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गरीबी के विरुद्ध संघर्श तथा विश्व व्यवस्था

Updated: Aug 12, 2020

गरीबी के विरुद्ध संघर्श तथा विश्व व्यवस्था

ऐत्हासिक परिपेक्ष्य में


केवल कृष्ण सेठी


1. पृष्ठभूमि


विश्व के अधिकतर लोग गरीब हैं तथा इन में से अधिकतर तीसरे विश्व में रहते हैं। तीसरे विश्व में अधिकतर देश एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण अमरीका के हैं। तीसरा विश्व इन्हें क्यों कहा जाता है, स्पष्ट नहीं है। पर इस नाम से ही हम इन के बारे में चर्चा करें गे। इस के अतिरिक्त इन्हें गरीब देश अथवा पिछड़े देश भी कहा जाता है क्योंकि इन का जीवन स्तर विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। जो इन्हें इस नाम से नहीं पुकारना चाहते, वे सम्मान देने की दृष्टि से इन्हें विकासशील देश कहते हैं। यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि इस लेख में यह चारों नाम समानार्थी शब्दों के रूप में प्रयुक्त हैं। इन्हें अविकसित देश भी कहा जा सकता है तथा कुछ इन के भी दो वर्ग मानते हैं जिन में कुछ देशों को न्यूनतम विकसित देश कहा गया है। इस लेख में हम ने यह नाम नहीं रखा है तथा इस प्रकार का भेद नहीं रखा है। और यह आवश्यक भी नहीं है।


इन देशों में से अधिकाँश की नियति न्यूनाधिक कुपोषण तथा उचित निवास एवं परिधान के अभाव की है। बीमारी उन का भाग्य है। अल्प आयु की अपेक्षा भी इन देशों में रहती है। इस लेख में हम इस बात पर विचार कर रहे हैं कि इस असमानता के पीछे क्या कारण हैं। एक अवधारणा है कि यह सब इस कारण है कि वे अपनी परम्परागत व्यवस्था को बदलने को तैयार नहीं हैं। यदि वे विकसित देशों की संस्कृति तथा तरीके अपना लें तो वह विकसित हो सकते हैं। थोड़े ध्यान से देखने से पता चले गा कि यह बात सही नहीं है। वास्तव में स्थिति इस के उलट है। पुरानी परम्परायें कहीं भी नहीं रह पाई हैं। जो बदलना नहीं चाहते, उन्हें भी मजबूरी में बदलना पड़ रहा है। यही उन की गरीबी का एक बड़ा कारण है। नये विचारों के अनुसार उन में शिक्षा का प्रसार हो रहा है। मृत्यु दर कम हो रही है। नगरीयकरण में वृद्धि हो रही है। परिवर्तन हो रहा है किन्तु इस से उन्हें कोई लाभ नहीं हो रहा या यह कहें कि वहाँ के कुछ ही लोगों को उस से लाभ हो रहा है। शेष की स्थिति पहले से अधिक भयावह हो रही है। यह सही है कि सभी देशों की स्थिति एक जैसी नहीं है। स्थिति कुछ देशों के लिये कम तथा कुछ देशों के लिये अधिक चिन्ताजनक है पर है यह सब के साथ ही। एशिया के कुछ देश - दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, ताईवान काफी बदल गये हैं पर यह अपवाद हैं।


गरीबी के बारे में बात करें तो यह देखा जाये गा कि उन्नीसवीं शताब्दि के आरम्भ तक विश्व के सभी देशों में गरीबी की स्थिति थी। कुछ सामन्तवादियों को छोड़ कर शेष का जीवन यापन कठिनाई से ही होता था। यद्यपि पश्चिम में औद्योगिक क्राँति का आरम्भ अठारहवीं शताब्दि के अन्त से माना जाता है पर इस का प्रभाव आम आदमी के जीवन स्तर को ऊपर उठाने का नहीं था। बीमारी, अकाल मृत्यु से उन्हें दो चार होना पड़ता था। इंगलैण्ड में 1871 में औसत आयु 38.17 वर्ष थी। 1850 - 59 की अवधि में फ्रांस में यह 39.8 वर्ष थी। शिशु मृत्यु दर (एक वर्ष से कम आयु में मरने वाले बच्चे प्रति हज़ार) फ्रांस में 27.3 तथा इंगलैण्ड में 16.5 था। यह माना जाता है कि इंगलैण्ड के आँकड़े सही नहीं हैं क्योंकि कई शिशुओं की मृत्यु की सूचना नहीं दी जाती थी। वास्तव में इन देशों में भी स्वास्थ्य में सुधार औद्योगिक क्राँति के कारण नहीं वरन् चिकित्सा क्षेत्र में नई खोज के कारण आया। बीमारी के किटाणुओं का पता चलने तथा पैंसलीन तथा इस प्रकार की दवाईयों के कारण शिशु मृत्यु दर में कमी आई। तकनालोजी में इस प्रगति का प्रभाव अन्य गैर युरोपीय देशों में इतना नही हो पाया है। पर यह विचार करने की बात है कि तृतीय विश्व के देशों में स्वतन्त्रता के बाद मत्यु दर में कमी आई है तथा आयु अपेक्षा बढ़ी है। 1980 के दशक के अन्त में क्यूबा तथा संयुक्त राज्य अमरीका में शिशु मृत्यु दर 0.7 प्रतिशत ही है यद्यपि उन के जीवन स्तर में काफी अन्तर है।


तृतीय विश्व के देशों में इस प्रकार का सुधार क्यों नहीं आ पाया, इस पर विचार किया जाना आवश्यक है। बीसवीं शताब्दि के प्रारम्भ में तृतीय विश्व के अधिकतर देश पश्चिमी देशों के उपनिवेश थे या फिर उन के द्वारा परोक्ष रूप से नियन्त्रित थे। द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के पश्चात बीसवीं शताब्दि के मध्य में इस स्थिति में तेज़ी से परिवर्तन आया तथा इन में से अधिकतर देशों को स्वतन्त्रता मिली। इस से पूर्व कई देशों में लम्बे समय तक तथा कई में कुछ कम समय स्वतन्त्रता के लिये अन्दोलन चला। उस समय की विचारधारा थी कि परतन्त्रता के कारण इन देशों की सम्पत्ति बाहर चली जाती है तथा स्वतन्त्रता के साथ ही खुशहाली का दौर तो आये गा ही। स्वतन्त्रता संग्राम के नेताओं ने भी इस का आश्वासन दिया था। नये नेता - नेहरू, एनक्रूमा, सुकारनो तथा अन्य ने कहा कि स्वतन्त्रता मिलने के साथ ही देश शीघ्र ही उन्नति के पथ पर हों गे तथा जीवन स्तर में सुधार आये गा। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं।


द्वितीय महायुद्ध के कारण अमरीका न केवल दूसरे देशों की तुलना में कम प्रभावित हुआ बल्कि उस के उत्पादन में वृद्धि हुई। स्वाभाविक था कि वह विश्व के देशों का अग्रणी बनता। युरोप के देशों की सहायता करने के लिये उस ने मार्शल प्लान के नाम से योजनाा आरम्भ की। अमरीकी निवेश इन देशों में किया गया तथा अन्य प्रकार से भी इन की सहायता की गई। इस के फलस्वरूप युरोप के देशों को सम्भलने का अवसर मिला। अमरीका ने अन्य देशों को भी भरपूर सहायता करने का वचन दिया। उस ने तथा युरोप के देशों ने अपने को उन के विकास के प्रति समर्पित बताया। परन्तु वास्तव में बहुत कम सहायता इन देशों तक पहुँच पाई। कैनेडी ने राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले भाषण में कहा कि सभी देशों की सहायता की जाये गी। पर वस्तुतः स्थिति वही की वही रहीं। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात संसार के काफी देश दो धड़ों में बट गये - पूँजीवादी अमरीका के नेतृत्व वाले तथा सोवियत यूनियन के नेतृत्व वाले। इन धड़ों के बाहर के देश तृतीय विश्व के नाम से पुकारे गये। इन देशों को दोनों धड़ों का सहायता करने का वचन था पर शब्द शब्द ही रहे, क्रिया में परिवर्तित न हो पाये। विश्व बैंक इत्यादि कई संगठन बनाये गये। परन्तु न केवल अमीर तथा गरीब देशों में फासला कम नहीं हो सका वरन् यह बढ़ रहा है।


युरोप, अमरीका, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड तथा जापान में गत कुछ दशकों में जीवन स्तर अविश्वसनीय रूप से बढ़ा है। इन देशों में भी कुछ लोग गरीबी के शिकार हैं किन्तु अधिकतर लोागो का जीवन सुखमय हो रहा है। गरीबी पर यह विजय उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी की देन है। वायदा तो था कि यह स्मृद्धि पूरे विश्व में फैल जाये गी पर ऐसा हो नहीं पाया। संसार के 15 प्रतिशत लोग ही उस जीवन स्तर पर हैं जिन की अन्य लोग कल्पना भी नहीं कर पाते।


तीसरे विश्व की समस्यायें केवल आर्थिक ही नहीं है। यह सामाजिक तथा राजनैतिक भी है। उपनिवेशवादियों ने अपनी प्रशासनिक सुविधा के अनुरूप तथाकथित राष्ट्र-देश स्थापित किये। इन में रहने वाले समूहों में वह साम॰जस्य स्थापित नहीं हो पाया जो किसी देश में एकता बनाये रखने के लिये आवश्यक है। इस का एक कारण यह था कि जो नई शासन प्रणाली लागू की गई, जो शिक्षा के तरीके अपनाये गये, वह वहाँ की संस्कृति से जनित नहीं थे वरन् उपनिवेशवायिों ने अपने सिद्धाँत उन पर लागू कर दिये। फलस्वरूप पुरानी संस्कृति की जो अच्छी बातें थीं वह भी समाप्त हो रही हैं। भौतिकवाद पनप रहा है। परन्तु जो आपसी वैमन्यस्यता थी, उस में कमी नहीं आ पाई है क्योंकि कई देश इस प्रकार के बन गये कि उन में परस्पर विरोधी कबीले रह रहे थे। उपनिवेशवाद ने दोनों को परेशान कर रखा था पर यह एकता वे स्वतन्त्रता के पश्चात स्थापित नहीं रख पाये। उन के आपसी गृह युद्ध का परिणाम यह हुआ कि लाखों लोग इण्डोनेशिया, कांगो, र-वांडा, वियतनाम, कम्पूचिया तथा अन्यत्र मारे गये हैं। इन देशों के नागरिकों से भौतिक सुविधायें, प्रजातन्त्र, मानव अधिकार, आत्म सम्मान तथा आत्म गौरव अभी पहले जितने ही दूर हैं। दूसरी ओर अमीर देश भी सहायता करने के वायदों से भूल नहीं गये तो काफी दूर हो चुके हैं।


