के समय बहुत लाभ पहुॅंचा। यहाॅं प्रत्यक्ष रूप से उन खाना बनाने वालों से कोई लाभ नहीं था परन्तु दूरगामी लाभ अवश्य हुआ। ऐसी स्थिति में अपने से निम्न श्रेणी वालों की चमचागिरी भी कुछ देने की स्थिति में ही होती है। अत्: नीचे वालों की चमचागिरी ऐसी परिस्थिति में की जा सकती है।


चाटुकारिता का एक रूप सामूहिक चाटुकारिता भी है। इस के भी दो रूप हैं। इसे उदाहरण से समझना आसान हो गा। आम तौर पर किसी सभा में जब मुख्य वक्ता कहता है ‘‘मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि इतने प्रबुद्ध एवं मेधावी लोग मुझे सुनने के लिये एकत्रित हुये हैं’’ तो यह एक शिष्टाचारवश करने वाली सामूहिक चाटुकारिता है। वक्ता को यह मालूम है कि आधे से अधिक लोग या तो उस कार्यालय के कर्मचारी हैं जिन्हें वहाॅं बैठने का आदेश मिला है अथवा किराये से बुलाये गये हैं।


सामुदायिक चाटुकारिता का दूसरा रूप तब प्रकट होता है जब कहा जाता है कि ‘‘भारत का आम मतदाता बड़ा समझदार है’’। यहाॅं पर आम मतदाता उपस्थित नहीं है। कहने वाले को (जो आम तौर पर नेता होता है) मालूम है कि आम मतदाता केवल भावनाओं का पुतला है जिसे कोई वस्तु निशुल्क (विद्युत, पेय जल, इण्टरनैट, ऋण माफी, लैपटाप इत्यादि) पाने का लालसा है। वह अपना मतदान धर्म, जाति इत्यादि देख कर करता है। या फिर अपनी आदत के मुताबिक करता है। इस प्रकार का कथन रस्म अदायगी है, उस से अधिक कुछ नहीं। परन्तु देखा जाये तो यह चाटुकारिता ही है क्योंकि इस में भी चाटुकारिता के तीनो अंग विद्यमान हैं यथा प्रशसा (सत्य/ असत्य), इक्ष्छा ( वोट पाने की), अवसर (चुनाव)। (इन के बारे में आगे और विचार किया गया है)


कई बार किसी व्यक्ति द्वारा की गई अवमानना को भी चाटुकारी का रूप दे कर अपना कार्य निकलवाने के लिये प्रयोग में लाया जा सकता है। जैसे कि पिछले चुनाव में एक नारा दिया गया - चौकीदार चोर है। सम्बन्धित नेता ने इस अपना लिया एवं स्वयं को चौकीदार की संज्ञा दे दी। प्रचार विरोधी दल ने किया और प्रतिफल सत्ताधारी दल को मिला। ऐसे ही अमरीका केे चुनाव में रीगन को (जो उस समय सत्तर से अधिक आयु के थे) को बताया गया कि उन की आयु उन के विरुद्ध जा सकती है। रीगन ने अपने प्रचार में विरोधी की कम आयु को कम अनुभव की संज्ञा दे कर रुझान अपनी ओर कर लिया।


क्या चाटुकारिता स्वागत योग्य भी हो सकती है। इस का उत्तर हाॅं में ही दिया जा सकता है। जैसे कि प्रसिद्ध चाटुकरित विशेषज्ञ भगवन्त सिन्हो ने कहा है कि ‘व्यक्ति केवल रोटी पर ही ज़िदा नहीं रहता है। उसे कभी कभी मक्खन की भी आवश्यकता होती है’’। अपने कार्य अथवा अपने विचार को सही, सामयिक एवं उपयोगी मानने का विचार सब को होता है तथा इस कारण प्रशंसा (भले ही वह चाटुकारिता हो) स्वागत योग्य है।


