• kewal sethi

किस्सा बाथरूम का

PWD - public works department is famous for its time consuming procedures. but you can not see its real nature unless you are its victim. i had undergone the experience (as have many others) and i thought it fit to describe it for everyone's benefit. so here it is.


लोक निर्माण विभाग


हमारा बेटा पिछले अप्रैल में विदेश से जब आया

उस ने गुस्लखाने के फर्श को खस्ता हाल पाया

तब उस ने हमारी पत्नि को इस के बारे में उकसाया

और उन्हों ने ताना भरे शब्दों में हम को धमकाया

बोली इतने बड़े अफसर कैसे हो तुम इन्सान

बाथरूम तक नहीं बनवा सकते, कैसे करते हो काम

यूं तो कहते हो अपने फैसले से बदल सकते हो निज़ाम

इस छोटी सी बात में नहीं चलता आप का फरमान

हम ने कहा कि नादान हो तुम समझती नहीं हो भाग्यवान

बाथरूम बनवाना जितना समझती हो उतना नहीं आसान

देने को आज ही दे सकता हूं ई ई को मैं पैगाम

पर तुम्हें पता नहीं इस का क्या हो गा अंजाम

त्रिया हठ के सामने किस का आखिर वश चल पाया

ई ई को बुलवा कर बाथरूम सुधार का एस्टीमेट बनवाया

ताबड़तोड़ बना का लाया वह सैंक्शन आडर्र निकलवाया

और आनन फानन में बाथरूम बनवाने का इरादा जतलाया

दो एक माह बीत गये आई न विभाग से कोई खबर

श्रीमती जी ने फिर से किये प्रभावीपन पर हमले प्रखर

ई ई को बुलवाया भेज का संदेश वाहक दो एक बार

उस का मासूम सा स्पष्टीकरण पहले से ही था तैयार

टैण्डर दिये हैं मंगवा, बस उन का है इंतज़ार

जैसे ही आते हैं, हो जाये गा अपना बेड़ा पार

आखिर दिन वह आ ही गया जब दर्शन दिये ठेकेदार

लगा जल्दी में है बस दस दिन की ही है बात

इक दिन शाम को दफतर से लौट कर जब आये

पत्नि ने हम को मीठे मीठे रसगुल्ले खिलाये

पूछने पर पता चला हम को इस खुशी का राज़

बनाने के चक्कर में हो गया शुरू टूटने का काम

बाथ रूम में जा कर देखा तो हुए बहुत हैरान

फर्श तोड़ने की कही थी, टूटी पड़ी थी दीवार

फर्श पर पड़ी थीं टूटी टाईलें, एस डी ओ ने समझाया

हम ने सोचा बदल दें गे पूरे बाथरूम की ही काया

अब जो हो चुका था उस से कैसे वापस जायें

टूटी हुई टाईलें तो दीवार से अब जुड़ न पायें

अच्छा है कि दिल को ही अपने समझायें

नये बाथ रूम की कल्पना में ही खो जायें

डाल कर दीवार को फर्श पर चले गये मज़दूर

इक रात को टाईलें ले कर आ गया ट्रैक्टर

चौंक का उठे हम किस ने रात को दो बजे घण्टी बजाई

ट्रैक्टर वाले ने गेट खोलने की गुहार थी लगाई

शुरू हुआ दीवार का बनना समय न कुछ लगाया

दो चार दिन मे ही दीवार का काम निपटाया

पर पानी की पाईप को रखने का रहा न उन्हें ध्यान

फिर से तोड़ा कुछ टाईलों को, हुआ कुछ नुकसान

इस बार भूल गये वह साबुन रखने का प्लेटफार्म

अब के नहीं तोड़ा, कौन करे उन को हैरान

चला लें गे काम जैसे भी होगा, यह सोचा

बीवी ने भी इस बार नहीं खोला कोई मोरचा

फिर दस बारह रोज़ का नागा आया, हम घबराये

कार्यपालन यंत्री को संदेश दे कर फिर से बुलवाये

फर्श बनाने का काम भी शुरू हो गया और हो गया पूरा

पर अभी सीट बिठाने का काम रह गया अधूरा

ठेेकेदार ने अब के साफ साफ कर दिया इंकार

मैसनरी में होता नहीं इस का कभी शुमार

ठेका मेरा केवल टाईलों का, नहीं पानी से सरोकार

इस के लिये तो और कोई जन बुलाओ सरकार

फिर से हमारे जवान ने पी डब्लयू डी के चक्कर लगाये

आखिर इक दिन वह सैनिटरी वाले को भी पकड़ लाये

सीट बिठाई, पुरानी टैंकी की जगह नई टैंकी भी लगाई

गीज़र में पानी के लिये भी टूटी एकाध लगाई

पर होनी फिर अपना रंग बदल का आई

गीज़र को बिठाने में उस की पाईप ने चोट खाई

बिजली वालों का काम था गीज़र को लगाने का

सैनीटरी वालों को क्यों था इस में नाक घुसाने का

हुआ दोनों में वाकयुद्ध, शुक्र है हुई नहीं हाथापाई

पर एक दूसरे को उन्हों ने खूब खरी खोटी सुनाई

अब करने पड़े हमें इलैक्ट्रीकल को फोन पर फोन