तृतीय विश्व में कई प्रजातियाँ, कई धर्म, कई संस्कृतियाँ, कई परम्परायें हैं किन्तु एक बात समान है - वह है उन की गरीबी जो उन्हें विकसित देशों से अलग करती है। यह नहीं कि इन देशों में सभी गरीब होते हैं। मध्यम वर्ग भी कहीं कम कहीं अधिक है तथा कुछ ऐसे भी हैं जो ऐशो आराम का जीवन बिताते हैं। परन्तु इन देशों का बहुमत गरीबी से जूझ रहा होता है। गरीबी की औपचारिक परिभाषा कठिन है तथा गरीब तथा लगभग गरीब, इन में अन्तर करना कठिन कार्य है। गरीब लोगों में से लगभग 70 प्रतिशत एशिया के हैं। तीन चैथाई से अधिक ग्रामों में रहते हैं। यू एन डी पी के अनुसार विश्व में लगभग 120 करोड़ लोगों की आय एक डालर प्रति दिन से कम है तथा यह आँकड़े 1990 से अभी तक बदले नहीं हैं। आय के अतिरिक्त अन्य मापदण्ड हैं - जीवन की औसत अपेक्षा, प्रौढ़ निरक्षरता, कुपोषित बच्चे, छोटे आवास, बाल श्रमिक, खाघान्न की कमी, पेय जल का अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं क्रा अभाव तथा सफाई का अभाव।


गरीबी के उपरोक्त मापदण्डों में से कुछ में विभिन्न देशों की स्थिति इस प्रकार है -

कुल संख्या का प्रतिशत

देश आय एक डालर अपेक्षित आयु प्रौढ़ निरक्षरता 5 वर्ष से कम आयु वाले

दैनिक से कम 40 वर्ष से कम कुपोषित बच्चे

इण्डोनेशिया 8 13 13 26

केन्या 27 35 18 23

ग्वाटेमाला 10 16 31 24

घाना 45 27 29 25

चीन 19 8 16 10

नाईजीरिया 70 34 36 27

नेपाल 38 23 58 47

पाकिस्तान 31 20 57 38

बंगला देश 29 21 59 48

भारत 44 17 43 47

मैक्सीको 16 8 9 8

पेरू 16 12 10 8

सेनेगल 26 29 63 18

श्री लंका 7 6 8 33

टयूनेशिया 2 8 29 4

वेनेज़ुएला 23 7 7 5

ज़िम्बाबवे 36 52 11 13



वैसे तो गरीबी एक तुलनात्मक वस्तु है। अमरीका में 12000 डालर वार्षिक आय वाला व्यक्ति गरीब माना जाये गा पर उसी आय वाला व्यक्ति भारत में बहुत अमीर मगना जाये गा। अतः हम केवल औसत आय की बात ही करें गे। सब से अधिक औसत वार्षिक आय स्विटज़िरलैण्ड में 36,970 डालर वर्ष 2001 में थी। 49 देशों में जहाँ आधे से अधिक लोग रहते हैं, यह 430 डालर से कम थी। परन्तु यह पूरी तस्वीर नहीं है। मुद्रा की क्रय शक्ति की भी तुलना की जाना चाहिये। दिल्ली में एक डालर में जितना चावल आ जाये गा, उस से करीब चैथाई ही अमरीका में आ पाये गा। पर इस के बावजूद भी अन्तर काफी अधिक है।


एक बात जो सभी देशों के गरीबों में समान है, वह असुरक्षा की भावना है। जब वर्षा अच्छी होती है, फसल ठीक होती है तो घर की मरम्मत भी की जा सकती है, त्योहार भी मनाये जा सकते हैं, पर जब समय खराब होता है तो सब कुछ समाप्त हो जाता है। वर्षा की कमी, बाढ़, कोई अन्य प्राकृतिक आपदा के पश्चात जीवन यापन का कोई साधन नहीं है।


यह कहना सही नहीं है कि गरीबी का यह जीवन इन देशों का परम्परागत जीवन है। परम्पारिक संस्कृति फलती फूलती है तथा यह जीवन से अधिक निकट होती है। हमारे धर्म - हिन्दु, बौद्ध, जैन, इस्लाम, ईसाई - गरीबी का पक्ष नहीं लेते हैं। गरीबी परम्परा नहीं है न ही कम उत्पादकता। पुराने समय में जीवन केे मूल्य आज के मूल्यों से अलग थे पर वे गरीबी को उचित मानते थे तथा लोगों को उस से बाहर आने के लिये नहीं कहते थे, यह मानना कठिन है। नगरों में जो गन्दी बस्तियाँ बनी हैं, वह परम्पारिक नहीं हैं। वे तथाकथित प्रगति की देन हैं। तम्बाकू, कोको, केला, चाय, कपास, रबड़, गन्ने के खेतों के मज़दूर परम्परारिक नहीं हैं। वह पिछली दो शताब्दियों की देन हैं तथा उन की वर्तमान स्थिति का दोष आज के अमीर देशों का है।


प्राचीन समय में लोग जैसे भी थे, वह अधिकतर अपने जैसे लोगों के बीच में थे अतः वह उतने असंतुष्ट नहीं थे जितने आज हैं। हर देश में अमीर गरीब में अन्तर रहा है पर अध्ययन बताते हैं कि अधिक गरीब देशों में यह अन्तर कम होता है। जैसे ही देश की सकल आय बढ़ती है, विभिन्न वर्गों की आय में अन्तर भी अधिक हो जाता है। फिर एक अवसर आता है जब यह फिर कम होना आरम्भ हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने मानव विकास के लिये एक तालिका बनाई है जिस में सामान्य सेवाओं - शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल प्रदाय इत्यादि के बारे में भी देखा गया है। निष्कर्ष यह है कि कई गरीब देश इस मामले में अघिक सम्पन्न देशों से आगे हैं।


गरीबी के मामले में पुरुषों तथा स्त्रियों में भी काफी अन्तर है। इस का पहला कारण तो यह है कि एक समान कार्य में दोनों की मज़दूरी अलग अलग है। शिक्षा तथा अन्य सुविधाओं में वह पीछे रहती हैं। उन्हें बाहर के काम के अतिरिक्त घर का काम भी करना पड़ता है। कुपोषण के मामले में भी लडकों तथा लडकियों में अन्तर देखा जा सकता है।


उपरोक्त बातों से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिये कि कम विकसित देशों में कोई प्रगति नहीं हो रही है। यह अलब बात है कि जनसंख्या में वृद्धि के कारण उस का उतना परिणाम परिलक्षित नहीं होता है। कुछ परिक्षेत्रों की प्रगति के आँकड़े इस प्रकार हैं -


परिक्षैत्र उत्पादन में वृद्धि जनसंख्या में वृद्धि आय प्रति व्यक्ति में वृद्धि

युरोप 3.3 1.5 1.9

अफ्रीका दक्षिणी भाग -0.9 0.2 -1.1

पश्चिम एशिया 1.7 2.1 —0.4

उत्तरी अफ्रीका 3.0 2.1 0.9

दक्षिण अमरीका 3.1 1.6 1.5

दक्षिण एशिया 5.5 1.9 3.6

पूर्वी एशिया 7.5 1.2 6.3

विकसित देश 2.5 0.7 3.9


सिवाये अफ्रीका के दक्षिणी भाग तथा पश्चिम एशिया के प्रगति दर सब की लगभग बराबर है पर जनसंख्या वृद्धि इस को कम कर देती है। जनसंख्या वृद्धि स्वयं गरीबी का एक विवश्ता है। अफ्रीका के दक्षिण भाग में तथा पश्चिम एशिया में तो यह प्रगति को ऋणात्मक कर देती है। दूसरी ओर अमीर तथा गरीब देशों में के बीच की दूरी बढ़ रही है।


यहाॅं पर इस बात पर भी विचार करना हो गा कि गरीबी उन्मूलन के लिये प्रचार तो किया जा रहा है पर वस्तुस्थिति कुछ और ही बताती है। विश्व बेंक द्वारा 1.25 डालर से कम में जीवन यापन करने वालों सम्बन्धी नीचे की तालिका में 1980 सं 2005 तक का तुलनात्मक आॅंकड़े दिये गये हैं। यह बताते हैं कि सिवाय पूर्व एशिया/ प्रशान्त महासागर क्षेत्र के सभी स्थानों में गरीबी की प्रतिशतता बढ़ी है।


क्षेत्र 1981 1984 1987 1990 1993 1996 1999 2002 2005

पूर्व एशिया/

प्रशान्त महासागरीय 56.50 52.39 47.81 48.16 47.09 37.57 37.44 31.61 22.97

पूर्व युरोप एव्ं

मध्य एशिया 0.37 0.32 0.28 0.5 1.12 1.32 1.43 1.35 1.26

लातीनी अमेरिका/

कैरीबियन 2.21 2.89 3.04 2.37 2.33 3.15 3.23 3.64 3.35

मध्य एशिया एवं

उत्तर अफ्रीका 0.72 0.64 0.69 0.53 0.55 0.64 0.68 0.64 0.80

दक्षिण एशिया 28.91 30.28 33.09 31.94 31.17 35.89 34.72 38.42 43.26

सहरा से नीचे स्थित

अफ्रीका 11.27 13.48 15.09 16.49 17.74 21.43 22.50 24.33 28.37


कुल संख्या (करोड़) 189.6 180.8 172.0 181.3 179.5 165.6 169.6 160.3 137.7


प्रश्न यह है कि अमीर देशों का इस बारे में क्या दायित्व है। इस के दो पक्ष हैं - एक यह कि इस स्थिति के लिये वे कितने ज़िम्मेदार हैं। दूसरे वे इस स्थिति से उभरने के लिये क्या कर सकते हैं। यह ज़िम्मेदारी मानवता की पहचान है परन्तु इस में उन की अपनी आगे की प्रगति भी निहित है। पर कुछ एक अपवाद छोड़ कर इस ज़िम्मेदारी को निभाया नहीं गया है। इस बात के प्रमाण के लिये अधिक परिश्रम की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह स्वयं स्पष्ट है। संयुक्त राष्ट्र ने अस्सी की दशक में संकल्प पारित किया था कि अमीर देशों को अपनी आय का 0.7 प्रतिशत राशि पिछड़े देशों को सहायता के लिये देना चाहिये। परन्तु इंगलैण्ड के लिये यह आँकड़ा 0.32 प्रतिशत है तथा संयुक्त राज्य अमरीका के लिये 0.10 ही है। पर दूसरी ओर इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि अमीर देशों की सहायता गरीबी की समस्या का एक मात्र समाधान नहीं हैं। इस के लिये पिछड़े देशों को स्वयं ही प्रयास करना हों गे।


