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किस्सा एक वारदात का - 2

  • kewal sethi
  • Jun 9
  • 3 min read

किस्सा एक वारदात का


2।

इस स्टेज पर यह बताना आवश्यक है कि यह सब क्या है और क्यों है। इस के बिना पाठक को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा हो गा। पात्रों का परिचय दिये बिना कहानी शुरू करना नई परिपाटी है और हम ने इस का पालन कर लिया है। आजकल तो कहानी खत्म भी हो जाती है और पाठक को स्वयं ही पात्रों के बारे में धारणा बनाना पड़ती है। पर पात्रों का परिचय ही न दें, इतनी हिम्मत हमारी नहीं है। छोटी कहानी के लिए तो फिर भी चल सकता है लेकिन लंबी कहानी के लिए तो बताना ही पड़ेगा कि हमारे नायक कौन थे और नायिका का भी नाम बताना पड़ता है पर अभी तो बात करते हैं नायक की। नायिका का नाम या काम अभी तक तो कहानी में आया नहीं और आगे भी आए गा, यह भी नहीं कह सकते इस लिये नायिका का परिचय देने की अभी कोई आवश्यकता नहीं है।


शर्मा जी, तो आप जान ही गये हों गे कि कलेक्टर है। यह उन का पहला पहला जिला है। नई-नई कलैक्ट्री की शान होती है लेकिन अब आठ दस महीने में यह षान थोड़ी सी धुंधली पड़ गई। समय ने बालों की साज-सज्जा को थोड़ा बिखरा कर रख दिया था लेकिन फिर भी पहला ज़िला तो पहला ज़िला ही होता है। शर्मा जी अपने से ज्यादा भाग्यशाली सुपुत्रों और सुपुत्रियों को पीछे छोड़ कर आगे निकल आए थे। भारत की प्रथम सेवा में प्रवेश पा चुके थे लेकिन उन का भूतकाल उन्हीं के समान परिश्रमी था और वह भी गिरता पड़ता हुआ सब रूकावटों को पार करता हुआ अब उन्हीं के पीछे पीछे आ खड़ा हुआ था। बस इतनी दूर कि दिखाई ने दे पर उस की आवाज़ शर्मा जी को सुनाई देती थी। बहुत सुखद अनुभव नहीं था पर मनुष्य की कमजोरी यही है कि वह अपने कड़वे अनुभव भी साथ ले कर चलता हैं। पर शायद यही अनुभव उस के लिए आवश्यक भी है। उन्हीं की बदौलत शर्मा जी आज भी अपने स्थान पर अडिग खड़े हैं। झुके लेकिन इतना नहीं कि बिछ जाऐं। अकड़े लेकिन इतना नहीं कि टूट जायें। पर यह सब तो आप को धीरे-धीरे पता चल ही जाये गा जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़े गी।

हॉं तो, शर्मा जी का यह पहला जिला का। यूॅं तो तीन चार स्थानों पर घूम कर वहां पर आए थे और बचते बचाते आए थे। इसी लिये अभी अकेले थे।। मसपहपइसम किन्तु मसनेपअम। कोई बंधन नहीं था। यद्यपि रौअब डालने के लिए एक का नाम सोच रखा था। दिल टूटने की प्रैक्टिस भी कर रखी थी। उन के अनुसार उन की पहली मोहब्बत अब दो बच्चों की मां थी जब कि वह बाप बनना तो क्या, उस से मोहब्बत का इज़हार भी नहीं कर पाए थे।


दूसरे पात्र जिन का ज़िकर आया है, वह हैं श्री स्कसैना, एस पी साहब। वह पुलिस में उप अधीक्षक पुलिस के रूप में भरती हुये थे और उम्र पा कर आई पी एस में आ गये। उप अधीक्षक रहते हुये कुछ ऐसी बात हुई कि जब पदोन्नति मिली तो कमाण्डैण्ट, एस ए एफ बना दिये गये। ज़िले में एस पी की जो भूमिका होती है, उसे देखते हुये एस ए एफ में नियुक्ति फीकी पड़ जाती है। इसे लूप लाईन भी कहा जाता है। ऐसे पद हर सेवा में होते हैं जिस में वेतन तो बराबर मिलता है पर वह षान नहीं मिलती जो दूसरे पद में होती है। खैर, कुछ साल तक एस ए एफ में रहने के बाद श्री स्कसेना को ज़िला मिला पर फिर किस्मत ने धोका दिया और पॉंच छह महीने के बाद ही वापस एस ए एफ में भेज दिये गये। अब 50 वर्ष के आयु में फिर एक बार ज़िला मिला है। जैसे चालर्स द्वितीय - इंगलैण्ड के राजा - कहा करते थे - ‘‘मैं फिर से यात्रा पर नहीं जाना चाहता - प कव दवज ूपेी जव हव वद उल जतंअमसे ंहंपद - ’’, वही स्थिति श्री स्कसैना की थी। इस कारण बचते बचाते चल रहे थे। उन के परिवार में श्रीमती के अतिरिक्त तीन और सदस्य भी थे - एक बेटी और दो बेटें। उन के बारे में बताने की आवष्यकता अभी तो नहीं है क्योंकि इस कहानी में उन की कोई भूमिका नहीं है।


और भी पात्र जैसे जैसे इस कथा में आते हैं, उन का ब्यौरा दिया जाये गा। पर कई तो बस आते हैं, जाते हैं, उन का परिचय तो क्या नाम देने की आवष्यकता भी नहीं है।

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