इसी वर्ग में प्रेमिका की अपेक्षायें भी होती है। यदि उन के होंटों की गुलाब की पंखुरियों से तुलना न की जाये तो इस का परिणाम गम्भीेर हो सकता है। इसी प्रकार चाॅंद सितारे तोड़ कर लाने की बात भी स्वागत योग्य है यद्यपि इस की सम्भावना तथा प्रयास के बारे में गम्भेीर संदेह ही प्रेमिका के मन में होता है। (एक प्रेमी से प्रेमिका से विवाह के बाद पूछा गया कि क्या वह अब भी चाॅंद तारों को तोड़ने की बात करता है। उस का उत्तर था कि अब तो केवल पुदीना की पत्तियाॅं तोड़ने तक ही बात चीत परिसीमित हो गई है)



चमचागिरी से सम्बन्धित कुछ उपयोगी बातें


चमचागिरी के तरीके इतने अधिक हैं कि इन के बारे में विवरण दिया जाना कठिन है। हर एक का अपना अपना तरीका होता है जो उसे की अपनी खोज होता हैं। हम कई सामान्य तरीकों से परिचित हैं पर कुछ अभिनव तरीकों पर नज़र डालना उचित हो गा।


उदाहरण के तौर पर न्यू यार्क में एक रैस्टोरा में एक वेटर की आदत थी कि वह खाने का बिल देते समय बिल के नीचे स्माईली ज़रूर बना देता था। इस से ग्राहकों का मनोरंजन होता था (अर्थात चाटुकारी होती थी) और उस के टिप कर राशि बढ़ जाती थी।


मध्य प्रदेश के एक आयुक्त वायलन विशेषज्ञ थे। उन को इस के लिये आमंत्रित करना अथवा उन के यहाॅं आमंत्रित होना चमचागिरी की पराकाष्ठा थी।


डेल कारनिजी की पुस्तक हाउ टू विन फ्रैण्डस एण्ड इनफलून्स पीपल how to win friends and influence people में चमचागिरी के कई तरीके बताये गये हैं। उन को कथन है "the only way i can get you to do anything is by giving you what you want." किसी से कुछ करवा पाना तभी सम्भव है जब उसे कुछ वांछित भाव दिया जाये।


एक और तरीका है "success in dealing with people depends on a grasp of the other person’s viewpoint." - दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को भली प्रकार समझ कर ही उस से व्यवहार में सफलता पाई जा सकती है।


यहाॅं पर हमें चाटुकारिता तथा प्रशंसा में अन्तर करना हो गा। दोनों में सामने वाले व्यक्ति के किसी गुण के बारे में बताया जाता है। पर अन्तर यह है कि प्रशंसा में कुछ ई्रनाम अथवा कृपा नहीं चाही जाती है। उदाहरण के तौर पर आप ने किसी पुरुष के बालों की सैटिंग देख कर उस के बारे में टिप्पणी की तो यह प्रशंसा हो गी क्योंकि आप उस से र्कोई अपेक्षा नहीं रख रहे हैं। यह केवल वास्तविकता का चित्रण है। इस से दूसरा व्यक्ति प्रसन्नचित्त हो जाये गा तथा आप भी उस सैटिंग को देख कर प्रसन्न हो गये। अर्थात दोनों को ही इस से मानसिक राहत पहुॅंची। स्वामी विश्वेन्द्रानन्द तथा डेल कारनिजी इस प्रकार की प्रशंसा की अनुशंसा अपनी पुस्तक में करते हैं।


इसी प्रशंसा के भाव जब हम किसी अव्यक्त के बारे में प्रस्तुत करते हैं तो यह स्तुति कहलाती है। जैसे भारत माता के गुणगाण करने वाला गीत ‘सारे जहाॅं से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा’ स्तुति गाण है, चमचागिरी नहीं। हम केवल आभार व्यक्त कर रहे हैं, अपेक्षा इस में नहीं है।


कई बार यह स्तुति प्रत्यक्ष रूप से न हो कर परोक्ष रूप से भी होती है जैसे कि दो पंजाबी मिलने पर कहें ‘वाहे गुरू जी का खालसा, वाहे गुरू जी की फतेह’ तो यह स्तुति भी है और आपस में अभिवादन का माध्यम भी। आपस में जय माता दी और राम राम कहना भी इस वर्ग में आता है।



