• kewal sethi

कहानी आडिट पैरा की

आडिट पैरा

केवल कृष्ण सेठी

1984 में लिखी गई एक कहानी 


रामलाल चपरासी की बीवी अपने पड़ोसन से कह रही थी,’ अरे, आज तो मुन्ना के बापू ने बहुत जोर से डाॅंटा। लगभग बिना बात के’।

‘हाॅं बहन, सच। अरे, पीलू के पापा की भी यही हालत थी। लगता है आज दोनों दफ्तर से अच्छी डांट खा कर आये हैं,’

 बात सही थी। आज बड़े बाबू ने उन्हें खूब डांटा था। पता नहीं किस किस नाम से पुकारा था। कामचोर,  हराम खोर, इत्यादि इत्यादि। बड़े बाबू खुद अंडर फैक्ट्री से डांट खा कर आये थे। जली कटी सुनाई थी अण्डर सैकटरी ने उन्हें। अण्डर सैकटरी और डिप्टी सैक्रटेरी को सचिव ने उल्टा सीधा सुनाया था। और सचिव? 

हुआ यह था कि आज उलटा प्रदेश विधान सभा की बैठक में सार्वजनिक निर्माण विभाग के ध्यान आकर्षण प्रस्ताव पर बहस हो रही थी। अखिल देशीय विरोधी दल के वरिष्ठ सदस्य श्री खीमजी ने कहा था., ‘‘माननीय अध्यक्ष महोदय। मैं आप का ध्यान लोक लेखा समिति की 29 वें रिपोर्ट के चाौथे अध्याय के पृष्ठ 162 के पैरा चार की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। इस से पता चले गा कि यह निकम्मी सरकार कितनी निकम्मी है। जनता के सुख दुुख से इस का दूर का भी वास्ता नहीं है। उस के गाढ़े पसीने की कमाई सरकार अपने अफसरों के माध्यम से कर द्वारा हस्तगत कर लेती है जो कि उन्होंने नौकरशाही के वशीभूत हो कर कर लगा कर जनता रूपी गधे पर लाद दिये हैं। उन के इस मेहनत से कमाई हुई राशि को पानी की तरह बहाती है। मैं जानना चाहता हूं कि क्या सार्वजनिक निर्माण विभाग के मंत्री इस का कुछ समाधान कर सकें गे। इस ज्वलंत समस्या पर प्रकाश डाल सकें गे ‘

 अध्यक्ष ने टोकते हुये कहा, ‘मुझे विश्वास है कि मंत्री महोदय अपने व्यक्तव्य में इस का उत्तर दे ंगे’।

 सार्वजनिक निर्माण विभाग मंत्री श्री रिमूव लाल जो कि नहीं सुन पाये थे कि किस विषय पर चर्चा हो रही है क्योंकि उस समयं वह अपने पीछे बैठे स्वर्ण लाल, माननीय मंत्री स्थानीय शासन (ग्रामीण) से तम्बाकू और चूना लेते हुये बतिया रहे थे। अध्यक्ष के पुकारे जाने पर वह खड़े हुये ओर कहा। 

‘‘माननीय अध्यक्ष महोदय,  मैं आप के माध्यम से सदन को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि हमारी सरकार हमेशा चैकन्नी रहती है। उस ने सदैव जनता की भलाई के लिये कार्य किया है। और जहां भी किसी ने इस में रूकावट डाली है,  उस को कभी बख्षा नहीं हैं। अघ्यक्ष महोदय, मैं आप के माध्यम से सदस्यों को विश्वास दिलाना चाहूं गा कि हम तुरन्त ही इस मामले में पूरी जांच करें गे और दोशी व्यक्तियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये गी ताकि भविष्य में किसी को इस प्रकार जनता की भावना से खेलने की हिम्मत ना पड़े‘,  

