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क्षणिकवाद

क्षणिकवाद


बौद्ध दर्शन में सब से महत्वपूर्ण बात क्षणिकवाद की है। यह कहा जाता है कि इस नश्वर संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। जो भी है वह केवल पल भर के लिये ही है। उस का कोई स्थायीत्व होना सम्भव ही नहीं है। इस सिद्धाँत का मूल महात्मा बुद्ध द्वारा दिये गये चार सत्यों पर आधारित है। यह चार सत्य थे

1. संसार दुखों का घर है।

2. इस दुख का कारण है

3. यह दुख समाप्त किये जा सकते हैं।

4. इन दुखों को समाप्त करने का मार्ग है।

इन को इस प्रकार भी प्रस्तुत किया गया है।

1. सर्वं दुखम

2. सर्वं क्षणिकम

3. सर्वं नैरात्मम

4. सर्वं शून्यं


यह संसार दुखों का घर है क्योंकि हर बात का आदि है और अन्त है। हर वस्तु जिस में मनुष्य भी है, उत्पन्न होती है, परिवर्तित होती है और समाप्त हो जाती है। इसी की बौद्ध दार्शिनिकों ने व्याख्या की है कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं हो सकता क्योकि वह परिवर्तित होता रहता है। इस के लिये नदी का उदाहरण दिया जाता है। कोई भी व्यक्ति दिूसरी बार उसी जल में प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि पहले वाला जल तो जा चुका है। इसी प्रकार जब मोम बत्ती जलती है तो उस की लौ स्थायी नहीं है। वह भले ही स्थायीत्व का भ्रम पैदा करे परन्तु दो क्षणों में एक ही लौ नहीं होती है। एक लपट समाप्त होती है तो दूसरी उस के स्थान पर आ जाती है। नदी में जल जाता है तो दूसरा जल उस का स्थान ग्रहण कर लेता है।


बौद्ध दार्शिनिकों का कहना है कि कोई वस्तु क्षण भर ही रहती है। उस का आदि है और उस का अन्त है पर उस का आस्तित्व नहीं है। वह केवल समाप्त होने के लिये ही आस्तित्व में क्षण भर के लिये आती है। आदि तथा अन्त में क्षण भर का जो अन्तर है वही उस का जीवन है। इसी लिये इसे क्षणिकवाद या क्षण भुंगर वाद कहा जाता है। स्थायीत्व केवल माया है। भ्रम है। निरन्तरता का जो भाव बनता है वह वास्तव में एक जैसा रूप के होने के कारण है। अपना रूप अगले क्षण दूसरी घटना को दे कर प्रथम घटना समाप्त हो जाती है। मनुष्य विभिन्न भागों को बना हुआ है। अन्तत: हर भाग अस्थायी है। अर्थात घटना क्षणिक है पर रूप क्षणिक नहीं है। यह रूप ही वह स्थान लेता है जो सांख्य या योग में जाति को दिया जाता है।


उपरोक्त सिद्धाँत का अर्थ यह है कि आत्मा भी स्थायी नहीं हो सकती है। आत्मा केवल कुछ समूहों का नाम हैं यह समूह हैं - रूप स्कन्ध (भौतिक शरीर), वेदना स्कन्ध (भाव तथा संवेदन समूह), समज्ञ स्कन्ध (विचार समूह), संस्कार स्कन्ध (निर्माण बल समूह), तथा विज्ञान स्कन्ध (चित्त समूह)। यदि व्यक्तित्व को इन सकन्धों में विग्रह किया जो तो ऐसा शेष कुछ नहीं बचता जिसे आत्मा कहा जा सके। जब तक यह समूह विधमान है तब तक शरीर, मन इत्यादि हैं। अहं इन से अलग नहीं है। जब विग्रह किया जाये गा और कुछ नहीं बचे गा तो दुख समाप्त हो जायें गे। वही निर्वाण है।