मूल तत्व विवेचना


एक बार फिर चमचागिरी की मूल बातों को विवरण देना उचित हो गा ताकि इस का सही महत्व समझा जा सके। चमचागिरी में तीन अंग आवश्यक हैं। यह हैं-

1. चाटुकरित

2. काम निकलवाने की इच्छा

3. किसी गुण का वर्णन


स्पष्टतः ही चमचागिरी के लिये चाटुकरित का होना आवश्यक है। जैसा कि पूर्व में कहा गया है, सामान्यतः यह व्यक्ति प्रत्यक्ष में होना चाहिये। अपवाद के रूप में उस व्यक्ति तक चाटुकारिता का भाव पहॅंचाने में सक्षम व्यक्ति सामने होना चाहिये। इस में अपवाद भी हैं। कई बार अप्रत्यक्ष की चमचागिरी प्रत्यक्ष को प्रभावित करने के लिये की जाती है। उदाहरणतया यदि इंदिरा गांधी की चमचागिरी इस कारण की जाये कि प्रत्यक्ष व्यक्ति इन्दिरा गाॅंधी का भक्त है तथा कुछ देने की स्थिति में है तो इन्द्रा गॉंधी की प्रशंसा से वह भी प्रसन्न हो गा तो ऐसी स्थिति में अप्रत्यक्ष की चमचागिरी वास्तव में उपस्थित व्यक्ति की ही चमचागिरी है। ऊपर हम ने रानी लक्ष़्मी बाई के बारे में विचार व्यक्त किये थे, वह भी इसी श्रेणी में आते हैं।


चमचागिरी को दूसरा पहलू हैं - काम निकलवाने की इच्छा। यदि किसी व्यक्ति से कोई काम न निकलवाना हो या काम निकलवाने की भावना एवं सम्भावना न हो, चमचागिरी अर्थहीन प्रयास है। जैसा कि पूर्व में कहा गया है काम निकलवाने की तुरन्त आवश्यकता होना ज़रूरी नहीं है। यहाॅं पर इच्छा प्रधान बात है। उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति को पुलिस अधीक्षक ने सैल्यूट किया जिसे उस के साथ का अधिकारी नहीं जानता था। पूछने में उन्हों ने बताया कि यह व्यक्ति आगे जा कर मुख्य मन्त्री बन सकता है। ऐसे व्यक्ति की चमचागिरी करना जो भविष्य में मुख्य मन्त्री बन सकता हो अथवा अन्य महत्वपूर्ण पद धारण कर सकता हो तो उस की प्रशंसा चमचागिरी ही कहलाये गी यद्यपि उस की तुरन्त कोई सम्भावना न हो और भविष्य भी अनिश्चित हो। पर यह इच्छा मुख्य रहती है कि शायद आगे जा कर इस का लाभ हो।


कई विद्वान जैसे प्रख्यात चाटुकार रामनुजचारी इस मत से सहमत नहीं हैं तथा इसे केवल व्यक्ति विशेष यानि चमचे की आदत मानते हैं और इस को चमचागिरी मानने से इंकार करते हैं। उन का कहना है कि उद्देश्य स्पष्ट तथा मन में प्रधान विचार होना चाहिये। उद्देश्यहीन प्रशंसा चमचागिरी नहीं हो सकती है। परन्तु विद्वान चाटुकार रामनुजचारी का यह भी कथन है कि इसे अभ्यास माना जा सकता है बशर्ते कि व्यक्ति को इस का भान हो कि यह अभ्यास है।


चमचागिरी का तीसरा पहलू है - गुणगाण। परिभाषा में हम ने प्रशंसा का अलग बात बताया है किन्तु यह भी कहा है कि चमाचागिरी में सच्चा अथवा झूटा गुणगाण इस का अनिवार्य भाग है।