‘लेकिन, अध्यक्ष महोदय, क्या मन्त्री महोदय बतोयें गे कि यह जाॅंच कब तक पूरी हो सके गी। अभी तक उन्हों ने गत वर्ष स्वेता नदी पर पुल के क्षतिग्रस्त होने रिपोर्ट भी पेश नहीं की है। और विश्रामपूर के हस्पताल की और’..........।  

अध्यक्ष महोदय, मैं सदन को विष्वास दिलाना चाहता हूॅं कि इन सब प्रकरणों की जाॅंच तेज़ी से चल रही है तथा पूरी होते ही माननीय सदस्यों को इस के परिणाम से अवगत कराया जाये गा। मैं विश्वास दिलाना चाहता हूं कि वर्तमान में जिस जांच का आश्वासन दिया है, उस के बारे में भी रिपोर्ट यथा शीघ्र सदन के समाने प्रस्तुत की जाये गी।’ 

विधान सभा समाप्त होने के पश्चात माननीय मंत्री महोदय भन्नाते हुये सचिवालय (या मंत्रालय) पहुंचे और सचिव को तुरन्त बुला कर कहा

‘ सुना आप ने। आज कितनी फजीहत हुई अपनी विधानसभा में। वह तो हमारी मौके पर हाजिर जवाबी थी कि मामला बच गया। लेकिन मैं नहीं चाहता कि इस तरीके से हम पर छींटाकशी होती रहे। अब पता लगाइये कि दोषी कौन था और उस के स्थानान्तर के प्रस्ताव दीजिये। ऐसा व्यक्ति बचना नहीं चाहिये’।

 सचिन ने तुरन्त हामी भरी और अपने कमरे में आते ही अपने उपसचिव को बुलाया।

‘ अरे लऱकाना,  आज विधानसभा में क्या उधम हो गया था। और क्या आश्वासन दे आये हैं हमारे मंत्री’.

‘जी, वो खीमचंद विधायक ने लोक लेखा समिति की रिपोर्ट का एक पैरा देख लिया। बस उसे ले कर बैठ गये उस को’।

‘क्या था उस पैरों में‘।

‘ किसी सिर फिरे आडिटर ने कह दिया कि रंगपुर विभाग के उप संभाग 3 में कई नोटिस बोर्ड बनाये गये हैं जिन पर काफी खर्च आया है पर वो काम नहीं आ रहे हैं’।

 कौन सा संभाग,  राष्ट्रीय राजमार्ग का या ........’

‘ राष्ट्रीय राजमार्ग’

 ‘है क्या पैरा में या फिर प्रारंभिक रिपोर्ट मंगवाओ’ 

  उपसचिव ने अपने कमरे में आ कर अवर सचिन को बुलाया और कहा कि वह फाइल लाई जाये जिस में यह पैरा शामिल किया गया है

 उस ने बताया कि जो लिपिक यह कार्य देख रहा है वह आजकल छुट्टी पर है’।

‘ छुट्टी पर है। क्यों? छुट्टी पर क्यों है? क्या हुआ उसे?.

 जी, उस की बीवी को बच्चा होने वाला था, इस कारण छुट्टी पर है

 अरे बच्चा तों बीवी को हो रहा था, उस का थोड़ा हो रहा था। यह छुट्टी पर जाने का क्या टाइम था। विधानसभा चल रही है। हर समय जरूरत पड़ सकती है। कौन देख रहा है उस का काम.

‘ राजीव कुमार को उस काम में लगाया है।

 अरे वह तो नया है, बच्चा है। उस को क्या पता हो गा। पता नहीं कैसे देते हैं नौसिखिये को, इतना महत्वपूर्ण काम। बड़े बाबू को कहो कि खुद से तलाश करें

 अंडर फैक्ट्री ने बड़े बाबू को बुलाया और सबक पढ़ाते हुये कहा कि तुम विधानसभा के समय पर सब को छुट्टी दे देते हो और यहां कोई फाइल ढूंढनी पड़े गी तो कैसे पता चले गा। और काम भी दिया है उसे जो कुछ जानता नहीं। अब तुम खुद से फाइल को ढूंढ के बताओ और जल्दी से इस को पेश करो। सचिव वाकई में बहुत नाराज हो रहे हैं।

