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गुरु क्यों आवश्यक है

गुरु क्यों आवश्यक है


गुरूर्बह्राा गुरूर्विष्णु: गुरूर्देव महेश्वर:।

गुरूरेव परब्रह्रा तस्मै श्री गुरुवे नम:।।

इस में गुरू की महिमा का वर्णन किया गया है। वास्तव में गुरू के बारे में इतना कुछ कहा गया है कि उस पर लिखा जाये तो कई ग्रंथ भर जायें। कबीर जी ने कहा ही है।

सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय

सात समुन्द की मसि करूँ, गुरू गुन लिखा न जाये

पर प्रश्न उठता है कि क्या आज के युग में भी गुरू की उतनी ही महिमा है। जिस काल में पुस्तकें नहीं थी या बहुत कम थीं और ज्ञान केवल गुरू के पास ही जा कर अर्जित किया जा सकता था, उस काल में तो गुरू की महिमा समझ में आती है। आज तो ज्ञान को प्राप्त करने के लिये कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। पुस्तकें उपलब्ध हैं। रेडिओ उपलब्ध है। दूरदर्शन उपलब्ध है। अब इण्टरनैट भी उपलब्ध है। यह सब तो सिखाने के लिये काफी हैं। यदि किसी शब्द का अर्थ या तात्पर्य समझ में न आये तो किसी ज्ञानवान से टैलीफोन पर या उस के पास जा कर पूछा जा सकता है। कभी कभी कुछ अधिक समय भी उन के पास लगाया जा सकता है। फिर गुरू की महिमा आज के युग में इतनी क्यों।

योग, सांख्य तथा अन्य दर्शनों में प्रकृति से जगत की उत्पत्ति बताई गई है। इस के अनुसार प्रकृति से सर्व प्रथम महत का उद्भव होता है। महत से अहंकार का उद्भव होता है। और अहं से मनस, इन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, तन्मात्रा तथा उस से महाभूत उत्पन्न होते हैं। मोक्ष की प्राप्ति के लिये वापस जाना होता है। मन तथा इन्द्रियों को वश में करना होता है। पंचभूत से नाता तोड़ना होता है।

अंत में अहं से भी पार जाना होता है। यही सब से कठिन है। इसी में गुरू सहायक होता है। कोई तो है जो हम से भी आगे है। जो हम को राह दिखा सकता है। जब यह भावना होगी तभी अहं समाप्त होगा। इस के बिना ज्ञान चाहे कितना ही न बढ़ जाये, अहं के पार नहीं जा सकते।

प्रश्न यह है कि क्या और कोई रास्ता नहीं है जिस से अहं के पार जा सकें। भक्ति मार्ग को भी इस के लिये उचित साधन माना गया है। जब मनुष्य अपने आप को ईश भक्ति में खो देता है तो अहं समाप्त हो जाता है। ब्रह्रा से एकाकार हुआ जा सकता है। पर श्री गीता में कहा गया है।

क्लेशोऽधिकतरस्तेषां अव्यक्तामक्तचेतसाम।

अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवभ्दरिवाप्यते।।

''अव्यक्त में चित्त की एकाग्रता करने वाले को बहुत कष्ट होते हैं; क्योंकि इस अव्यक्त गति को पाना देहेन्द्रियधारी मनुष्य के लिये स्वभावत: कष्टदायक है।

इसी कारण व्यक्त की उपासना अधिक सहज ढंग से की जा सकती है। किसी को ब्रह्रा के प्रतिबिम्ब के रूप में मानना लगभग अनिवार्य हो जाता है। यह किसी मूर्ति के रूप में भी हो सकता है। किसी गुरू के रूप में, शब्द के रूप में या अन्य किसी प्रतीक के रूप में। पर गुरू के प्रति इसे अधिक सुविधा से व्यक्त किया जा सकता है क्योंकि उस से वार्तालाप किया किया जा सकता है। इसी कारण गुरू का महत्व है और उसे ईश्वर के ही समकक्ष माना गया है। तभी तो गुरू रामदास जी ने कहा

समुंदु विरोलि सरीरु हम देखिया,

इक वस्तु अनूप दिखाई।

और नानक जी ने कहा

गुरु गोविन्द गोविन्द गुरु है,

नानक भेद न भाई।।

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