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खानम बुआ

खानम बुआ


जब से उस ने होश सम्भाला, तब से ही वह सुनती आ रही है कि वह बिल्कुल अपनी मॉं पर गई है। वही रंग रूप, वही नयन नक्ष। पर सुरैया को अपनी मॉं की शकल मालूम नहीं। हो भी कैसे। वह जब चार बरस की थी तो उस की मॉं का इंतकाल हो गया था। उस के लालन पालन का ज़िम्मा उस की बुआ खानम पर आ गया था। खानम बुआ अभी खुद ही कम उम्र की ही थी। मगर उस ने सुरैया को वह सब दिया जो एक मॉं अपनी बेटी को दे सकती है।

उम्र के साथ खानम बुआ की सुरैया से उनसियत भी बढ़ती गई। जहॉं सुरैया बिना बुआ के नहीं रह सकती थी, वहीं बुआ भी उस के बगैर जिंदगी के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। अपनी तालीम पूरी करने के बाद बुआ ने स्कूल में मास्टरनी बनना मंज़ूर किया। उस ने अपने भाई को कह दिया कि वह शादी नहीं करे गी। उसे मनवाने की कोशिश तो की गई मगर वह तैयार नहीं हुई। आखिर थक हार कर भाई ने कहना ही बन्द कर दिया।


सुरैया जब थोड़ी बड़ी हुई तो खानम बुआ ने उस को भी उसी स्कूल में दाखिल करवा दिया जहॉं वह पढ़ा रही थी। सुरैया के अब्बा ने अपनी बीवी की वफात के बाद दूसरी शादी कर ली थी और अपनी नई ज़ि़ंदगी में मसरूफ हो गया था पर उस ने रुपये पैसे के बारे में कभी कमी नहीं आने दी। हॉं, पर वह वह प्यार सुरैया को नहीं दे पाया जो उस का हक था। सुरैया और बुआ के बीच कोई तीसरा नहीं था।


सुरैया पढ़ने में ज़हीन थी ओर उस के साथ उस की बुआ की मेहनत। वह लगातार तरक्की करती रही। आठवीं में स्कूल में दोयम रही तो उसे वज़ीफा भी मिलना शरू हो गया। दसवीं की परीक्षा आई और सुरैया उस में भी अच्छे नम्बर ले कर पास हो गई। अब उस की ख्वाहिश आगे भी पढ़ने का थी। सुरैया को बुआ का एक और फायदा यह भी हुआ कि बुआ पेंटिंग की शौकीन थी और उस का यह शौक सुरैया को भी भा गया। वह अच्छी ड्राईंग बना लेती थी और अच्छी तसवीरें भी बना लेती थी।


बुआ का स्कूल दसवीं कलास तक ही था। अब बुआ के सामने मुश्किल आ पड़ी। अगर सुरैया आगे पढ़ती है तो दूसरे अदारे में जाना पड़े गा। वह उस की नज़र के सामने नहीं रहे गी। इतनी लम्बी मुद्दत में उस को इतनी उनसियत हो गई थी कि वह चाहती थी कि सुरैया हर वक्त उस के सामने रहे। इसी वजह से उस ने शादी करने से भी इंकार रक दिया। उस के भाई - सुरैया के अब्बा- ने कई बार कोशिश की कि बुआ शादी कर ले। वह देखने सुनने में अच्छी थी। इस वजह से रिश्तों की कमी नहीं थी। पर बुआ को लगता था कि फिर सुरैया का क्या हो गा। उस का ख्याल कौन रखे गा। अब्बा ने समझाने की कोशिश की कि अब सुरैया बड़ी हो गई है, अपना ख्याल खुद रख ले गी। लेकिन बुआ यह सुनने को तैयार नहीं थी। सुरैया तो अभी बच्ची है। वह उस के लिये पहले जैसी बच्च्ी ही तो थी। सुरैया के अब्बा की दूसरी बीवी ने भी बुआ को समझाने की कोशिश की कि वह सुरैया की देख भाल का ज़िम्मा लेती है। उस का कहना था कि औरत की ज़िंदगी मरद के बिना अधूरी रहती है पर इस सब का भी कोई असर नहीं हुआ। सुरैया की नई मॉं ने जब अपने बेटे को जन्म दिया तो उस का ध्यान बट ग्या जो एक कुदरती बात है। पर सुरैया को उस ने कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया। उस को किसी बात में कोई तकलीफ नहीं थी पर बुआ के साथ की बात कुछ और ही थी। सुरैया भी अब कुछ कुछ समझने लगी थी पर उसे भी लगता था कि वह बुआ के बगैर अकेली रह जाये गी। उस की कोई सुनवाई तो नहीं थी पर वह भी गाहे बगाहे अपनी बात कह जाती थी। बुआ भतीजी के इस गठजोड़ के सामने सुरेया की नई मॉं की नहीं चल पाई। बुआ ने शादी नहीं की।