क्षमाप्रार्थी हूॅं कि यह लेख काफी समय से विचाराधीन था इस कारण कुछ तथ्य आज की स्थिति से मेल नहीं खाते हों गे। हर देश गरीबी के विरुद्ध संघर्ष् कर रहा है। और इस में आशिंक रूप से सफल भी हुए हैं पर

ऐसी कुछ बात है कि गरीबी मिटती नहीं हमारी

वर्षों की मेहनत रंग लाती है आहिस्ता आहित्सा


3. पिछड़ेपन के कारण


पिछड़ेपन के कारण क्या हैं, इस को समझने का प्रयास कई लोगों ने किया है। यह अध्ययेता दो वर्गों में बाँटे जा सकते हैं जिन्हें हम आधुनिकता विचार तथा निर्भरता विचार वाले कहें गे। कभी कभी कुछ अध्ययेता अपने को माकर्सवादी भी कहते हैं परन्तु वास्तव में वे केवल निर्भरता वर्ग के ही प्रणेता हैं। केवल कुछ विवरण में वे अलग हैं जिस के बारे में हम आगे बात करें गे।


आधुनिकता वर्ग वालों का कथन है कि गरीब देश ही अपनी दशा के लिये ज़िम्मेदार हैं तथा उन्हें ही अपने को बदलना हो गा। उन का विचार है कि विकासशील देशों के लोग परम्परागत विचारधारा में लिप्त हैं तथा उन्हें अपनी परम्पराओं को छोड़ कर युरोप के देशों की तरह ही आगे आना हो गा। उन के विचार में पुरानी परम्परा में गरीबी को प्रधान स्थान दिया गया था तथा उस में व्यक्ति के आगे बढ़ने की गुँजाईश नहीं थी। परिवर्तन को महत्व नहीं दिया जाता था तथा वे अपने पूर्वजों का ही अनुकरण करना चाहते हैं। उन का कर्म अपने लाभ के लिये न हो कर केवल कर्तव्य निभाने के लिये होता है। इस में व्यक्ति, परिवार, समाज तथा विश्व के बीच कोई संघर्ष की स्थिति नहीं होती है तथा न ही अलगावपन होता है। सम्पत्ति संग्रह को कोई महत्व नहीं दिया जाता है। अतः यह समाज सदैव अविकसित ही रहता है।


आधुनिकता वर्ग के अनुसार सभी समाजों को प्रगति के लिये पाँच चरणों से गुज़रना पड़ता है। यह चरण वायुयाऩ की उड़ान भरने के समानान्तर हैं। प्रथम चरण में वायुयान भूमि पर स्थिर है। कोई गति नहीं, कोई हलचल नहीं। यह परम्परागत समाज की भाँति है। दूसरे चरण में इस यथास्थिति में परिवर्तन आता है। इस के लिये बाहरी आक्रमण अथवा विज्ञान अथवा कोई अन्य कारण हो सकता है। इस अवसर का लाभ उठाया जाये अथवा वापस यथास्थिति में लौट जाया जाये, दोनों विकल्प रहते हैं। तीसरे चरण में पुरानी रुकावटों को समाप्त कर नये रास्ते पर चलना आरम्भ होता है। इस के लिये राजनैतिक शक्ति का ऐसे हाथों में होना चाहिये जो प्रगति के प्रति समर्पित हो। देश की बचत दर बढ़ जाती है। नये तकनीकी ज्ञान का लाभ उठाया जाता है। चौथे चरण में गति बढ़ाई जाती है। आर्थिक प्रगति विभिन्न क्षेत्रों में फैल जाती है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि होती है। पाँचवें चरण में उपभोग हेतु वस्तुओं का आधिक्य होता है तथा प्रगति का लाभ सभी वर्गों को मिलने लगता है। इस चरण में प्रगति के लिये बलिदान करने की आवश्यकता नहीं होती है।


इस वर्ग के विद्वानों के अनुसार पूँजी का अर्थ केवल धन न हो कर वे समस्त वस्तुयें हैं जो भूमि तथा श्रम के अतिरिक्त उत्पादन के लिये उपयोग में आती हैं। इन में नये आविष्कार, नये कल कारखाने, नये संचार माध्यम, नई सड़कें इत्यादि सभी वस्तुयें आ जाती हैं। आरम्भ में मुक्त समाज का ज़माना था जिस में पूँजी पर व्यक्ति विशेष का अधिकार था तथा शासन को केवल बाधा समझा जाता था। बाद में इस विचारधारा में परिवर्तन हुआ तथा वर्तमान में शासन का भी योगदान प्रगति में माना जाता है। उस के दायित्व में आधारभूत संरचना - सड़कें, वायुपत्तन, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि - प्रदान करना आ जाते हैं। विचार धारा में इस परिवर्तन में 1930 के आर्थिक संकट का विशेष योगदान है।


जैसे कि पूर्व में बताया गया है, चौथे चरण में ही प्रगति का लाभ सभी को मिलना प्रारम्भ होता है। इसी कारण आरम्भ में इस औद्योगिक प्रगति का लाभ श्रमिक को नहीं मिला था। उन्हें दिन में कई कई घण्टे काम करना पड़ता था। मज़दूरी कम थी तथा काम करने का वातावरण खराब। उस समय के अर्थशास्त्रियों का मत था कि मज़दूरों को गरीब ही रहना चाहिये ताकि उत्पादन की लागत कम रहे। बाद में जब परिसम्पत्ति काफी बढ़ गई तो उन्हें भी लाभांश मिलने लगे, पूरा तो नहीं पर पहले से काफी अधिक। इस के कारणों का विश्लेषण हम आगे करें गे। पर इस का प्रभाव यह हुआ कि धीरे धीरे गरीबी उन्हीं तक सीमित रह गई जो कार्य नहीं कर सकते थे। कई लोगों का मत है कि आर्थिक आधुनिकरण के साथ साथ राजनैतिक आधुनिकरण भी हुआ। कहीं पर, जैसे कि इंगलैण्ड में यह शाँतिपूर्वक हुआ तथा कहीं पर, जैसे फ्रांस में, यह क्राँति द्वारा सम्पन्न हुआ।


आधुनिकरण वर्ग के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि विकासशील देशों को भी इसी क्रम से गुज़रना पड़े गा। यह अवश्य है कि जो आविष्कार हो चुके हैं, उन का लाभ उन्हें तुरन्त मिलना आरम्भ हो जाये गा। जो कार्य कुशलता विकसित देशों में धीरे धीरे आई, वह विकासशील देशों में तेज़ी से आ सकती है। अन्ततः प्रति व्यक्ति कितनी सम्पत्ति का अर्जन होता है, यह महत्वपूर्ण है, यह तय करने के लिये कि गरीबी कितनी देर में समाप्त हो सकती है।


आधुनिकरण वर्ग के अनुसार परम्परागत समाज में कुछ लोग दूसरों द्वारा अर्जित सम्पत्ति को हड़प लेते हैं। इस सम्पत्ति को वह उत्पादन के लिये नहीं लगाते। इस से राष्ट्रीय आय बढ़ती नहीं है। इस स्थिति से बाहर निकलने पर ही लाभ मिलना आरम्भ होता है।


इस बारे में मतभेद हैं कि आधुनिकरण के लिये प्रेरणा भीतर से आती है अथवा इसे बाहर से प्रेरित किया जा सकता है। जापान में यह प्रेरणा भीतर से आई परन्तु कई अन्य देशों में इसे बाहर से जबरन थोपा गया यद्यपि अंतिम परिणाम वही रहा। नये स्वतन्त्र देशों के वे नेता जिन का प्रशिक्षण विकसित देशों में हुआ था, प्रगति की इस क्रिया को समझते थे तथा उन के कारण अनेक देश इस रास्ते पर चले।


कहा गया है कि आज के विकसित देशों में पूँजी, जो उद्योगों में लगाई गई, केवल अपने ही लोगों की बचत से अथवा उन के शोषण से प्राप्त हुई। आज की स्थिति में इसे अन्तर्राष्ट्रीय निकायों से भी प्राप्त किया जा सकता है। विशेषज्ञाों की सलाह भी उन्हें मिल सकती है। इस वर्ग के प्रणेताओं के विचार में विकसित देशों की प्रगति विकासशील देशों की प्रगति के लिये आवश्यक है ताकि पूँजी का यह मार्ग खुला रहे।


यूँ तो इस वर्ग के विचारों को कोई नाम देने में कठिनाई है किन्तु अधिकतर लोग इसे उदार नीति के नाम से सम्बोधित करते हैं। उन का विचार है कि इस प्रगति के लिये किसी अन्दोलन, किसी हिंसात्मक कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। उन्हें सुधारवादी कहा जा सकता है। वह सभी देशों - विकसित तथा विकासशील देशों में - सुधार देखना चाहते हैं ताकि भागीदारी के साथ सभी प्रगति कर सकें।


गरीबी को समझाने के लिये दूसरा वर्ग निर्भरता की अवधारणा वाला है। इस वर्ग के विशेषज्ञों का मत है कि आज के अमीर देश ही शेष देशों की गरीबी के कारण हैं। इस अवधारणा के प्रेरक दक्षिण अमरीका के अर्थशास्त्री माने जाते हैं। जहाँ आधुनिकरण की अवधारणा अधिकाँशतः विकसित देशों के अर्थशास्त्रियों का विचार है, वहीं विकासशील देश निर्भरता अवधारणा के पक्ष में आगे आये हैं। इस वर्ग के अनुसार प्रगति का अभाव इस कारण नहीं है कि समाज प्रगति करने के पक्ष में नहीं है अथवा इस के लिये प्रयास नहीं करता है वरन् यह विकसित देशों द्वारा अपनाई गई नीतियों के कारण है।


सोलहवीं शताब्दि के पूर्व संसार के अधिकतर देशों का आपस का सम्बन्ध बहुत कम था। उस समय किसी समाज को परम्परागत कहना ठीक था। इस के बाद साम्राज्य विश्वव्यापी होने आरम्भ हो गये। युरोप के देशों से व्यापारी पूरे विश्व में लाभ अर्जित करने के लक्ष्य को ले कर जाने लगे। कच्चे माल को प्राप्त करने, तैयार माल को बेचने तथा लम्बी दूरी के व्यापार के कारण उन्हों ने पूरे विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। राजनैतिक बल के आधार पर अथवा आर्थिक बल के आधार पर उन्हों ने असमान सौदों को अंजाम दिया।


