top of page
  • kewal sethi

कृष्ण लीला का सन्देश

कृष्ण लीला का सन्देश


कृष्ण की हर लीला कुछ सन्देश देती है, ऐसा मेरा विचार है।


माखनचोरी में क्या सन्देश निहित है? स्पष्टतः ही घर में माखन की कोई कमी नहीं थी। माता उन्हें माखन खाने को नहीं देती थी, इस कारण चोरी कर उन्हें खाना पड़ा। प्रश्न यह है कि माता उन्हें इतना मक्खन क्यों नहीं देती थी कि उन्हें चोरी की ज़रूरत हो। इसी प्रकार की एक घटना मटकी फोड़ने की भी है। दूध को व्यर्थ बह जाने में कृष्ण का क्या स्वार्थ सिद्ध हो गा। क्या इसे केवल बालक की बचपना कहा जा सकता है। ऐसा कहना उन के प्रति ही नहीं अपने प्रति भी अन्याय हो गा।


मैं ने अपने कृषक कल्याण आयोग का प्रतिवेदन 1989 में तैयार करते समय इस बात पर टिप्पणी की थी कि बरसात का मौसम आरम्भ होने पर इन्दौर कलेक्टर ने आदेश जारी किया कि दूध का खोया नहीं बनाया जाये गा। कारण कि बरसात में दूध की कमी हो जाती है तथा इस के दाम बढ़ जाते हैं। नगरवासियों को महंगा दूध न खरीदना पड़े, इस कारण खोये पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक माना गया।


यही बात कृष्ण के समय भी लागू होती है। उस समय भी गोकुल में जो दूध तथा मक्खन तैयार होता था, वह मथुरा में भेजे जाने के लिये होता था। मटकी फोड़ने तथा मक्खन चुराने में सन्देश निहित था कि ग्राम में उत्पादित दूध दही मक्खन ग्रामवासियों को ही उपभोग में लाना चाहिये तथा जो बचे, वहीं बाहर भेजा जाये।


हम ने सदैव नगरों तथा नगावासियों की सुविधा का ध्यान रखा है। नाम के लिये हम कहते रहे कि भारत गा्रमों का देश है पर उस ओर कभी ध्यान नहीं दिया कि उन की उन्नति कैसे हो। ग्रामों को सदैव प्रदायकर्ता के रूप में देखा गया। चाहे मुगल काल हो अथवा अंग्रेज़ी काल, ग्रामों को उन के हाल पर छोड़ दिया गया। नाम के लिये स्वायतता थी किन्तु इस में उन का शोषण हो रहा है, इस की ओर ध्यान नहीं दिया गया। उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया। स्वास्थ्य की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराइ्र गई। स्वतन्त्रता उपरान्त भी यही क्रम रहा। भोपाल के पास सैंकड़ों एकड़ भूमि को किसानों से नाम मात्र के मावज़े पर ले लिया गया और आज भी भारत हेवी एलैक्ट्रीकल के पास काफी भूमि बिना इस्तेमाल के पड़ी हुई है। इसी भूमि से शक्ति नगर इत्यादि बने हैं। यही हाल भिलाई का भी है। एक और विस्तृत बंगले हैं तो दूसरी ओर नेहरू नगर, आनन्द नगर, भिलाई कैम्प इत्यादि सब किसनों से ली गई भूमि पर स्थित हैं। वाडरा द्वारा किसानों से भूमि सस्ते में लेना, उस का उपयोग परिवर्तित कराना और उसे साठ गुणा अधिक भाव पर बेच देना उसी व्यवस्था का अंग है।


पर आज फिर उस सन्देश को देखने की अवश्यकता है जो श्री कृष्ण ने दिया था कि ग्रामवासियों के उत्थान की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। इस से पहले कि वहाॅं के उत्पादन को नगरों के लिये प्रयोग में लाने को प्राथमिकता दी जाये, उन की अपनी प्रगति के लिये साधन मुहैया कराना चाहिये। नगरों की भलाई के लिये उन के उत्पादन के लिये उन का शोषण को समाप्त किया जाये।


1 view

Recent Posts

See All

जापान का शिण्टो धर्म

जापान का शिण्टो धर्म प्रागैतिहासिक समय में यानी 11,000 ईसा पूर्व में, जब जापानी खेती से भी बेखबर थे तथा मवेशी पालन ही मुख्य धंधा था, तो उस समय उनकी पूजा के लक्ष्य को दोगू कहा गया। दोगु की प्रतिमा एक स

उपनिषदों में ब्रह्म, पुरुष तथा आत्मा पर विचार -3

उपनिषदों में ब्रह्म, पुरुष तथा आत्मा पर विचार (गतांश से आगे) अब ब्रह्म तथा आत्मा के बारे में उपनिषदवार विस्तारपूर्वक बात की जा सकती है। मुण्डक उपनिषद पुरुष उपनिषद में पुरुष का वर्णन कई बार आया है। यह

उपनिषदों में ब्रह्म, पुरुष तथा आत्मा पर विचार -2

उपनिषदों में ब्रह्म, पुरुष तथा आत्मा पर विचार (पूर्व अ्ंक से निरन्तर) अब ब्रह्म तथा आत्मा के बारे में उपनिषदवार विस्तारपूर्वक बात की जा सकती है। बृदनारावाक्य उपनिषद आत्मा याज्ञवल्कय तथा अजातशत्रु आत्

Opmerkingen


bottom of page