कई विद्वान यह मानते हैं कि ‘नकल ही सब से बडी चाटुकारिता है’। imitation is the best form of flattery परन्तु इस में दूसरे पहलुओं का अभाव है। एक जिस व्यक्ति की नकल की जा रही है, यदि उसे इस का पता नहीं चलता तो इस को चमचागिरी नहीं कहा जा सकता। चाटुकरित को ज्ञान होना कि उस के किसी गुण को सराहा जा रहा है, चमचागिरी का आवश्यक पहलू है। दूसरे काम निकलवाने की भावना होना चाहिये। यदि नकल केवल अपने मानसिक संतोष के लिये की जा रही है तो इसे चमचागिरी नहीं माना जा सकता। फटी हुई जीन को धारण करना उन अमरीकावासियों की चमचागिरी नहीं कही जा सकती जिन्हों ने यह प्रथा आरम्भ की थी।


यहां पर यह कहना भी उचित हो गा कि कई विद्वान सच्ची प्रशंसा को चमचागिरी नहीं मानते परन्तु जैसा कि हम ने कहा है, काम निकलवाने की इच्छा इस में मुख्य अंग हो गां।


यहां पर यह कहना उचित हो गा कि झूटी प्रशंसा यदि किसी काम को निकलवाने के लिये नहीं की जा रही तो यह परिहास माना जा सकता है। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये। अ्रग्रेज़ी में एक कहावत है damn with faint praise । यह इसी विचार को व्यक्त करती है। यह चमचागिरी का अंग तो है पर सम्पूर्ण नहीं है। it is necessary but not a sufficient condition।


चमचागिरी में भाषा का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। यही सब से कठिन बात है जिस के कारण हर कोई सफल चाटुकार नहीं बन सकता। मार्क टवेन का इस बारे में कहना है the happy phrasing of a compliment is one of the rarest of human gifts, and the happy delivery of it another। प्रशंसा को सही शब्दों में कहना मानव गुणों में दुर्लभ गुण है और इस को व्यक्त करना भी।


कई बार चमचागिरी परोक्ष रूप से भी की जाती हैं। उदाहरण के तौर पर एक प्रसंग है कि राजा विक्रमादितया विद्वान थे तथा विद्वानों का आदर करते थे। उन के पास कुछ व्यक्ति भोजन व्यवस्था के लिये जा रहे थें। उन्हों ने सोचा कि राजा को प्रभावित करने के लिये अपनी इच्छा श्लोक के रूप में व्यक्त की जाये। इस कारण उन व्यक्तियों ने अपनी भावना इन शब्दों में व्यक्त करना चाही

भोजनं देहि राजेन्द्र घृतसूपसमन्वितं

(हे राजों के राजा हमें घृत, सूप युक्त भोजन देने की कृपा करे)

परन्तु उन से पूरा श्लोक बन नहीं पाया। अतः वह कवि कालीदास के पास गये। उन्हों ने श्लोक का दूसरा पद लिखा

माहिषं च शरच्चन्द्रचन्द्रिकाधवलं दधि

(तथा भैंस के दूध का दही जो शरद पूर्णिमा की चांदनी के समान धवल हो)


विक्रमादितया को समझते देर न लगी कि दूसरा पद किस ने लिखा है।


चमचागिरी के परोक्ष रूप के कई अन्य उदाहरण अकबर बीरबल के किस्सों से मिल जायें गे। थाली के बैगुन की बात तो सब को सामान्य रूप से ज्ञात है जिस में वह कहते हैं कि वह बैगुन के गुलाम नहीं हैं। इसी प्रकार एक बार यह पूछने पर कि उन के राज्य में सब से वीर पुरुष कौन है, बीरबल ने किसी का नाम लिया। अकबर अपना नाम सुनना चाहते थे अतः प्रश्न किया कि वह कैसे। बीरबल ने कहा कि बात पुरुष की हो रही थी, किसी अवतार की नहीं, इस कारण उन्हों ने उन का नाम नहीं लिया।


एक बात का ध्यान रखना हो गा। चमचागिरी एक अमोघ वस्त्र है परन्तु प्रशसा करना तथा किसी अनुकम्पा के लिये उसी समय कहना सही नहीं है। मार्क टवेन के कहा है do not offer a compliment and ask a favour at the same time. a compliment that is charged for is not valuable.