उन के इस प्रभुत्व ने पूरे विश्व की सामजिक संरचना को झंझोड़ कर रख दिया। यह प्रक्रिया अभी चार सौ वर्ष बाद भी निरन्तर चल रही है। यद्यपि उपनिवेशवाद समाप्त हो गया है किन्तु आर्थिक उपनिवेशवाद पूर्व की भाँति यथावत है वरन् इस में और तीब्रता आई है। विकासशील देशों के लोग विकसित देशों के लिये कार्य करते हैं, वे उन के आपसी संघर्ष में भागीदार बनाये जाते हैं, उन्हें विकसित देशों की भाषा बोलना पड़ती है। उन के सामाजिक सम्बन्ध विकसित देशों की समाज व्यवस्था से प्रभावित होते हैं। ऐसे में यह कहना कि वे अभी भी परम्परागत तरीके से रह रहे हैं, हास्यास्पद है। उन्हें बदल दिया गया है। तथा यह परिवर्तन केवल संयोगवश नहीं है। उन्हें विकसित देशों के हित के लिये ही परिवर्तन करना पड़ा है। यह परिवर्तन भले के लिये न हो कर उन के लिये हानिप्रद ही है। औद्योगिक जगत के विकास के कारण ही इन देशों की सामाजिक व्यवस्था बदली है, उन में गरीबी बढ़ी है, तथा उन्हें विकास की राह पर चलने से वंचित किया गया है।


एक उदाहरण से यह स्पष्ट हो सके गा। इंगलैण्ड में मध्यम वर्ग के उत्थान के लिये गुलामों का व्यापार ही ज़िम्मेदार था। अफ्रीका से गुलाम खरीदे जाते थे तथा अमरीका एवं पास के द्वीपों में बेचे जाते थे। इस व्यापार का लाभ इंगलैण्डवासियों को ही मिलता था। इन गुलामों के बदले में व्यापारी इन गुलामों द्वारा बनाई गई चीनी खरीदते थे जो युरोप में अथवा अमरीका में बेची जाती थी। इस का लाभ भी उन्हें जाता था। अमरीका से खाद्यान्न क्रय किये जाते थे जो युरोप में बेचे जाते थे। इसी कारण इंगलैण्ड को सस्ता भोजन मिलता था तथा निवेश के लिये पैसे मिलते थे। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि अन्य देशों में लोग गरीब क्यों थे। उन गुलामों के द्वारा उत्पादित सम्पत्ति उन के लिये नहीं थी। यह कहना हास्यास्पद हो गा कि इन गुलामों का समाज परम्परागत है तथा यही इन की गरीबी का कारण है।


अन्य देशों की हालत भी कमोबेश इसी प्रकार की है। थोड़ा बहुत परिवर्तन स्थानीय स्थितियों के अनुसार हो सकता है पर अधिकाँशतः यही तरीका अपनाया गया। रबड़, गन्ना, कपास, पटसन, कोको, तम्बाकू इत्यादि के उत्पादन के लिये बड़े बड़े बागान बनाये गये तथा इन में स्थानीय अथवा बाहर से लाये गये मज़दूरों को अमानवीय परिस्थितियों में रखा जा कर अधिक तथा सस्ता उत्पादन कर लाभ अर्जित किया गया। इसी प्रकार खदानों में कार्य करवाया गया। मज़दूरी कम रखा ही जाना थी ताकि अधिक से अधिक लाभ कमाया जा सके।


निर्भरता वर्ग का कहना है कि इस के लिये शासन पद्धति क्या थी, यह महत्वपूर्ण नहीं है। कहीं सीधे शासन किया गया, कहीं कठपुतली सरकार बनवाई गई। कहीं केवल आर्थिक दबाव का प्रयोग किया गया किन्तु लक्ष्य एवं परिणाम सब का एक ही था - इन देशों की गरीबी तथा विकसित देशों की अमीरी।


आज के विश्व में भी यही प्रवृति देखने को मिल रही है। आज के बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जिन के मुख्यालय अमरीका अथवा युरोप अथवा जापान में हैं, अनेकों देशों में कार्य करती है। उन की शक्ति ऐसी है कि कमज़ोर देश उन की लिये लाभदायक नीतियों पर चलने से इंकार नहीं कर सकते हैं। इस से उन की आर्थिक नीतियों प्रभावित होती हैं तथा उन्हें मजबूर किया जाता है कि वह अमुक औद्योगिक नीति को चुनें। इसी प्रकार बड़े बैंक भी स्थानीय मुद्रा को अस्थिर करने की कार्रवाई करने में सक्षम रहते हैं तथा अपनी इस शक्ति का लाभ अपनी शर्तें मनवाने के लिये उठाते हैं। इसी प्रकार विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, जो विकसित देशों द्वारा नियन्त्रित हैं, भी विकासशील देशों को पूँजीवादी नीतियाँ अपनाने के लिये विवश करते हैं।


निर्भरता अवधारणा केवल निर्यात के बारे में ही बात नहीं करती है। गत कुछ वर्षों में कुछ विकासशील देशों ने औद्योगिक विकास का मार्ग चुना है पर यह भी अमीर देशों द्वारा नियन्त्रित हैं। वह स्थानीय अमीर लोगों के लिये उपभोक्ता वस्तुयें बनाते हैं तथा गरीबी को दूर करने में किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जाती। चूँकि यह उद्योग मशीनरी पर अधिक तथा श्रमिकों पर कम निर्भर हैं अतः इन का परिणाम बेरोज़गारी बढ़ाने का होता है। इन देशों में पूँजीवादी वर्ग तथा मध्य वर्ग बढ़ तो रहा है किन्तु वह अभी इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि वह अर्थ व्यवस्था की दिशा को तय कर सके। इस का कारण यह है कि यह पूँजीवादी वर्ग स्वयं विदेशी पूँजीवादी वर्ग पर निर्भर है। वह उस प्रकार का जोखिम नहीं उठा सकते अथवा नहीं उठाना चाहते जो अर्थ व्यवस्था में आमूल परिवर्तन ला सके। आम तौर पर विदेशी शक्तियों का अधिक प्रभाव केन्द्रीय नेतृत्व पर रहता है जो अपनी बारी पर वही व्यवहार प्रदेशों के साथ करता है।


गत वर्षों में आयात निर्यात के मामले में विकासशील देश विकसित देशों के साथ समानता के आधार पर व्यापार नहीं कर पा रहे हैं। निर्यात वस्तुओं का मूल्य बढ़ा है किन्तु आयातित वस्तुओं का मूल्य अधिक तेज़ी से बढ़ा है। निर्यातित वस्तुओं का दाम इस लिये कम है कि विकासशील देशों में कम मज़दूरी पर कार्य होता है। जो लाभ तथा बचत है, वह विकसित देशों को अन्तरित हो जाती है, उस देश में निवेश के काम में नहीं आती है। यह एक दुष्चक्र बन जाता है। निर्यात का मूल्य कम है क्योंकि इन देशों में मज़दूरी कम है। विकसित देशों में मज़दूरी अधिक है इस कारण वहाँ पर उत्पादन का मूल्य बढ़ जाता है। चूँकि आयात के लिये अधिक पैसा देना पड़ता है अतः मज़दूरी कम की जाती है। इस के साथ ही जो अतिशेष विकासशील देशों में होता भी है, वह अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा स्वदेश ले जाया जाता है। जो बचत विकास के काम आती, वह इस प्रकार अन्तरित हो जाती है। आम तौर पर विकासशील देशों में जो कारखाने आरम्भ किये जाते हैं, उन के लिये पैसा बाहर से नहीं आता वरन् स्थानीय लोगों की बचत ही लगाई जाती है किन्तु लाभ बाहर चला जाता है। इस प्रकार के शोषण का चक्र सोलहवीं शताब्दी से ही आरम्भ हो चुका है जब दक्षिण अमरीका में सोने तथा चाँदी का पता चला था। इन का कोई लाभ स्थानीय जनता को नहीं मिल पाया। निकट भूतकाल में अरब देशों में तेल भण्डार में भी विदेशी कम्पिनियों ने ही लाभ कमाया है। कुछ कठपुतलियों को भी भागीदार बनाया गया है किन्तु आम लोगों को कोई लाभ नहीं मिला।


एक उदाहरण से यह अधिक स्पष्ट हो सके गा। अफ्रीका में ईथोपिया, आईवरी कोस्ट, घाना, तथा बुरुण्डी बड़ी हद तक कोकवा तथा काफी के निर्यात पर निर्भर हैं। परन्तु क्या इस से उन को लाभ पहुॅचा है। आईवरी कोस्ट से कोकवा का निर्यात विश्व के 41 प्रतिशत के बराबर है। इस का परिमाण बढ़ा है पर इस से प्राप्त आय में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है बल्कि वास्तविक आय (विदेशी मुद्रा की दर को देखते हुये) कम ही हुई है। कोकवा की मूल्य 1850 ईसवी में 550 डालर प्रति टन था जो 1937 में लगभग 75 डालर रह गया (तथा किसानों ने स्वयं अपनी फसल जलाना आरम्भ कर दी)। इस के बाद थोड़ी रियायत हुई पर 1950 में यह 200 डालर प्रति टन से कम था। यह एक उदाहरण कि किस प्रकार विकसित देशों ने विकासशील देशों का शोषण किया है। यही स्थिति काफी की भी है जिस का वास्तविक लाभ केवल स्टारबक इत्यादि कम्पनियों को मिलता है तथा उत्पादक किसान गरीबी से ही झूझता रहता है।


आर्थिक दासता का परिणाम राजनैतिक दासता भी हो जाता है। केवल उन लोगों को ही बर्दाश्त किया जाता है जो हाँ में हाँ मिलाते रहें। अमरीका उन्हीं देशों का समर्थन करता है जो अमरीकन उद्योगपतियों का स्वागत करता है। जहाँ पर ऐसा नहीं होता वहाँ उन्हें हर तरह से परेशान किया जाता है और आवश्यक हो तो सैनिक हस्तक्षेप भी किया जाता है। इस का एक उदाहरण बरकीना फासो है जहाॅं थामस संगकारा ने बिना विदेशी सहायता के तथा विदेशी दबाव के देश की प्रगति का प्रयास किया पर चार वर्ष में ही उस को तख्ता फ्रांस तथा पड़ोसी देश द्वारा सैनिक हस्तक्षेप से पलट दिया गया।


आधुनिकता अवधारणा के लोग पूँजीवाद को निर्माण शक्ति मानते हैं। उन का कहना है कि इसी से अन्ततः विकासशील देश सम्पन्न हो सकते हैं। किन्तु निर्भरता अवधारणा वाले पूँजीवाद को ही विकासशील देशों के गरीब होने का कारण मानते हैं। शताब्दियों से यह विकासशील देश पूँजीवाद के ही भाग रहे हैं। विकसित देशों की प्रगति बचत के आधार पर हुई है तथा यह बचत विकासशील देशों के शोषण से ही हुई है। आधुनिकता अवधारणा वाले मानते हैं कि विकासशील देश ही अन्य देशों की गरीबी को समाप्त कर सकें गे। निर्भरता अवधारणा वाले उन्हें ही राह का रोड़ा मानते हैं। कई बार आधुनिकता वर्ग वालेे निर्भरता वर्ग के तर्कों का सीधा उत्तर नहीं देते वरन् उसे केवल राजनीति से प्रेरित कह कर टाल देते हैं।