तुरन्त काम करने के आश्वासन मिलते हमें हर रोज़

पंद्रह दिन को बाहर गये लौट कर जब हम आये

गीज़र को पहले की ही हालत मे हम पाये

गुस्सा आया त्रिपाठी सहायक इंजीनियर को बुलवाया

उस ने गीज़र उठा कर वर्कशाप में तुरन्त पहुंचाया

पंद्रह रोज़ लगे गीज़र को ठीक ठाक करने में

और दो चार दिन ओर लगे उसे फिट करने में

पर भूल गये बतलाना आप को हम एक बात

टाईलों के साथ ली थीं बिजली की तारें निकाल

बिजली का काम था कैसे करते मैसनरी के लोग

उन्हों ने दिया था उन्हें खुला वैसे ही छोड़

अब बिजली वालों ने उन्हें फिर से जमाया

टाईलें न टूटें इस लिये स्विच सात फुट ऊपर लगाया

कैसे करें बंद बल्ब को, कैसे करे गीज़र आन

सीढ़ी का इस के लिये करना हो गा रोज़ इंतज़ाम

एक स्विच को तो बैड स्विच लगा का काम चलाया

पर पावर स्विच के मामले में तो अपना हाथ उठाया

तार खींच कर दरवाज़े पर लगा दो किया हमने इसरार

काम हो गया यह भी, चाहे लगे हफ़्ते दो चार

सब कुछ जब फि़ट हो गया, हम ने शुक्र मनाया

गीज़र का बêन राम का नाम ले कर दबाया

पर पानी इधर से उधर से निकला यूं तत्काल

डर कर बंद कर दिया गीज़र को हो कर बदहाल

फिर से नल को ठीक करने पलम्बर को बुलाया

उस ने मरम्मत करने में कुछ ऐसा चक्कर चलाया

गुस्लखाने में पानी ही बंद हो गया सूख गये नल

पानी चढ़ाओ टैंकी में रुकता था न दो भी पल

फिर हम ने शुरू किया इस बाबत अनुसंधान

समझ न पाये माजरा क्या है हुए बहुत हैरान

पाईप में कहीं लीकेज है यह दिखता था ज़रूर

पर कहां से है यह पता नहीं चलता था हज़ूर

पर आखिर पूरी पाईप खोली जांच कर डाली

और कहां थी लीकेज वह जगह डूंढ निकाली

तोड़ी पाईप वहां और आरज़ी तौर पर पी वी सी पाईप लगाई

उधर नगर निगम को उसी दिन मज़ाक करने की याद आई

चौबीस घण्टे पानी खुला रखा और दुर्भाग्य हमारा

आसमान ने भी छोड़ दिया बादलों से फ़व्वारा

पी वी सी पाईप कब तक देती अपना साथ

अलग हो गई हमें छोड़ कर बीच मंझधार

चौबीस घण्टे पानी बहता रहा लगातार

भर गई सारी जगह जैसे आया कोई तूफान

सोने के कमरे के बाहर ही थी धारा बहाई

सारी रात हमें तो इस के मारे नींद नहीं आई

सुबह उठ कर स्वयं ही करने लगे कुछ इंतज़ाम

दुश्वार था बहुत पर कर लिया पूरा यह काम

बांध कर कपड़ा रस्सी पानी का बहाव रुकवाया

पर पानी आखिर पानी है, प्रैशर ने रंग दिखाया

कपड़ा रस्सी ही बस लगाये हुई हम से यह नादानी

कभी पाईप के इधर से कभी उधर से बहता रहा पानी

पर हिम्मत नहीं हारी हम भी लगे रहे जम कर

रखते रहे पानी के बहने पर हम पूरी तरह नज़र

उधर बाथरूम के अन्दर भी पानी बह रहा निरन्तर

कभी बालटी कभी पतीला रख कर चलाई मुहम

इस बीच समा गई गट्टर में मिट्टी जो दीवार से थी निकाली

चोक हो गई नाली, सारे बाथरूम में भर गया पानी

बस यहीं तक किस्सा अब तक का, ई ई को डांट डपट कर

केस करने के लिये अपने आ गये हम इन्दौर दौरे पर

देखें कब तक चलता है यह बाथरूम का नाटक

हम होते हैं रिटायर बिन नहाये या कि नहा कर


पुनश्च

सुन कर हमारी यह कविता हमारे मित्र मुस्कराये

छह सात महीने में ही तुम ने होश अपने गंवाये

हो गये दो साल से भी ज़्यादा हम को यह सहते हुए

पानी की जगह सब नलों से करेंट को बहते हुए

हाथ लगायें तो पानी के स्थान पर आता है झटका

कब किस का पोलो राम हो जाये रहता है खटका

खण्डर बन गया है मकान मिसकनैक्शन की तलाश में

हम ने भी ब्यान किया है इसे नज़्म के अंदाज़ में

सुनो तुम को सुनाता हूं मैं अपनी कहानी

राजीव के शब्दों में याद करा दें गे नानी

कक्कू कवि ने तब जोड़ दिये हाथ

बोले भाई कर दो हम को तुम माफ़

मेरी कविता में भरे पन्ने दो चार

तुम्हारी में तो हो गया हो गा पूरा दीवान


(इंदौर 22 नवम्बर 1997

यह कविता सच्ची घटना पर आधारित है। इस में कोई बात अपनी तरफ से नहीं जोड़ी गई है। )


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