 जी सर,  बड़े बाबू ने कहा और आते ही चपरासी और सभी लोगों को इस काम में लगा दिया। पता नहीं फाइल कहाॅं रख देते हैं लोग, समझ में नहीं आती है। सब एक दूसरे को मुॅंह देखते रहते हो। 

खैर, डेढ़ दो घंटे की मशक्कत के बाद फाइल मिल गई और तुरन्त अण्डर सैकटरी को पेश की गई। उसे ले कर अंडर सैक्ट्री  उप सचिव के पास जा पहुॅंचे और उप सचिव उस को साथ लेकर सचिव के कमरे में पहुंच गये।

 रिपोर्ट देखी गई। लिखा था।

‘’ संभागीय यंत्री रंगपुर संभाग राष्ट्रीय राजमार्ग में दिनांक 18 मार्च 1979 को स्थानीय व्यापारी लाला राम सुधा मल को ₹3435 का आदेश पत्र दिया गया जिस में 28 नोटिस बोर्ड तैयार करने के लिये कहा गया। इस बोर्ड पर पेंटिंग के लिये अलग से ₹495 का ठेका दिया गया। स्टोर के भौतिक सत्यापन के समय यह पाया गया है कि 28 में से 16 बोर्ड वहीं पर थे। इस से स्पष्ट है कि माॅंग न होते हुये भी इतनी बड़ी संख्या में यह बोर्ड बनाये गये तथा इस प्रकार इस की राशि का दुरुपयोग हुआ जिस की जांच कर संबंधित व्यक्तियों से वसूली की जाना चाहिये। 

 हूॅं, मामला गंभीर है। काफी। हमारे विभाग में इस तरह के आदेश देना काफी आपत्तिजनक है। कई बार प्रपत्र भेजे गये है कि मार्च में अन्धा धुन्धा खर्च नहीं करना चाहिये पर इन इंजीनरों के कान पर जूं नहीं रेंगाती। कौन था ई ई। तुरन्त उसे जवाब देने को कहा जाये। 

यस सर, कह कर उप सचिव चलने को तैयार हुआ। 

जैसे कुछ याद आया फिर से?। सचिव ने कहा’  लऱकाना,  यह तो बताओ कि बोर्ड पर लिखा क्या था,

‘यह तो  रिपोर्ट में नहीं है, सर। मैं पता लगाता हूॅं। 

 दूसरे दिन तक लगभग 10 या 15 फोन कॉल के बाद।रिपोर्ट मिली। उप सचिव सचिव के पास पहुंचे.

‘सर, बात तो बहुत मामूली थी। 28 बोर्ड बने थे। और उन पर कहा गया था कि ‘सड़क की मरम्मत हो रही है। कष्ट के लिये खेद ह’ै।

 मुझे यही गुस्सा आता है। ऐसा करनी है इन की। यह इंजीनियरों को पैसा जाया करना खूब आता है। भला बताओ ‘यह कष्ट के लिये खेद है’  लिखने की क्या जरूरत थी। यही पेंटिंग का काम दो सौ  सवा दो सौ में हो जाता। कम से कम 210 रुपये बच जाते। 

 ‘यस सर,  28बोर्ड के स्थान पर 18 बोर्ड भी बनाते तो भी चल जाता। वैसे तो यह केवल शिष्टाचार के नाते बताया जाता है वरना सड़क की मरम्मत हो रही है, यह तो देख कर ही पता चल जाता है’। उप सचिव ने हाॅं में हाॅं मिलाते हुये कहा.

 ‘हां सही है। मेरे ख्याल में पूरे पैसे ही जाया किये हैं। आप लरकाना, चीफ इंजीनियर को बुला लीजिये’.