सभी निर्भरता अवधारणा वाले यह नहीं मानते कि विकसित देशों को समाप्त कर के ही प्रगति हो सकती है। परन्तु कुछ यह मानते हैं कि आग का उत्तर आग से ही देना चाहिये। जो भी हानि विकसित देशों ने अन्य देशों को पहुँचाई है, उस के बदले में उतना ही विकास कर उन को पहुँचाई जाना चाहिये। जापान का उदाहरण दिया जाता है जिस ने उन्हीं तरीकों से आज पश्चिमी देशों का नाक में दम कर रखा है। दक्षिण कोरिया, ताईवान, मलेशिया, सिंगापुर भी इसी राह पर चले हैं तथा अब चीन भी उन की कतार में आ चुका है।


इस के विरोधी इस तर्क को नहीं मानते। नये विकसित देशों में यह भावना नहीं है कि वह अन्य विकासशील देशों के विकास की बात करें। वह केवल इस शिविर से उस शिविर में चले गये हैं। उन का यह भी कहना है कि इन देशों में भी भले ही राष्ट्रीय धन में वृद्धि हुई है किन्तु इस का एक समान लाभ सभी नागरिकों को नहीं मिल रहा। जापान को छोड़ कर अन्य देशों में गरीब लोगों को कोई राहत नहीं मिली है।


एक अन्य वर्ग यह महसूस करता है कि पूँजीवाद में तो बुराई नहीं है पर इस पर सख्त नियन्त्रण रखा जाना आवश्यक है। उसे स्थानीय आवश्यकतायें पूरा करने के ओर मोड़ना चाहिये न कि बाहर के देशों की सहायता करने के लिये। पर यह अनुशासन आधे मन से किया जाता है तथा कई लोगों द्वारा इन का विकल्प निकाल लिया जाता है। इस के लिये स्थानीय भ्रष्टाचार सहायक सिद्ध होता है। उन के विचार में केवल पूर्ण समाजवादी परिवर्तन ही इस दलदल से बाहर निकाल सकता है।


इसी समाजवाद का एक रूप मार्कस है। वह अपने को एक अलग वर्ग के तौर पर पेश करते हैं किन्तु उन के तर्क लगभग वैसे ही हैं जैसे कि निर्भरता वर्ग वालों के हैं। उसे इस का एक अंग माना जा सकता है। उन का कहना है कि सामाजिक पविर्तन समाज संघर्ष का अंग हैं। मज़दूर मालिकों के विरुद्ध संघर्ष करते हैं तथा किसान भूमि स्वामी के विरुद्ध। इन संघर्ष में से ही गरीबी, आर्थिक प्रगति तथा क्राँतियाँ घटित होती हैं। इसी वर्ग संघर्ष से ही वर्ग बनते तथा बिगड़ते हैं। विकासशील देशों में यह संघर्ष आँतरिक हैं, बाहरी नहीं। इस वर्ग का विचार है कि पूँजीवाद ही विकासशील देशों में प्रगति ला सकता है। श्रमिकों को भागीदार बनाये जाने के अतिरिक्त उन के लिये भी प्रगति का मार्ग वैसा ही है जैसा विकसित देशों ने अपनाया था। उन का यह भी विचार है कि उपनिवेशवाद भी प्रगति का वाहक हो सकता है। यह तर्क आधुनिकता अवधारणा के तर्कों के समान ही प्रतीत होते हैं किन्तु उन के विचारों में थोड़ा अन्तर है। माक्र्सवादियों के विचार में मध्य युग में यूरोप में किसानों तथा भूमिस्वामियों में संघर्ष था। कृषि मज़दूरों के संघर्ष के कारण भूमिस्वमियों को पूँजीवादी बनना पड़ा तथा उद्योगों की स्थापना की गई। कृषि में भूमि तथा औज़ार तो मज़दूरों के पास थे। पूँजीवादियों ने पाया कि उद्योग में तो वह भी उन के हाथ में रहें गे जिस से वह अधिक लाभ अर्जित कर सकें गे। अधिक लाभ उन्हें वृद्धि का अवसर दे गा जो भूमि के मामले में सीमित था। पूँजीवाद में मज़दूरों के शोषण से ही उन्हें अधिक लाभ हो गा। उन की आपसी प्रतियोगिता उन के अतिशेष को बढ़ाने के बारे में हो गी। पर इस अतिशेष के बटवारे के बारे में वह सशंकित हैं। उन के विचार में इस से देश तो आगे बढ़े गा पर साथ ही साथ विषमता भी बढ़े गी। साथ ही श्रमिक वर्ग के जीवन स्तर पर भी विपरीत प्रभाव पड़े गा। इस प्रकार ऐसी स्थिति आये गी जब क्राँति अवश्यमभावी हो जाये गी। परन्तु मार्कस बात की ओर ध्यान नहीं दे पाया कि अन्ततः उत्पादकता बढ़ाने के लिये ही सही, पर श्रमिकों की हालत में सुधार आये गा तथा उन्हें भी प्रगति में भागीदार बनाया जाये गा।


आधुनिक मार्कसवादी पूँजीवाद के विरुद्ध अधिक नहीं कह पाते परन्तु वह इसे एक मात्र उत्पादन का तरीका नहीं मानते। उन का विचार है कि समाजवाद भी प्रगति ला सकता है। वह श्रमिक वर्ग को अधिक प्रेरित कर सकता है। इस से विषमता कम हो गी तथा वही देश की शक्ति हो गी। मौलिक बात यह है कि श्रमिक के पास उत्पादन के साधन नहीं हैं अतः उसे मज़दूरी पर कार्य करना पड़ता है। इस स्थिति में परिवर्तन ही वास्तविक प्रगति लाये गा। निर्भरता अवधारणा वाले इसे नहीं मानते। उन का कहना है कि पूँजीवाद विश्वव्यापी व्यवस्था है। इस के केन्द्र पश्चिमी देशों में था, इस कारण वह मुख्य भूमिका में आ गये। मज़दूरी अपनाने का प्रश्न नहीं था वरन् इस के लिये अलग तरीके - गुलामी, ठेकेदारी, बटाईदारी इत्यादि अपनाये गये। विश्व आज बाज़ार पर आधारित है न कि मज़दूरी के करार पर। पर यह बाज़ार असमानता के आधार पर चल रहा है क्योंकि विकसित देश अपना रवैया बदलने को तैयार नहीं हैं।


आधुनिकता अवधारणा में तथा मार्कसवादी अवधारणा में राज्य की भूमिका को ले कर मतभेद है। आधुनिकता अवधारणा का कहना है कि राज्य का दायित्व है कि वह प्रगति में तथा उद्योग में आने वाली रूकावटों को हटाने का कार्य करे पर वे इसे सामाजिक संरचना का अंग नहीं मानते। माक्र्सवादी राज्य को सामाजिक संरचना का अंग मानते हैं। राज्य शासक वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करता है। यदि उस की नीति सही है तो आर्थिक प्रगति हो सके गी अन्यथा संघर्ष की स्थिति प्रस्तुत हो गी। यदि सत्ता श्रमिकों के हाथ में हो गी तो वह सामाजिक संरचना के साथ साथ आर्थिक संरचना को भी बदल सके गा। उन का विचार है कि विदेशी शासक भी कभी कभी पुरानी संरचना को तोड़ने में सहायता करते हैं तथा इस तरह से वे प्रगति के वाहक बनते हैं।


बहुराष्ट्री़य निगमों के बारे में भी मतभेद है। निर्भरता विचार वाले इन्हें विदेशी मालिकों की मरज़ी पर आधारित मानते हैं जो स्थानीय उत्पादन में अपने लाभ के लिये उत्थल पुथल कर सकते हैं। मार्कसवादी इन्हें उसी मालिक मज़दूर के संर्घष का भाग मानते हैं। यह प्रगति के वाहक बन सकते हैं जैसे कि साठ तथा सत्तर के दशक में दक्षिण अमरीका के बड़े देश ब्राज़ील तथा मैक्सीको में हुआ था। सत्तर की दशक में तेल निर्यातक देशों में प्रगति हुई। अस्सी तथा नब्बे के दशकों में पूर्वी एशिया के देशों में प्रगति हुई। तेल निर्यातक देशों की बात छोड़ दें तो अन्य देशों में प्रगति पूँजीवादी तरीके से हुई जिस में राज्य उन की सहायता कर रहे थे। निर्भरता विचार वाले कहते हैं कि इस से गरीबी में कमी नहीं हुई तथा यह देश लम्बी दौड़ में सफल होने वाले नहीं हैं जब तक वे अपने आँतरिक सुधार को नहीं देखते। माक्र्सवादी इसे यह कह कर समझाते हैं कि यह पूँजीवाद का सामान्य व्यवहार है कि विषमता बढ़े गी। तथा इस विषमता का समाधान साम्यवाद में ही है।


मार्कस का मौलिक विचार कि पूँजीवाद अपने ही भार से गिरे गा, सही सिद्ध नहीं हुआ है। इस के विपरीत साम्यवादी क्राँतियाँ पिछड़े देशों में ही हुईं। पर साम्यवादी व्यवस्था के बावजूद गरीबी में परिवर्तन नहीं आ पाया। रूस में राज्य को ही औद्योगिकरण के लिये सामने आना पड़ा। पर अतिरिक्त कमाई का वितरण साम्यवाद के मूल सिद्धाँतों के अनुसार नहीं हो पाया। निर्भरता अवधारणा वाले समाजवाद को ही एक मात्र समाधान मानते हैं ताकि विषमता कम की जा सके।


यह स्पष्ट है कि तीनों दृष्टिकोण में कुछ तर्क सही हैं। सामाजिक वास्तविकता बहुत विविध तथा जटिल है। वैसे भी छह अरब लोगों के एक समान होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इस का कोई एक रूप नहीं है। यह बात समझाना कठिन है कि इतनी बहुलता के बीच गरीबी क्यों है। सभी स्पष्टीकरणों में कुछ सत्य है पर वह पूरी बात को समझा नहीं पाते। उदाहरण के तौर पर इस बात को लें कि क्या पिछड़े देशों की संस्कृति को परम्परागत मानना चाहिये अथवा प्रतिबिम्बित। वह दोनों ही हैं। पुराने शासकों की कई बातों को ग्रहण कर लिया गया है जिस से वे पारम्परिक नहीं रह गईं हैं। पर उन्हों ने अपने पुराने विचार भी नहीं छोड़े हैं अतः वह पूरी तरह प्रतिबिम्बित भी नहीं हैं। प्राचीन संस्कार आज भी उन्हें प्रभावित करते हैं। इन दोनों के बीच जो विरोधाभास तथा संघर्ष है, वह कई देशों को जकड़े हुए है।