प्रशंसा और स्तुति


हम ने प्रशंसा के पूर्णांग होने के बारे में विचार व्यक्त किये है। अब स्तुति के बारे में भी स्थिति स्पष्ट करना उचित हो गा। इस के बारे में विद्वानों के भिन्न भिन्न विचार हैं। यहॉं हम भारत के परिपेक्ष्य में विशेष रूप से विचार करना चाहें गे। भारत में स्तुति गाण प्राचीन समय से प्रचलित हैं जिस के बारे में हम ने पूर्व् में बताया था। इस का विश्लेषण हम प्रशंसा ओर स्तुति के भेद के रूप में करें गे।

ऋगवेद का आरम्भ इस मन्त्र से होता है।

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं रत्वीजम

होतारं रत्नधातमम ।1!

अग्निः पूर्वेभिर्र्षिभिरीड्यो नूतनैरुत

स देवानेह वक्षति !2!

मैं अग्नि की प्रशंसा करता हॅं जो यज्ञ के पुरोहित हैं। और ऋतविज (यजमान) हैं। जो होतारं (आवाहन करने वाले) भी हैं तथा धनधान्य देने वाले भी हैं। यह यज्ञ देवताओं के लिये किया जा रहा है। अग्नि की पूर्व में भी ऋषियों द्वारा प्रशंसा की गई थी तथा अभी भी की जाती है। सभी देवताओं सहित आप इस स्थान में निवास करें।


पाश्चात्य विद्वान इस प्रकार की ऋचाओं को चमचागिरी मानते हैं। उन का मत है कि यह अग्नि की चमचागिरी है और उस से अपेक्षा है कि वह हमारे सारे कार्य पूरे करे गा तथा हमें धन धान्य दे कर अनुग्रहित करे गा। इस के विपरीत भारतीय विद्वानों का कहना है कि यहां अपेक्षा अनुपस्थित है। कुछ चाहा नहीं गया। जब लेने वाला, देने चाला एक ही है तो कौन किस से क्या चाहे गा तथा कौन इंकार करे गा। इस कारण यह स्तुति है। लेने वाला, देने वाला, आवाहन करने वाला, देवता सब एक ही हैं, भिन्न भिन्न नहीं। इसे चमचागिरी कहना अनुचित है। यह रूपष्ट रूप से स्तुति ही है।


यह ध्यान रखने योग्य है कि अग्नि प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है। किन्तु स्तुति के लिये यह भी आवश्यक नहीं है। बाद में जहां प्रत्यक्ष में कोई द्रव्य नहीं था, वहां उस की कल्पना की गई जैसे वर्षा के लिये इन्द्र एवं सागर के लिये वरुण। इन की प्रशंसा में भी ऋचायें तथा मन्त्र दिये गये हैं।


इसी परम्परा को उपनिषदों में भी निभाया गया। ईशावास्य उपनिषद में कहा गया है -

पूशन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्यब्यूह रश्मीन् समूह।

तेजो यचे रूपं कल्याणतमं

तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुष: सोऽहमस्मि।।

तू ही इस विश्व का पोषक और तू ही एक निरीक्षक है। तू नियमनकर्ता और तू ही उत्तम प्रवर्तक कर्ता है। तू सब का प्रजावत पालनकर्ता है। तेरे यह पोषणादि रश्मि खोल कर और एकत्र कर के दिखा। तेरा यह तेजस्वी और परम कल्याणमय रूप में अब देख रहा हूं। वह जो परात्पुर पुरुष है, सो वही मैं हूं।

यहां भी अपेक्षा कुछ नहीं है। अतः यह स्तुति है, चमचागिरी नहीं।


श्रीमद् भगवतगीता में भी कहा गया है -

‘आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं। आप ही सनातन धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी परुष हैं, ऐसा मेरा मत है।