इसी प्रकार भौतिक शरीर भी कई भागों में बाँटा जा सकता है जिन्हें आयतन कहते हैं। इन की संख्या बारह है और वह हैं - आँख, कान, नाक, जीव्हा, चर्म, मन तथा उन के प्रतीक रूप, ध्वनि, गंध, स्वाद, स्पर्श, तथा समग्रता (जो मन द्वारा जानी जाती है।) इन्हीं के साथ छह प्रकार के संयोग दृष्टि इत्यादि को मिला कर अठारह धातु बनती हैं। जब इन में भौतिक शरीर को बाँटा जाता है तो कुछ भी नहीं बचता है।


इस अनात्मा तथा निस्वभावता के सिद्धाँत को संसार की सभी वस्तुओं के लिये विकसित किया गया है। किसी भी वस्तु का अपने भागों के अतिरिक्त कोई आस्तित्व नहीं है। रथ केवल अपने हिस्सों से मिल कर बना है। वह स्वयं कुछ भी नहीं है। इन भागों के अपने भाग हैं और अन्त में कुछ भी शेष नहीं रहता है। यही शून्यवाद है।


इस सिद्धाँत से कई प्रश्न उठते हैं। यदि कुछ है ही नहीं तो फिर दुखों से पार पाने के लिये क्यों कहा जा रहा है और इन से पार पाने के बाद क्या होगा। बुद्ध निर्वाण के पश्चात कहाँ गये। इसी का उत्तर डूँढने में बौद्ध दार्शिनिकों ने अलग अलग उत्तर दिये जिस से कई दर्शन उत्पन्न हुए। कुछ लोग जो सभी का आस्तित्व मानते है सर्वास्तित्ववादी कहलाये। कुछ जो कहते हैं कि केवल भूत काल का कुछ भाग ही वर्तमान में आता है क्षपिकवादी कहलाये। महायान के एक सम्प्रदाय भूततथा कहलाता है जिस का कहना है कि अन्तत: सब कुछ है पर अवर्णनीय है। उसे केवल 'तथा' कह कर ही सम्बोधित किया जा सकता हैं जैसे बुद्ध अन्तत: तथागत हो गये।


प्रश्न यह उठता है कि यदि कोई वस्तु उत्पन्न होते ही समाप्त हो जाती है तो वह अपने कर्मफल या संस्कार कैसे सौंप सकती है। जिस मार्ग पर चलने से निर्वाण प्राप्त होता है उस का फल एक क्षण से दूसरे क्षण में कैसे जाता है। फिर यदि सभी क्षण भर में समाप्त हो जाता है तो स्मृति कैसे काम करती है। जिस ने पूर्व का दृश्य देखा था और आज जब स्मृति कार्य करती है यदि वह अलग अलग हैं तो उन का एक दूसरे से क्या सम्बन्ध है। क्यों हमें दूसरे की देखी वस्तु याद नहीं आती। केवल अपनी देखी वस्तु ही स्मरण आती है।


एक प्रकार से क्षणिकवाद में चार्वाक दर्शन की बात याद आ जाती है। उस का कहना है कि आत्मा केवल भूतों का समूह है। मृत्यु पर वह फिर भूतों में ही मिल जाती हैं। मुत्यु उपरान्त कुछ है ही नहीं। पर चार्वाक जहाँ इस आधार पर विषयों का आनन्द लेने की बात कहता है, बौद्ध दर्शन का सार ही यह है कि संसार दुखालय है।

इस कठिनाई का समाधान संस्कार को केवल अचैतन्य शक्ति के स्थान पर चैतन्य युक्त शक्ति मान कर किया जा सकता है। यह संस्कार परिवर्तनशील व्यक्तित्व के बीच कड़ी का कार्य करते हैं। क्षणिकवाद बौद्ध दर्शन के लिये महत्वपूर्ण है। यधपि उस की अपनी सीमायें हैं पर नश्वरता का सिद्धाँत समझाने के लिये वह उपयुक्त है।

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