प्रश्न यह है कि गरीबी हट क्यों नहीं पा रही है। कुछ देशों में यह कम हो रही है पर अन्य में बढ़ भी रही है। न तो उपनिवेशवाद की समाप्ति ने इस स्थिति में परिवर्तन किया है तथा न ही तकनीकी तथा राजनैतिक परिवर्तन इस बाबत कुछ कर पाये हैं। जिन तीन अवधारणाओं की बात हम ने की है, उन में से आधुनिकता वर्ग वाले तो इसे मानने से ही इंकार करते हैं। उन का कथन है कि समय के साथ गरीबी समाप्त हो जाये गी। इस के लिये कुछ करना आवश्यक नहीं है। वर्तमान में जो समस्या है, उस के बारे में कथन है कि सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं। भारत में ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी इस लिये है कि भारत सरकार ने कृषि की ओर कम तथा उद्योग की ओर अधिक ध्यान दिया है। फिलिपीन में गरीबी इस लिये है कि वहाँ पर गल्त उद्योग को प्रोत्साहित किया गया जिस के उत्पादन के लिये विदेशी बाज़ार नहीं था। कुछ का तर्क है कि सरकारें, अमीर तथा गरीब दोनों, बहुत अधिक हस्तक्षेप करती हैं। बाज़ार पर छोड़ दें तो यह समस्या हल हो सकें गी।


अन्य दोनों अवधारणायें, निर्भरता तथा मार्कसवादी, सरकार को गरीबी के लिये ज़िम्मेदार नहीं मानती। वह इस के लिये बाहरी कारण डूँढते हैं तथा सरकार को इन कारणों का पोषक अथवा सहभागी बताते हैं क्योंकि सरकार उसी व्यवस्था का अंग मात्र है। निर्भरता अवधारणा वाले विकसित देशों को गरीबी के लिये दोष देते हैं और इस के लिये विकासशील देशों को इन से सम्बन्ध समाप्त करने अथवा कम करने का परामर्श देते हैं। इस के लिये समाजवादी क्राँति आवश्यक हो गी तथा नई व्यवस्था में समाज सरकार को नियन्त्रित करे गा। मार्कसवादी चाहते हैं कि पुराने सामाजिक ढाँचे को भी बदला जाये तथा शोषित वर्ग सरकार का हथिया कर नीति परिवर्तन करे।


कुल मिला कर देखा जाये तो निर्भरता अवधारणा के विचार विकास की गति कम होने को अधिक अच्छी तरह से समझा सकती है। पिछड़े देशों में शताब्दियों से सामाजिक तथा राजनैतिक परिवर्तन हो रहे हैं। अधिकतर यह उपनिवेशवादी देशों की नीतियों के कारण हैं। दक्षिण अमरीका में निवासी लगभग सभी आप्रवासी लोगों के वंशज हैं। कई देश एक या दूसरी वस्तु के निर्यात पर निर्भर हैं जैसे जैमिका से बाक्साईट; ग्राज़ील से काफी; क्यूबा से चीनी; घाना से कोकाआ; मलेशिया से रबड़। इन के लिये बाज़ार विकसित देश है तथा वे ही इन का मूल्य तय करते हैं। वहाँ की निर्मित वस्तुयें तथा कहीं कहीं कृषि उत्पादन भी वहाँ से आते हैं तथा इन का मूल्य भी वही तय करते हैं। जनसंख्या में वृद्धि की दर भी आयातित तकनीक (जिस के कारण मृत्यु दर में कमी आती है) के कारण है। यद्यपि इन देशें में पुरानी सभ्यता के अवशेष अभी हैं किन्तु उन्हें पुरानी सभ्यता के देश नहीं माना जा सकता। उस में मौलिक परिवर्तन आ चुका है। साथ ही इन देशों की नीतियाँ स्वतन्त्र रूप से तय नहीं होती हैं। कुछ लोगों का विचार है कि विकसित देशों से सम्बन्ध तोड़ने से प्रगति हो सकती है किन्तु यह सम्भव नहीं है। आर्थिक प्रगति विश्वव्यापी प्रक्रिया है तथा इस से मुँह मोड़ा नहीं जा सकता है। अन्ततः समाजवाद ही एक मात्र समाधान है।


यह नहीं कि विकासशील देशों में अपने खलनायक नहीं हैं। युगाण्डा के अमीन, काँगो के गृह युद्ध, कम्पूचिया के पोल पाट, रवांडा में जातीय नर संहार बाहर के थोपे हुए नहीं हैं। साम्यवाद पूर्वी युरोप के देशों को अथवा सोवियत रूस को बचा नहीं पाया। इस के विपरीत भारत में प्रजातन्त्र की निरन्तरता, ताईवान तथा दक्षिण कोरिया की सफलता उन की आँतरिक शक्ति के कारण ही सम्भव हो पाया है। कहने का तात्पर्य यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय तथा भीतरी दोनों ही पक्षों को मिला कर चलने की आवश्यकता है।


इन अवधारणाओं के पीछे एक विश्व व्यापी दृष्टिकोण देखने को भी मिलता है। विकसित देश का व्यक्ति सोचता है - ‘मैं ने विद्या अर्जित की, परिश्रम किया, कमाया। तुम ऐसा क्यों नहीं कर सकते’। पिछड़े देश का व्यक्ति सोचता है - ‘मैं ऐसा कैसे कर सकता हूॅ। जब तुम ने मेरी गरदन पकड़ रखी है।’ पहला पक्ष कहता है - ‘मैं ने किसी की गरदन नहीं पकड़ी। मैं तो कहता हूँ कि सब को बराबर का अवसर मिलना चाहिये। मैं ने अवसर का लाभ उठाया, तुम भी उठाओ।’ उत्तर आता है - ‘दिक्कत यह है कि न केवल तुम हर बात को नियन्त्रित करते हो बल्कि इस सत्य को मानने को भी तैयार नहीं हो।’ यही विश्व की त्रासदी है।


4. उपनिवेशवाद


उपनिवेशवाद एक जीती जागती हकीकत है। अश्वेत लोगों को योरुप के लोगों द्वारा शताब्दियों तक इसे झेलना पड़ा। परन्तु आधुनिकता मत वालों का कहना है कि उपनिवेशवाद के कोई स्थाई परिणाम नहीं हुए तथा यदि तीसरे विश्व के लोग आज पिछड़े हैं तो यह उन के परम्परागत जीवन के कारण है। निर्भरता मत वाले तथा मार्कवादियों के लिये उपनिवेशवाद एक बड़ा मुद्दा है। मार्कसवादियों की दृष्टि सीमित है तथा उन का मानना है कि उपनिवेशवाद ने परम्परागत संरचना को छिन्न भिन्न कर दिया तथा उस के स्थान पर वर्ग उपजे जिन का संघर्ष अब चल रहा है। निर्भरता मत वालों का कथन है कि उपनिवेशवाद का परिणाम ही आज के तीसरे विश्व की गरीबी है।


उपनिवेशवाद का परिणाम न केवल गरीबी के रूप में हुआ है वरन् उस ने देशों की सीमा के साथ भी खिलवाड़ किया है। स्थानीय भाषाओं को भी समाप्त कर दिया है। स्थानीय उद्योगों को समाप्त कर दिया गया है। अर्थव्यवस्था में जो परिवर्तन किये गये हैं, वे ही आज नगर की मलिन बस्तियों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं। परम्पराओं को समाप्त करने के पश्चात भी आधुनिकता सिद्धाँत वालों का कथन कि केवल परम्परा ही गरीबी की जन्मदाता है, वास्तविकता से मुँह मोड़ना है। उपनिवेशवाद ने किस प्रकार पुराने समाज में परिवर्तन किया है, इस पर थोड़ा विचार करें।


उपनिवेशवाद को तीन चरणों में देखा जा सकता है। प्रथम 1492 से 1776 के बीच जब योरुप के देशों ने सागर के रास्ते अन्य देशों तक पहुँचना आरम्भ किया। उन के नये प्रकार के हथियारों के सामने पुराने युद्ध के तौर तरीके बौने सिद्ध हुए। दक्षिण अमरीका में इंका साम्राज्य, उत्तर अमरीका में एज़टैक साम्राज्य टिक नहीं पाये। पुर्तगाल तथा स्पैन ने इन सभ्यताओं को तो नष्ट किया ही, साथ ही पूरी की पूरी जाति को ही समाप्त कर दिया। जब अमरीका में रैड इण्डियन को समाप्त किया गया तो कुछ बचे तथा उन्हें श्वेत लोगों के लिये काम करने को कहा गया किन्तु स्वतन्त्र तबियत के वे लोग उन के कहे अनुसार कार्य न कर पाये अतः अफ्रीका से गुलामों को लाया गया। अफ्रीका में कोई बड़े साम्राज्य नहीं थे तथा खनिज पदार्थ भी तब तक नहीं मिले थे तो वहाँ पर गुलामों का व्यापार आरम्भ किया गया। संक्षेप में सभी स्थानों पर परम्परागत जीवन को समाप्त कर श्वेत लोगों का वर्चस्व स्थापित किया गया। जहाँ पर (जैसे मैक्सिको में) श्वेत लोगों ने स्थानीय औरतों के साथ घर बसाया वहाँ पर नई प्रजाति का जन्म हुआ जो संस्कृति की दृष्टि से मूलतः युरोप की संस्कृति के प्रतिनिधि थे। यह कहना अतिश्योक्ति न हो गा कि आज के विकसित देशों की सम्पदा तथा स्मृद्धि का आधार व्यापक नरसंहार एवं शोषण है।


उपनिवेशवाद का दूसरा दौर 1776 से 1870 का गिना जा सकता है। इस का आरम्भ संयुक्त राज्य अमरीका के गठन के साथ हुआ। इस का दूसरा बड़ा पक्ष इंगलैण्ड की शक्ति में वृद्धि था जब कि फ्रांस, स्पैन तथा पुर्तगाल का पूर्व जैसा वर्चस्व नहीं रहा। 1820 में दक्षिण अमरीका के देश (जो वास्तव में श्वेत तथा संकर जाति के लोगों का देश बन चुके थे) ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया तथा इंगलैण्ड की शक्ति के कारण स्पैन अथवा पुर्तगाल कुछ कर नहीं पाये। 1815 में फ्रांस की हार के बाद उस की चुनौती भी समाप्त हो गई। पर फिर भी दक्षिण अमरीका में तथा अफ्रीका व एशिया में कुछ अंश तक उन के उपनिवेश स्थापित रहे। इस अवधि के दौरान उन स्थानों पर जहाँ श्वेत लोगों ने स्थाई निवास बना लिया था तथा स्थानीय चुनौती समाप्त हो चुकी थी, कुछ स्वतन्त्रता दी गई जैसे कनाडा तथा आस्ट्रेलिया में। दक्षिण अफ्रीका की भी ऐसी ही स्थिति थी यद्यपि वहाँ पर बोअर युद्ध के बाद ही उन्हों ने पूर्ण सत्ता छोड़ी। पर बोअर भी उसी श्वेत संस्कृति का अंग थे। एक दृष्टिकोण यह भी है कि यह पाया गया कि बिना सीधे शासन के भी वही लाभ पाये जा सकते हैं। सामान्यतः व्यापार कम्पनियों को अपना कार्य करने की तथा प्रशासन की अनुमति दी गई किन्तु जहाँ पर कोई विद्रोह हुआ वहाँ पर सीधे शासन की व्यवस्था भी की गई जैसेे कि भारत में 1857 के संघर्ष के बाद हुआ।