यह सही है कि इन मन्त्रों में भगवान अथवा देवताओं को सम्बोधित किया गया है परन्तु इन में कुछ अपेक्षा नहीं बताई गई है।


यह अवश्य कह सकते हैं कि इन से स्पष्ट है कि स्तुति गान का प्रखर अभ्यास उन को था जिस का उपयोग वह बाद में चमचागिरी में भी कर सके।


यहां पर एक बार फिर प्रशंसा में तथा चाटुकारिता में अन्तर स्पष्ट करना आवश्यक है। दोनों में ही गुणों की प्रशंसा की जाती है परन्तु जहां प्रशंसा वास्तविक गुणों की की जाती है, चाटुकारिता में उन का विद्यमान होना आवश्यक नहीं है। इस भाव को आगे और स्पष्ट किया जाये गा।

चमचागिरी का विकासक्रम


मनुष्य सामाजिक प्राणी है। यद्यपि यह दावा किया जाता है कि सभी मनुष्य बराबर हैं किन्तु समाज में देखने को आता है कि कोई व्यक्ति अन्य पर हावी हो जाता है। वह योजना बनाने में अथवा उस के क्रियान्वयन में अधिक सक्षम रहता है तथा अन्य उस की प्रतिभा को मान्यता प्रदान करते हैं। बरनार्ड शॉ का एक नाटक है ‘दि एडमाईरेबल क्रिकटन’। इस में क्रिकटन एक सम्भ्रान्त परिवार में एक कर्तव्यनिष्ट बटलर है जिसे समाजवाद में कतई विश्वास नहीं है और जो क्रमबद्ध समाज को ही उचित समाज मानता है। एक बार परिवार को एक द्वीप पर शरण लेना पड़ती है जहाॅं इस परिवार के अतिरिक्त और कोई नहीं है। क्रिकटन का जो नेतृत्व का गुण है, उस के कारण वह सही प्रबन्ध करता है। यहाॅं तक कि उस के गुणों से प्रभावित हो कर परिवार के बेटी उस से विवाह का प्रस्ताव तक करती है। कहने का अर्थ यह है कि मनुष्य में व्यक्त अथवा अव्यक्त गुण होते हैं जो उसे नेतृत्व प्रदान करते थे। इसी गुण के चलते कबीले में मुखिया बने। इसी प्रथा से राजा की अवधारणा का जन्म हुआ। राजा को अनेक अधिकार दिये गये जो उस समाज के सफल संचालन के लिये आवश्यक थे। इसी में उस के द्वारा अपने विवेकानुसार पारितोषिक देने का भी अधिकार दिया गया। इसी से चमचागिरी की उत्पत्ति हुई। पुरस्कार सीमित संख्या में थे और दावेदार बहुत अतः इन में चयन करने की प्रकिया में चाटुकारिता का विस्तार हुआ।


यह उल्लेखनीय है कि आपसी होड़ ने साहित्य को अनुपम भेंट दी हैं। कवि भूषण की यह पंक्तियाॅं देखिये

कामिनी कंत सों, जामिनि चंद सों, दामिनी पावस मेघ घटा सों।

कीरति दान सों, सुरति ज्ञान सों, प्रीति बड़ी सन्मान-महा सौं।।

‘भूषण’ भूषण सों तरुनि, नलिनी नव पूषण देव - प्रभा सों।

जाहिर चारिहूॅं और जहान लसै हिंदुवान खुमान सिवा सौं।।


इन पंक्तियों में जो विवरण दिया गया है वह कवि की कल्पना की उड़ान को बताता है। साथ ही वह अपने इष्ट को रिजाने का भी प्रयास है। यह उच्च कोटि की चमचागिरी कही जा सकती हैं।