पर अब यह नई मुश्किल आ पड़ी। सुरैया की आगे पढ़ाई की। वह तो कालेज जाना चाहती थी पर कालेज जाये गी तो बुआ के सामने नहीं रहे गी। इस से उसे कोफियत होती थी। भाई ने कहा कि कालेज के बाद तो घर ही जाये गीं। जब इस का असर नहीं हुआ तो उस ने तुरुप की चाल चली। अब जवान लड़की को घर पर तो बिठा कर नहीं रख सकते। पढ़ाई नहीं तो उस की शादी कर देते हैं। यह सुन कर बुआ सन्न रह गई। शादी हो गी तो सुरैया दूसरे घर में चली जाये गी। फिर? कालेज उसे इन दो बातों में से ज़्यादा बेहतर लगा। कम से कम शाम को दिख तो जाये गी।


और इस तरह सुरैया कालेज में दाखिल हो गई। उस के अब्बा का ख्याल था कि और कुछ हो न हो, अब बुआ का जनून थोड़ा कम हो जाये गा और शायद खत्म ही हो जाये। उसे बहन की आगे की ज़िंदगी की भी फिकर थी। वैसे तो नौकरी है। अपना गुज़ारा कर सकती है पर फिर भी सहारा तो चाहिये ही होता है। कोई अपना तो होना चाहिये। यह सही है कि उस की उम्र तो काफी हो गई है पर फिर भी कोई न कोई शौहर अच्छा मिल सकता हैं। कोई न कोई ज़रिया निकल आये गा।


सुरैया का कालेज लड़कियों के लिये था लेकिन कुछ विषय पढ़ाने के लिये मरदों भी रखना ज़रूरी था, क्योकि औरतें साईंस, हिसाब वगैरा पढ़ाने के लिये मिलती ही नहीं थीं। लेकिन इस बारे में कालेज की इंतज़ामिया कमेटी बहुत ध्यान रखती थी। इन मास्टरों का काम पढ़ाना था और किसी लड़की से क्लास के बाहर बात करना सख्त मना था। कमेटी को इस बात का डर था कि कहीं कोई उलटी सीधी बात हो जाये तो उसे मिलने वाली सरकारी इमदाद ही बन्द हो जाये गी। ऐसे में कालेज का चलाना मुश्किल हो गा।


इन मास्टरों में एक था खुरशीद। वह वहॉं का रहने वाला नहीं था। उस का घर बहराईच में थां। यहॉं सिर्फ नौकरी की तलाश उसे खींच लाई थी। वह हिसाब और ड्राईंग पढ़ाता था। लैक्चर देने के इलावा कैमिस्ट्री के तजरबे कराने की ज़िम्मेदारी भी उस की थी। वह ज़हीन, महेनती आदमी था और अपना काम पूरी मुस्तैदी से करता था। सुरैया भी ज़हीन थी और अपनी पढ़ाई की तरफ पूरी तवज्जह से मेहनत करती थी। खुरशीद को सुरैया में वह सभी खूबियॉं दिखीं जो वह अपनी बीवी के बारे में सोचता था।


खुरशीद ने अपने अब्बा से बात की और उस के अब्बा ने सुरैया के अब्बा से। सुरैया के अब्बा को भी खुरशीद पसन्द आया।


बुआ को जब पता लगा तो उसे एक बार तो इतबार नहीं आया। अभी इतनी जल्दी निकाह की बात हो जाये गी, उस ने सोचा नहीं था। फिर उस ने कहा कि अभी तो पढ़ाई चल रही है। पढ़ाई पूरी कर ले तो बात चलाई जाये। पहले कुछ करना उस की पढ़ाई में रूकावट बने गी। उस ने सुरैया से बात की और उसे सम्झाया कि अभी निकाह उस के हित में नहीं है। पढ़ाई पूरी न कर पाने की बात सुरैया को भी ठीक नहीं लगी। बुआ को लगा कि अभी तो बात टल जाये गी। पर ऐसा हुआ नहीं। खुरशीद ने कहा कि निकाह से पढ़ाई में कोई अड़चन नहीं आये गी। वह एक ही कालेज में हैं और साथ साथ जा सकते हैं। और फिर अब इम्तहान भी तो कुछ माह ही दूर रह गये हैं। वह इंतज़ार कर सकता है मगर अपनी अम्मॉं की वजह से जल्दी है। उन की तबियत ठीक नहीं रहती और वह अपने सामने बेटे का निकाह देखना चाहती हैं। दोनो तरफ मुश्किल। उधर अम्मॉं का तकाज़ा, इधर पढ़ाई की फिकर। आखिर में हल यह निकाला गया कि निकाह तो पढ़ दिया जाये। तारीख तय हो गई और सभी रस्में पूरी हो गईं।