उपनिवेशवाद का तीसरा चरण 1870 से 1914 तक का माना जा सकता है। इस अवधि में इंगलैण्ड के अतिरिक्त फ्रांस, बैलजियम, जर्मनी, इटली, पुर्तगाल ने फिर से विस्तार की नीति अपनाई। अमरीका तथा जापान भी इस सूची में शामिल हो गये। इस बीच में संसार की अधिकाँश क्षेत्र पर इन का आधिपत्य स्थापित हुआ। सब से अधिक प्रभावित अफ्रीका महाद्वीप था। गोल्ड कोस्ट, नाईजीरिया, कीनिया, युगण्डा, मिस्र, सुडान तथा सोमालिया में इंगलैण्ड; अलजीरिया इत्यादि के अतिरिक्त मध्य अफ्रीका में फ्रांस ने, लीबिया तथा ईथोपिया में इटली ने, कांगो में बैलजियम ने कब्ज़ा कर लिया। जर्मनी टांगानियका, कैमरून तथा दक्षिण पश्चिमी अफ्रीका में पहुँचा। उधर एशिया में बर्मा तथा मलाया में इंगलैण्ड ने तथा इण्डोचीन में फ्रांस ने वर्चस्व स्थापित किया। हालैण्ड ने इण्डोनेशिया को अपना अपनिवेश बनाया। चीन में सीधे आधिपत्य तो नहीं किया गया किन्तु अफ़ीम युद्ध के बाद उसे पूरी तरह काबू में कर लिया गया। इस में अमरीका भी शामिल हो गया जो जापान की विस्तार नीति को नियंत्रित करना चाहते थे। 1845 में अमरीका ने मैक्सीको की आधी भूमि पर कब्ज़ा कर लिया था। एशिया में फिलिपीन्स पर कब्ज़ा किया गया। मध्य अमरीका में भी उस ने स्पैन को 1898 के युद्ध के बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया। 1914 तक लगभग पूरा विश्व इन उपनिवेश करने वाली शक्तियों में बट चुका था।


आश्चर्य की बात यह है कि इस काल के पाश्चात्य देशों के कुछ बुद्धिजीवियों ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध लिखा। वैसे देखा जाये तो साम्राज्य स्थापित करना कोई नई बात नहीं है। यूनान तथा रोम के साम्राज्य भी विस्तृत थे। भारत में चक्रवर्ती राजा की कल्पना सदैव से रही है। परन्तु यह राज्य उस रूप से प्रमुख देश द्वारा शासित नहीं थे जैसे कि उन्नीसवीं शताब्दि में हुए। वास्तव में यह एक तरह के गठबंधन थे। शोषण के नाम पर केवल वार्षिक खिराज देना पड़ता था पर स्थानीय प्रशासन प्रभावित नहीं हुआ। उपनिवेशवाद का वास्तविक स्वरूप आधिपत्य करने वाले देशों द्वारा किया जाने वाला शोषण था जिस का आश्य विजयी राज्यों को स्मृद्ध कर सकने का था। इस नई पद्धति के लिये नवीन प्रकार के हथियारों का भी योगदान था। इस के अतिरिक्त विज्ञान तथा तकनालोजी में उन्नति भी एक कारण रही। इस के कारण कृषि, शिल्पकला, निर्माण, जहाज़ निर्माण एवं ऊर्जा उत्पादन सभी प्रभावित हुए।


इस उपनिवेशवाद के परिणामों पर दृष्टि करें तो सब से अधिक महत्वपूर्ण बात शिक्षा एवं भाषा पर प्रभाव का है। आज तीसरे विश्व के अधिकाँश देशों की भाषा वहाँ की मूल भाषा न हो कर युरोप की कोई भाषा है। नाम के लिये भले ही स्थानीय भाषा का नाम लिया जाता हो पर व्यवहार की भाषा विदेशी ही है। कुछ अपवाद है जैसे इण्डोनेशिया तथा वीयतनाम परन्तु सामान्य नियम वही है। इस विदेशी भाषा के माध्यम से नीति निर्माता, लेखक, विचारक पूरे विश्व को प्रभावित करते हैं। भाषा संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है तथा स्थानीय भाषा के गौण हो जाने के साथ ही स्थानीय संस्कृति भी गौण हो जाती है तथा इस का स्थान विदेशी संस्कृति ले लेती है। उदाहरण स्वरूप सौदेबाज़ी को ही लें। भारत में यह बड़े इत्मीनान से और नज़ाकत से होता था। ज़बानी जमा खर्च पर ही लाखों की बात हो जाती थी। पर अंग्रेज़ी कानून में लिखित शब्द को जो महत्व दिया जाता है, उस ने सारी स्थिति में परिवर्तन ला दिया है। लिखित शब्द पर विश्वास ने अदालती कार्रवाई को अग्रिम पंक्ति में ला दिया। स्थानीय न्याय व्यवस्था समाप्तप्रायः है।


एक और उदाहरण स्वास्थ्य सेवाओं का है। इस का प्रभाव संयुक्त परिवार की पद्धति पर पड़ा। भारत में तथा कई अन्य देशों में परिवार का अर्थ विस्तृत रूप में लिया जाता है किन्तु जब विदेशी शासन ने परिवार के लिये स्वास्थ्य सुविधा की निर्णय लिया तो इसे केवल मूल परिवार (पति, पत्नि एवं बच्चे) तक सीमित कर दिया। इस का परिणाम एक नई अवधारणा के रूप में हुई जिस ने धीरे धीरे विस्तार कर पूरे समाज की व्यवस्था को बदल दिया।


उपनिवेशवाद का एक परिणाम यह भी हुआ कि इस के साथ ईसाई धर्म भी साथ में आया। पश्चिमी धर्मों - इस्लाम अथवा ईसाई - में किसी सहअस्तित्व की बात स्वीकार नहीं की जाती है। इस में धर्म परिवर्तन ही वाँछित हो जाता है। तथा इस धर्म परिवर्तन के साथ भूत काल की परम्पराओं तथा रीति रिवाजों का पूरी तरह त्याग करना भी आवश्यक माना जाता है। पुराने धर्म जीवन से उत्पन्न हुए थे, इस कारण उन में किसी से विरोध नहीं था। अलग अलग पूजा पद्धति होते हुए भी वह एकता के सूत्र में लोगों को बाँधता था। नये धर्म पुस्तक आधारित थे। ईसाई मत ने इस एकता को तोड़ कर उपनिवेशवादियों की सहायता की। अपनी हत्या से कुछ समय पूर्व दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत चैतन्य नेता स्टीवन बीको ने कहा था कि ‘‘हम उस भूमिका को भूल नहीं सकते जो ईसाई मत ने हमारी संस्कृति को बदलने के लिये किया। ईसाई मत को अपनाने में सब से पूर्व अपने परम्परागत लिबास को बदलना पड़ता था तथा नया परिधान पाश्चात्य था। वैसा ही हमारी बहुत से रीति रिवाज के साथ हुआ। हम ईसाई धर्म को चुनौती नहीं दे रहे किन्तु उस के साथ जो पाश्चात्य संस्कृति जुड़ी है, उस में परिवर्तन चाहते हैं’’।


जहाँ ईसाई मत में लोगों को परिवर्तित नहीं किया जा सका, वहाँ भी विदेशी विचारों को पनपाया गया। कभी धोके से तो कभी लालच से ऐसा किया गया। दक्षिण अमरीका में नरसंहार को ईसाई धर्म के प्रचार के नाम पर सही ठहराया गया। कैलेफोर्निया में स्थानीय लोगों को उन की आत्मा को बचाने के नाम पर बन्दी बना कर रखा गया। चीन में लाखों लोगों को अफ़ीम खाने के लिये प्रेरित किया गया।


शिक्षा के बारे में भी वैसा ही रवैया अपनाया गया। पुरानी पद्धति में परिवर्तन कर पाश्चात्य पद्धति को लाया गया। जो परम्परागत विषय थे, उन के स्थान पर नये विषय लाये गये। यदि नये विषयों को पुराने के साथ जोड़ दिया जाता तो अधिक अच्छा होता। भारत में स्थिति यह हुई कि देश के एक भाग का व्यक्ति देश के दूसरे भाग के बारे में कम जानता था तथा इंगलैण्ड के बारे में अधिक। मैकाले का घोषित लक्ष्य था ऐसे व्यक्ति बनाना जो बाहर से भारतीय हों पर अन्दर से अंग्रेज़। आज भी हम उसी पथ पर चल रहे हैं।


पश्चिमी देशों में एकतन्त्र का बोल बाला था। फ्रांस में सामन्तवादियों द्वारा अन्य का जो शोषण किया गया, वह सर्व विदित है। इंगलैण्ड में भी ऐसी ही स्थिति थी। 1931 तक महिलाओं को सम्पत्ति धारण करने का अधिकार नहीं था। पर यह विडम्बना है कि जहाँ पर इतना एक तरफा शासन था, वहीं पर उदारवाद का भी जन्म हुआ। उसी उदारवाद ने विश्व के शेष देशों में भी स्वतन्त्रता की लग्न पैदा की। यह उल्लेखनीय है कि भारत में स्वतन्त्रता अन्दोलन में वही व्यक्ति अग्रणीय थे जो इंगलैण्ड में विद्या प्राप्त किये थे। इस के साथ समाजवाद तथा मार्कसवाद भी पश्चिम की ही देन हैं। वीयतनाम के नेता हो ची मिन्ह के विचार पैरिस की गलियों में ही जन्म लिये। उस के द्वारा आरम्भ किया गया अन्दोलन वीयतनामी देशभक्ति तथा पश्चिमी साम्यवाद का संयुक्त परिणाम ही था।