प्रजातन्त्र में मीडिया का विशेष महत्व है। इसे कभी प्रजातन्त्र का चौथा सतम्भ कहा जाता है तो कभी जनता की आवाज़। परन्तु आम तौर पर इस का प्रयोग जनता की राय बनाने के लिये किया जाता है। इस कारण राजनैतिज्ञ मीडिया की चमचागिरी करने के लिये लालायित रहते हैं। कभी उन्हें प्रजातन्त्र का सजग पहरी बताया जाता हे तो कभी भविष्य का निर्माता।


हम ने मीडिया के दो तरफा चमचागिरी का संकेत पूर्व में दिया था। इस के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं।


प्रधान मन्त्री द्वारा मीडिया दिवस के उपलक्ष में मीडिया को इन शब्दों में महत्वपूर्ण बताया गया है। ‘‘उन के पास समाज को सन्देश देने की शक्ति है, उन के पास इस के लिये उचित संसाधन हैं तथा उन की प्रजातन्त्र को सुदृढ़ करने का इरादा है। एक शक्तिशाली मीडिया की अनुपस्थिति में प्रजातन्त्र का विकास असम्भव है''।


अपने पक्ष में करने के लिये कई प्रकार के वायदे किये जाते हैं जैसे कि सत्ताधारी दल से बचाने के लिये कांग्रैस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा है कि ''सूचना प्रदाय, कानून एवं शांति व्यवस्था एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में उचित व्यवस्था देखते हुये मीडिया को स्वयं अपने मापदण्ड तय करने का अधिकार देने के लिये कानून बनाया जाये गा''।


दूसरी ओर यह भी कहा गया है कि भारत में अन्य देशों की भांति एकाधिकार की प्रवृति मीडिया में बढ़ती जा रही है। केवल बाज़ार में अपना अंशदान बढ़ाने की लालसा उन्हें राजनैतिज्ञों तथा शासन के कहे अनुसार अपनी नीतियों का निर्धारण करना पड़ता है तथा सत्ताधीन व्यक्तियों की बिना वजह प्रशंसा करना पड़ती है (अर्थात चमचागिरी करनी पड़ती है) जिस के फलस्वरूप वह अधिक विज्ञापन प्राप्त कर सकते हैं तथा अन्य सुविधायें प्राप्त कर सकते हैं।


अपने पक्ष में मीडिया को करने के लिये अनेक प्रकार के प्रलोभन दिये जाते हैं जो चमचागिरी के ही प्रमाण हैं। विज्ञापन इस का मुख्य साधन है परन्तु अधिक कारगर शासकीस आवास आबंटित करना तथा सस्ते भूखण्ड देना है। यह भूखण्ड आवास के लिये भी दिये जाते हैं। भोपाल में एक पूरी कालोनी ही पत्रकार कालोनी के नाम से विख्यात है। यहॉं पर मुख्य मन्त्री तथा मंत्रियों द्वारा पत्रकार वार्ता के अन्त में मनहरण भोज देने को भी इंगित किया जा सकता है।



मनोविज्ञान और चमचागिरी


इस अध्ययन में कमी रह जाये गी यदि हम चाटुकरित के भावों का वर्णन न करें। जैसा कि पूर्व में भी कहा गया है, सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति में अपनी अहमियत का भाव रहता है। सामाजिक कृत्यों में उस की सामान्य अभिलाषा होती है कि दूसरे व्यक्ति उस की विशिष्टता तथा विलक्षणता को पहचानें। परन्तु समाज के कायदे कानून के कारण वह इस भावना को व्यक्त नहीं कर सकता। बल्कि इस का सामना होने से वह सकुचाता है। वह नहीं चाहता कि अन्य जन इस इच्छा से अवगत हों। इसी कारण कोई भी व्यक्ति अपने को चाटुकरित कहलाना पसन्द नहीं करता। उस का अहं भाव इस की अनुमति नहीं देता। इसी कारण किसी भी भाषा में इस के लिये अलग से कोई शब्द नहीं मिले गा। कृत्रिम रूप से सिंजजमतल से सिंजजमतमक शब्द बनाया गया है जबकि दूसरी ओर ेलबवचींदजए संबामलए जवंकल जैसे सिंजजमतमत के समानार्थक शब्द मिल जायें गे। उर्दू अथवा हिन्दी की भी यही स्थिति है जिन के बारे में पूर्व में लिखा गया है।