खानम बुआ को निकाह के लिये तो मानना पड़ा पर अब उस का कहना था कि सुरैया पढ़े गी या घर का काम काज देखे गी। कालेज तो साथ चले जाये गे लेकिन घर का काम अपने आप तो हो गा नहीं। खुरशीद को पढ़ाने की तैयारी करनी हो गी और सुरैया को इम्तहान की। लहज़ा सही यही हो गा कि वह कुछ दिन उन के यहॉं रहे। उसे स्कूल में पढ़ाते हुये अरसा हो चुका है और फिर से तैयारी करने की उसे ज़रूरत नहीं है। वह घर का काम देख ले गी।


उस की इस दलील का कोई माकूल जवाब नहीं था। उस के भाई यानि सुरैया के अब्बा को मानना पड़ा। खुरशीद ने भी रज़ामंदी ज़ाहिर कर दी। खानम बुआ सुरैया के साथ ही नये घर में आ गईं। उस ने पूरा घर सम्भाल लिया। खरशीद की मॉं भी कुछ अरसे तक वहीं रही पर वह अपनी तबियत की वजह से घर का काम काज देखने की हालत में नहीं थी। सारा ज़िम्मा बुआ का ही था। जब खुरशीद की अम्मॉं ने देखा कि सब काम खुशअसलोबी से चल रहा है तो वह बहराईच लौट गई। अब बुआ ही घर चलाने लगी।


यूॅंही वक्त गुजरता गया। सुरैया का इम्तहान आया और गुज़र गया। सुरैया ने अब घर के काम में भी हिस्सा बटाना शुरू किया या करना चाहा पर बुआ का कहना था अभी तो तुम्हारे खेलने के दिन हैं। काम करने के लिये मैं हूॅ न। और मेरा भी स्कूल अब बन्द है तो मुझे तो फुरसत ही फुरसत है। खुरशीद का यह बहुत अजीब से लगता था पर वह कुछ कह नहीं पाता था।


जब तीन आदमी साथ रहते हों तो कुछ मसले अपने आप सामने आ जाते हैं जिन में किसी की दानिस्ता कोशिश नहीं होती। अब एक दिन की बात है कि खुरशीद ने कहा - बुआ आज हम पिक्चर देखन जायें गे। वहीं पर खाना खा कर लौटैं गे। आप फिकर न करना। बुआ ने कहा। ज़रूर जाओ पर खाने की बात न करो। आज मैं ने बहुत मेहनत कर कीमा बनाया है इस लिये खाना तो घर पर ही खाना। धर पर ही खाना खाना पड़ा। जब कभी भी ऐसी बात होती, उस का कहना होता कि घर का खाना हमेशाा बढ़िया होता है। बाहर तो पता नहीं कौन सा घी इस्तेमाल करते हैं। कौन सफाई का ध्यान रखते हैं। यह बात सिर्फ एक बार की नहीं रही। कई बार ऐसी बात हुई जब उन्हें अपना इरादा बदलना पड़ा। सुरैया से अपनी बुआ की बात के खिलाफ जाना भी बहुत कोफत की बात लगती।


जब भी सुरैया इस बारे में बात करती कि उसे भी तो अब सब कुछ सीखना है तो बुआ का कहना होता। अभी तो तुम आनी पेंटिंग पर ध्यान दो। तुम अच्छी पेंट्रिंग बना लेती हो। उस में बरकत है। अभी धर का काम करो गी तो इस में महारत नहीं पा पाओ गी। बात सही थीं। सुरैया की पेंट्रिग अच्श्री आ रही थीं। खुरशीद के दोस्त भी उन की तारीफ करते थे बल्कि उन का तो कहना था कि इन्हें बाज़ार में ले आना चाहिये।