उपरोक्त तथ्यों का तृतीय विश्व के देशों की गरीबी से क्या सम्बन्ध है, इस को समझने के लिये विशेष प्रयास नहीं करना पड़े गा। पूँजीवाद हो अथवा मार्कसवाद, उन का आधार यह है कि भूमि, श्रम एवं पूँजी, सभी वस्तुयें हैं जिन्हे क्रय एवं विक्रय किया जा सकता है। मार्कसवाद का कथन केवल इतना ही है कि पूँजी के बल पर श्रम का शोषण किया जाता है तथा इस का निदान यही है कि पूँजी पर श्रमिकों का आधिपत्य स्थापित किया जाये। यह तीनों वस्तुयें मनुष्य का मौलिक अधिकार नहीं हैं। इस के विपरीत कृषि प्रधान देशों में मान्यता है कि यह सब एक समेकित समाज का भाग हैं। ग्रामवासी ग्राम समाज का अंग है तथा भूमि उस को अपने परिवार के निर्वाह के लिये दी जाती है। यद्यपि इस समाज में भी शोषण था किन्तु फिर भी समाज में कृषक का स्थान निश्चित था। उपनिवेशवाद ने इसे बदल दिया तथा उन्हें बाज़ार का भाग बना दिया। वहीँ उन के श्रम का मूल्य बाज़ार की शक्ति से जोड़ दिया गया। अन्नदाता होने के स्थान पर वह केवल व्यापारी तथा वह भी बलहीन व्यापारी रह गया। उस के उत्पादन का उचित मूल्य मिलने की कोई सम्भावना नहीं थी क्योंकि बाज़ार पर आधिपत्य दूसरों का था। बिहार में नील का उत्पादन तथा उस के उत्पादकों का शोषण इस का उदाहरण है।


मार्कस ने उपनिवेशवाद को पूँजीवाद की चर्म सीमा बताया था तथा इस के बाद उस का पतन निश्चित था। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। पूँजीवाद स्थापित रहा तथा अन्ततः मार्कसवाद को ही बदलना पड़ा। वास्तव में उपनिवेशवाद का कारण कच्चे माल की आवश्यकता तथा तैयार माल के लिये बाज़ार की आवश्यकता थी। पहले के लिये विश्व के शेष राज्यों पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष आधिपत्य किया गया। दूसरे के लिये उन के उद्योगों को एक निश्चित एवं निष्ठुर योजना के तहत नष्ट किया गया। सस्ते श्रम के लिये गुलामी की प्रथा अपनाई गई। सस्ती भूमि तथा सस्ते श्रम के लिये कई देशों में कच्चे कृषि माल के उत्पादन की व्यवस्था की गई। इन का व्यापार श्वेत देशों के लोगों के हाथ में ही था। लाभ उन्हीं को मिलता था।


इस उपनिवेशवाद का मूल कारण तथा परिणाम असमानता थी। पूरे इतिहास में कमज़ोर को दबाया गया है। यूनान हो अथवा रोम, या फिर चंगेज़ खान, बात वही रहती है। तथा इन सब के पीछे कोई तकनीकी कारण नहीं रहा है। चंगेज़ खान के घुड़स्वारों का सामना युरोप के लोग नहीं कर पाये। बाबर के तोपखाने का सामना भारत के राजा नहीं कर पाये। तथा आधुनिक काल में युरोप के मशीनों के सामने तृतीय विश्व की अर्थ व्यवस्था नहीं ठहर पाई। और आज के तथाकथित ज्ञान युग की भी यही स्थिति है।


जैसे जैसे युरोप में औद्योगिक क्राँति का विस्तार हुआ, वहाँ के कृषक नगरवासी बनने लगे। कच्चे माल की आवश्यकता कोे तृतीय विश्व के देशों ने पूरा किया। पर इस के लिये वह पूरा मूल्य प्राप्त नहीं कर पाये। रिकारडों का यह सिद्धाँत कि जो देश जिस वस्तु को अधिक अच्छे तथा सस्ते ढंग से बना सकता है, वही उस के लिये लाभप्रद है, उपनिवेशवादियों के लालच के सामने बेकार हो गया। यह नहीं कि अपवाद नहीं हैं। कनाडा ने कच्चे माल को बेच कर ही स्मृद्धि पाई है। परन्तु इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिये कि कमज़ोर एवं शक्तिशाली का सिद्धाँत कनाडा में उतनी शिद्दत से लागू नहीं किया गया। उन का सामाजिक ढांचा युरोप की भाँति ही था। सम्भवतः इस कारण उस की स्थिति भिन्न रही। तृतीय विश्व की सामाजिक स्थिति अलग थी तथा उस को उपनिवेशवाद ने विकृत कर दिया जो न यहाँ के रहे न वहाँ के। बिहार में नील की खेती जब कृतिम नील के कारण सम्भव न रही तो उन के खेतों को गन्ने के खेतों में बदल दिया गया यद्यपि बिहार गन्ने की खेती के लिये उपयुक्त नहीं है। पर नीति थी कि खाद्यान्न के स्थान पर वाणिज्यिक फसलें उगाई जायें। मलाया में रबड़, भारत में चाय, कांगों में काफी, क्यूबा में गन्ना, गोल्ड कोस्ट में कोको सभी इसी प्रकार के बागान थे।


हम ने कहा है कि सस्ते श्रम के लिये गुलामी की प्रथा एवं व्यापार शुरू किया गया पर इस के अन्य तरीके भी थे। इण्डोनेशिया में हालैण्ड ने ‘कल्चर सिस्टम’ आरम्भ किया था। इस में यह नियम बनाया गया कि कृष्कों को अपनी भूमि का कुछ अंश निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की कृषि के लिये रखना अनिवार्य हो गा। अफ्रीका में नियम बनाया गया कि गृह कर केवल विदेशी मुद्रा में ही दिया जा सकता है। यह मृद्रा वे केवल श्वेत लोगों के यहाँ मज़दूरी कर के ही कमा सकते थे। मज़दूरी कम रखी जाती थी ताकि यह श्रम अधिक समय तक करना पड़े। बैल्जियम ने कांगों में इस परोक्ष तरीके के स्थान पर सीधे ही अनिवार्य श्रम की व्यवस्था लागू की।


जब गुलामी की प्रथा की समाप्ति की गई तो उन के स्थान पर करारबद्ध श्रमिकों की प्रथा आरम्भ की गई। हज़ारों की संख्या में भारतीय श्रमिकों को फिजी, त्रिनीदाद, इत्यादि स्थानों में ले जाया गया। भारत के अन्दर बिहारी श्रमिक को आसाम के चाय बागान के लिये ले जाया गया। उन की हालत गुलामों से अधिक बेहतर नहीं थी, भले ही नाम के लिये वह गुलाम न थे।


दूसरी ओर जब परोक्ष तरीकों से भी कच्चे माल की आवश्यकता पूरी नहीं हुई तो सीधे ही भूमि पर कब्ज़ा किया गया। इस के लिये कोई भी बहाना उपयुक्त था। स्थानीय लोागें को अनुपजाउ भूमि में खदेड़ दिया गया। दक्षिण अमरीका में, अफ्रीका में तथा एशिया में कुछ स्थानों में बड़े बड़े फार्म स्थापित किये गये। ज़िम्बाबवे में स्वतन्त्रता के समय 90 प्रतिशत भूमि श्वेत लोगों के हाथ में थी।


एक ओर इस कच्चे माल, जिस में खाद्यान्न भी शामिल था, का मूल्य कम हो रहा था, वहीं तैयार माल का मूल्य बढ़ाया जा रहा था जिस से इन देशों को अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिये अधिक माल निर्यात करना पड़े। अधिक माल के लिये अतिरिक्त बागान चाहिये थे परन्तु इस का अर्थ स्थानीय लोगों के लिये अधिक लाभ नहीं था। लाभ तो केवल मालिकों को जाता था। श्रम के लिये और अपने घरों से दूर किये गये कृषि मज़दूर चाहिये थे। चूँकि इन कृषि मज़दूरों के पास अतिशेष था ही नहीं अतः इन की दशा बिगड़ती ही गई।


उपनिवेशवाद यदि कृषि के विरुद्ध था तो अन्य उद्योगों के विरुद्ध तो और भी उग्र था। कपड़े, बर्तन, इत्यादि जैसी रोज़मर्रा की वस्तुयें भी आयात करना पड़ें, इस के लिये इन के बनाने को हतोत्साहित किया गया। विकसित देशों का और विकास हुआ जब कि अविकसित देशों की उत्पादकता कम होती गई। उदाहरणार्थ उत्पादकता का सूचकाँक इंगलैण्ड तथा भारत का देखा जाये।


स्विज़ अर्थशास्त्री पाल बैरोच के अनुसार यह आँकड़े इस प्रकार हैं (1900 को इंगलैण्ड के संदर्भ में आधार वर्ष माना गया है)-


वर्ष इंगलैण्ड भारत विकसित देश अविकसित देश

1750 10 7 8 7

1800 16 6 8 6

1830 25 6 11 6

1860 64 3 16 4

1880 87 2 24 3

1900 100 1 35 2

1913 115 2 55 2


जहाँ इंगलैण्ड में उत्पादकता तेज़ गति से बढ़ी है, वहीं भारत की कम हुई है। यही प्रवृति अन्य विकसित तथा अविक सित देशों में भी देखी जा सकती है। यह नहीं कि भारत या अविकसित देशों का श्रमिक पश्चिमी देशों के श्रमिक की तुलना में कमज़ोर था अथवा प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता था पर ऐसा जान बूझ कर किया गया।


उपनिवेशवाद का एक परिणाम तृतीय विश्व में जनसंख्या की तेज़ी से वृद्धि थी। बीसवीं शताब्दि से पूर्व जन्म दर तथा मृत्यु दर दोनों ही तृतीय विश्व में उच्च स्तर पर थे। इस कारण जनंसख्या वृद्धि दर कम थी। अतः इन देशों में बड़े परिवार होने की संस्कृति थी। योरुप में भी औद्योगिक क्राँति के पूर्व यही स्थिति थी। वहाँ पर भी जनसंख्या वृद्धि दर में मृत्यु दर घटने से तेज़ी आई किन्तु कुछ ही समय में स्वैच्छिक तरीके से जन्म दर को कम कर इस पर काबू पा लिया गया। वास्तव में इस में बढ़ती हुई स्मृद्धि का योगदान था। परन्तु तृतीय विश्व में ऐसा नहीं हो सका। गरीब गरीब ही रहे या यह कहा जाये कि गरीब रखे गये। मृत्यु दर तो कम हो गई - भारत में 40 से 10; घाना में 45 से 12; कोलोम्बिया में 40 से 6 किन्तु जन्म दर में अपेक्षित कमी नहीं आई। मृत्यु दर में कमी बीमारियों पर आयातित दवाईयों तथा अन्य तरीकों से काबू करने के कारण था। विकसित देशों में सामाजिक परिवर्तन के कारण दोनों पक्षों में प्रभाव पड़ा तथा इस में बहुत बड़ा योगदान आर्थिक स्थिति के ठीक होने का था। अविकसित देशों में जीवन स्तर में सुधार के बिना ही यह हुआ। आम तौर पर इस बढ़ती हुई जनसंख्या के लिये अविकसित देशों को उत्तरदायी ठहराया जाता है किन्तु देखा जाये तो यह भी उपनिवेशवाद का ही एक दुष्परिणाम है।