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चन्द इश्हार — नारंग — 1956

  • kewal sethi
  • Jul 30, 2025
  • 1 min read

उठती है उमंग दिल बन के मौज दरया ज़ेर तुग़यानी

दिल शाद है हो जाएगी ज़रखेज़ दिल की ज़मीं वीरानी

कुछ तो यकीं होता हे गिरधर कि मिल जाएगा यारे दिल

हाँ गर आ जाये, ऐसी एक को पुरज़ोर तुग़यानी।


इश्क की नोखीली धार से कुछ कुछ घायल हम भी है।

नादाँ, अनजान, सहमे हुये मगर तलबगार तो हम भी है।

गुमराई की ज़द में है, शक नहीं, मगर राही तो हम भी है।

जाम पकड़ना नहीं आता मगर पीने के शायक तो हम भी है।


खामोश दिल में उमड़ता है ख्यालों का दरया कई बार।

हौसला पड़ता नहीं गिरधर इस में ग़ोता खाने का।

मिल जाये अगर रहबर कोई पहुॅंच जाऊं उस दरिया दिल के पास।

फिर लहरों से खेलूँ या गोते खाउॅं उस में नहीं है कुछ ​बिगड़े की बात।


हाँ, याद है, खूब वायदा किया था।

और उससे भी वैसा ही वायदा किया था।

वो तो अब भी खड़ा है वायदा निभाने को तैयार।

मगर इधर भी तो उतरे दुनियावी नशे का खुमार


वो वायदा किया था न समझने का न समझाने का।

वो तो एक याद है जो अगर आ जाए याद।

तो फिर बस कोई काम नहीं रोने के चिल्लाने के सिवा।

वह हर शै में दिख पड़ता है गिरधर मिलने को तैयार?


नींद आती नहीं इश्क के दीवाने को

वह तो तैयार हैं ख्वाबों में आने को


गिरधारी लाल नारंग — 1956

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