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क्या सोचते है पश्चिम के लोग हमारे बारे में

क्या सोचते है पश्चिम के लोग हमारे बारे में


आम तौर पर किसी भी लेखक के प्रस्तुतिकरण से उस के पूर्वाग्रह के बारे में पता चल जाता है। जब व्यक्ति किसी विषय पर लिखता है तो उस के बारे में सोचता है तथा उस के सभी पहलू सामने रखता है। पर जब वह अपने मूल विषय से हट कर किसी बात पर अपनी राय व्यक्त करता है तो उस के पूर्वाग्रह सामने आ जाते हैं। पशिचम के लोग, सभ्रान्त लोग, हमारे बारे में क्या राय रखते हैं, इस का एक उदाहरण प्रस्तुत है।


''यदि पश्चिमी तथा गैर पश्चिमी नैतिक मूल्यों में कोई विरोधाभास हो तो नियम स्पष्ट हैं। पशिचमी सिद्धांत (जो व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा पर आधारित हैं) को ही अनिवार्यत: चुना जाना चाहिये। वह संगठन के लिये अधिक महत्वपूर्ण भागीदारों के सिद्धांत हैं। वह अधिक सुरक्षित हैं (क्योंकि उन के कारण बहिष्कार अथवा मुकद्दमेबाज़ी सामान्यत: नहीं हो गी)। वह सभी अन्तर्राष्ट्रीय संधियों तथा कन्वैंशन के आधार हैं। उन्हें दूसरी संस्कृतियों को प्रकाशमय बनाने के लिये प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है (उदाहरणतया इस्लाम तथा आदिवासी सभ्यता में सित्रयों के जीवन तथा स्थान के बारे में)।


यह उद्धरण श्री जे आर ब्रेटन के लेख सोशल आडिट में से लिया गया है। वह सोशल आडिट के विशेषज्ञ हैं, संस्कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन के नहीं। यह विचार तो सोशल आडिट का एक बिन्दु स्पष्ट करते समय आ गये हैं। वहेचवदजंदमवने विचार हैं। जो उन्हों ने लिखा है वह भद्र समाज के सामान्य विचार माने जा सकते हैं।


हर व्यक्ति को विदेश के बारे में कुछ भ्रांतियां होती ही हैं। इस में आश्चर्य की बात नहीं है। दुख इस बात का है कि भारत में भी बहुत से लोग मिल जायें गे जिन के विचार इसी प्रकार के हैं। क्योंकि हमारी शिक्षा उन्हीं सिद्धांतों के अनुसार हुई है। मैकाले ने जो पद्धति दी थी उसी लीक पर हम चल रहे हैं। सब कोई इस की बुराई करते हैं पर उस के विकल्प पर सहमत नहीं हो पाते अत: वही पद्धति चल रही है। इस असहमति का मूल कारण भी यही है कि हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी के मन में भी उन्ही सिद्धांतों ने घर कर लिया है और किसी भी विकल्प का परीक्षण वह उन्हीं पाश्चात्य मापदण्डों पर करते हैं। जब मापदण्ड ही गल्त हों तो फिर नाप कैसे ठीक हो सकता है। इसी लिये यह आवश्यक है कि हम पूर्व की ओर ही लौटें और उसी के अनुसार अपना रास्ता स्वयं तय करें। इस के लिये एक जुट हो कर प्रयास करें।


जो मौलिक भेद है उस की ओर ध्यान देना हो गा। पशिचम में व्यक्ति को ही केन्द्र माना गया है। पूर्व में समाज को इकाई माना गया है। या सीमित करें तो परिवार को इकाई माना गया है। यह आवश्यक नहीं है कि प्रगति केवल व्यक्ति के आधार पर ही हो सकती है। जापान में अभी भी व्यक्ति की अपेक्षा समाज को ही प्रधान माना जाता है। और कोई यह नहीं कह सकता है कि जापान ने प्रगति नहीं की है। आज हम भले ही पश्चिमी इतिहासकारों के प्रभाव में कहें कि जापान युद्धप्रस्त था। पर यह सत्य है कि जापान ने दिखा दिया था कि पश्चिम के हथियारों से ही उस को परास्त किया जा सकता है। यदि पूर्व के जागरण की तिथि नियत की जाये तो वह स्पष्टत: ही 1905 के जापान रूस युद्ध की तिथि होगी। जो बात जापान ने हथियारों के युद्ध में बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में दर्शाई थी, वही उस ने शताब्दी के अंत में आर्थिक क्षेत्र में भी कर दिखाई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस के लिये उस ने अपने मूलभूत सिद्धांतों की तिलांजलि नहीं की है। भारत को भी अपनी ही संस्कृति के आधार पर स्वनिर्माण करना होगा तभी हम सही मायनों में आगे बढ़ सकें गे। पाश्चात्य परम्पराओं को अपना कर नहीं।

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