चाटुकारिता को ज़ाहिरन तौर पर नापसन्द किये जाने के कई उदाहरण मिल जाये गे परन्तु इसे पसन्द करने के भी परोक्ष प्रमाण उपलब्ध है। इंगलैण्ड में एक परम्परा थी कि राजा द्वारा अपने चाटुकार मुसाहिबों को उन के स्तर को देखते हुये मान दिया जाता था।

यह पुरस्कार निम्नानुसार क्रम से होते थे (अनुवाद अस्पष्ट हो सकता है)


1.

Companion of Honour

सम्मान के सहचर

2.

Knight or Dame

नाईट

3.

Commander of the Order of the British Empire ( CBE )

ब्रिटिश साम्राजय के आडर्र के कमाण्डर

4.

Officer of the Order of the British Empire

ब्रिटिश lkezkT; के आडर्र के अधिकरी

5.

Member of the Order of the British Empire ( MBE )

ब्रिटिश साम्राजय के आडर्र के सदस्य

6.

British Empire Medal (BEM)

ब्रिटिश सामाज्य मैडल

7.

Royal Victorian Order (RVO)

रायल विक्टोरियन आर्डर



इसी प्रकार भारत में राय साहब, रायबहादुर, खान बहादुर, दीवान साहब के खिताब थे जो चाटुकारों को दिये जाते थे। आम तौर पर सामान्य नागरिक तथा स्वतन्त्रता संग्राम वालों का उन के लिये एक आम नाम टोडी बच्चा था।


चाटुकारिता में ब्रिटिश लोग पारंगत थे। भारत में स्वतन्त्रता के समय 565 राज्य थे जो नाम के लिये स्वतन्त्र थे। इन के शासकों को संतुष्ठ रखने के लिये उन्हें टाईटल दिये जाते थे। जिस के पास जितने टाईटल होते थे, वह उतना महान समझा जाता था या यूं कहें कि वे अपने को उतना महान समझते थे। उदाहरण के लिये हैद्राबाद के निज़ाम के पूरे टाईटल थे


General His Exalted Highness Rustam-i-Dauran, Arustu-i-Zaman, Wal Mamaluk, Asaf Jah VII, Muzaffar ul-Mamaluk, Nizam ul-Mulk, Nizam ud-Daula, Nawab Mir Sir Osman ‘Ali Khan Siddqi Bahadur, Sipah Salar, Fath Jang, GCSI, GBE.


यह टाईअल वास्तव में चाटुकारिता का ही वैकल्पिक रूप है।


वैसे राजा अपने टाईटल स्वयं भी निधारित कर लेते थे। जैसे कि औरंगज़ेब का पूरा नाम था -

Al-Sultan al-Azam wal Khaqan al-Mukarram Hazrat Abul Muzaffar Muhy-ud-Din Muhammad Aurangzeb Bahadur Alamgir I, Badshah Ghazi, Shahanshah-e-Sultanat-ul-Hindiya Wal Mughaliya.

अल सुलतान अल आज़म वल काखन अल मुकर्रम हज़रत अब्दुल मुज़फ्फर मुहुद्दीन मोहम्मद औरंगज़ेब बहादुर आलमगीर, बादशाह गाजी,शहंशाह—उल—हिन्दिया—वल मुगलिया



सफल चमचागिरी के गुर


चाटुकारिता में कुछ बातें ध्यान रखने येाग्य हैं तभी व्यक्ति सफल चाटुकार बन सकता है। चाटुकारिता करते समय चाटुकरित का जीवन पद्धति का अध्ययन करना आवश्यक है। उस का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ही इस की सफलता का राज़ है। इस में निम्न बातें शामिल हैं –


1. अवसर - स्पष्टतः ही सफलता का राज़ समय के मुताबिक चाटुकारिता है। बे मौके की प्रशंसा (भले ही वह वास्तविक गुणों