न सिर्फ खाने के बारे में इस तरह की बात होती कि बुआ के मनसपन्द का खाना ही बनता बल्कि कई बार तो कपड़ों के चुनाव पर भी उस की राय - बेबाक राय - भी आ जाती। क्या पहनना अच्छा लगे गा। कौन सा ज़ेवर ठीक रहे गा। तकलीफ तब होती जब खुरशीद बहराईच जाना चाहता। सुरैया को भी तो सुसराल जना ही पड़ता था। यह उम्मीद थी कि इतने दिन तो बुआ अपने भाई के धर रहे गी पर बुआ को वहीं रहना ही पसन्द होता।


खुरशीद ने सुरैया के अब्बा से भी बात की। अब्बा भी आये और बुआ को कहा कि मैं तुम्हें लिवाने आया हूॅं। अब अपने घर लौट चलो। तुम्हारे बिना घर सूना सा है। पर बुआ का यह बात पसन्द नहीं आई। बोली - अभी तो बच्चों के खाने खिलाने के दिन हैं, उन पर घर चलाने की जिम्मेदारी डालना तो ठीक नहीं हो गा। और फिर तुम्हारे साथ तो जाहिरा - दूसरी बीवी - है ही न। बच्चे हैं। सूना क्यों लगे गा। यह कोशिश भी बेकार गई। इसी सूरत कुछ महीने और गज़र गये।


बुआ को तब एक फिकर और लग गई। सुरैया से कहने लगी - क्या बात है। अभी तक तो नये मेहमान के आने की खबर आ जाना चाहिये थी। न तो सुरैया इस बारे में फिकरमन्द थी न ही खुरशीद पर बुआ को यह फिकर सताती रहती। खैर कुदरत को तो अपना काम अपने वक्त पर ही करना था। सो एक दिन पता चला कि सुरैया हामला है। खुरशीद की अम्मॉं का कहना था कि इस बीच सुरैया बहराईच में ही रहे पर बुआ चाहती थी कि वह वहीं पर रहे। इस बात को ले कर थोड़ी खटपट भी हो गई। बुआ का कहना था, वह अकेली उस घर मे कैसे रहे गी। सुरैया के अब्बा का कहना था - अकेला रहना ज़रूरी हैं क्या। अपने घर में रहो। वहॉं सब हैं। भतीजा भी हैं, भतीजी भी है। उन के साथ दिल लगा रहे गा। खुरशीद का भी ख्याल था कि एक बार बुआ वहॉं जाये गी तो उसे अच्छा लगने लगे गा। खानम बुआ को बात पसन्द नहीं आई। आखिर में वह वहीं रही और सुरैया बहराईच गई। कुछ दिन तो खुरशीद वहीं रहा पर उसे तो लौटना ही था। कालेज तो जाना ही था। पर नतीजा यह हुआ कि बुआ से बोल चाल बन्द सी रही। पूरे घर में चुप रहे। बुआ खाना बनाती और खुरशीद कह देता कि मैं तो खा कर आया हू। सुरैया के अपने नवजात बच्चे के साथ लौटने तक यही सिलसिला रहा।


अब बुआ को एक और बात मिल गई। बच्चे का काम तो सुरैया देखे गी पर घर का काम तो उसे देखना ही हो गा। कोई बच्चे को पालना आसान काम थोड़ा ही है। पर नतीजा सह हुआ कि खुरशीद अब न सिर्फ बुआ से बल्कि सुरैया से भी कट कर रहने लगा। सुरैया को अजीब तो लगता पर वह बुआ को कुछ कह नहीं पाती। घर में अजीब सा माहौल था।


यह इंतज़ाम दायमी तो हो नहीं सकता था। कोई न कोई तो हल निकलना ही था। आखिर खुरशीद को इस का हल मिल ही गया। उस ने लखनउ में एक कालेज में अर्ज़ी दी और उसे चुन भी लिया गया। उस ने लखनउ में घर भी ले लिया। बुआ अब क्या करें। वक्त बीत चुका था। न सुरैया की पढ़ाई का बहाना था न घर सम्भालने का। बच्चा भी कुछ बड़ा हो गया था, उस को सम्भालने का काम भी नहीं। अपने स्कूल की नौकरी छोड़ कर जाने का सवाल ही नहीं। ज़िदगी का एक मरहला खत्म हो रहा था, दूसरा शुरू हो रहा था। खानम बुआ के लिये दोनों तरफ ही मुसीबत थी। एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई। सुरैया से बिछुड़ने का गम। नौकरी के आसरे की फिकर। क्या इसे सहना ही हो गा। और कोई चारा भी तो नहीं था।


अब बुआ क्या करे।




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