 ‘सर, उन से बात हुई थी। वह आजकल कह रहे थे कि मंत्री जी ई ई का स्थानांतरण चाहते हैं’। 

 ‘कौन है वहां पर’

 ‘सर सरगावकर’

 ‘अरे वह। रहने दो। रहने दो,  हमारी ही बिरादरी का है। अभी पिछले साल ही पोस्टिंग करवा कर आया है वहां पर। समझा दूॅं गा मंत्री जी को। बच्चा है। बेचारा छोकरा है। कुछ समझता नहीं। किसी सहायक यन्त्री ने कह दिया तो यह बोर्ड बनवा लिये। सहायक यन्त्री से वसूली की जाये गी। सब ठीक हो जाये गा’

 चीफ इंजीनियर के साथ लम्बी बैठक हुई। रंगपुर के यंत्री को बुलाया गया। सब लोग बैठे। तय हुआ कि अलग-अलग जिम्मेदारी तय की जाये गी। तीन उप संभागों में बोर्ड लगने थे तो वसूली भी हो गी तीनों एस डी ओ से.। नाम पता किये तो यहाॅं बात फंस गई। एक तो उन में से विधायक का साला था। वह तो अपने से वसूली होने ही नहीं दे गा। दूसरे भी उस का उदाहरण देंगे। अब क्या हो। सोचा - चलो, नोटिस दे देते हैं। वसूली को टालते रहें गे। पर यह विधायक बहुत कमबख्त है,  नोटिस से ही बिदक जाये गा। मंत्री को शिकायत करे गा। कैसे पार पाया जाये इस समस्या से।

बैठक में एक युवा अधिकारी भी बैठा था। उसे मन्त्री जी स्वयं ही लाये थे। बैठक में वह आ जाता था बिना बुलाये और उसे जाने को कहना कठिन था क्योंकि वह मन्त्री जी का आदमी था।

‘सर,  मेरे ख्याल में एक तरीका है। साॅंप भी मरे और लाठी भी ना टूटे’। उस नवयुवक अफसर ने कहा

 डूबते को तिनके का सहारा। सचिव और चीफ इंजीनियर दोनों उतालवी से बोले,  क्या, क्या, देखें तुम्हारा क्या तरीका है.

 ‘सर बात यह है कि यह आडिट पैराा नोटिस बोर्ड के बारे में है। और शिकायत की है कि नोटिस बोर्ड का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। अगर हम इस का इस्तेमाल करना शुरू कर दें तो लोक लेखा समिति को कहा जा सकता है कि कोई दुरुपयोग नहीं हुआ’.

 ‘नहीं सतीश, सारी। तुम्हारा विचार है तो बहुत अच्छा। पर जमे गा नहीं। वैसे तुम अक्सर आइडिया बढ़िया देते हो’.

 हां,  चीफ इंजीनियर ने हां में हां मिलाई,  इन नोटिस बोर्ड का इस्तेमाल किया गया तो एक और मजाक हो जाये गा। विधान सभा की ऐस्टीमेट कमिटी को एक मसाला मिल जायेगा। हो सकता है विधानसभा में भी इस बात का जिक्र आये’.

 उप सचिव भी बोले ‘लेकिन यह तो पता लगायें कि इस समय सड़क की हालत क्या है। एस ई साहब, आप का क्या ख्याल है’.

‘सर  पिछली बरसात तो आप जानते हैं बहुत तेज हुई थी। सारी सड़क की हालत अभी खराब चल रही है। सेराघाट से लेकर महापुरा तक की सड़क उखड़ी हुई है। पर, आप चिंता न करें। ंहम लोग दिन रात उस पर लगे हुये हैं। दो चार सप्ताह में बिल्कुल ठीक हो जाये गी’। .

‘नहीं, नहीं, नहीं, यह नहीं होना चाहिये। इसे रोक दो। इसे रोक दो। सतीश ने जो सुझाव दिया है, वह सही है। सड़क नहीं बने गी। बोर्ड काम आयें गे’, सचिव ने तपाक से कहा। .

 और एक सप्ताह बाद लोक निर्माण विभाग के मंत्री ने विधान सभा में वक्तव्य दिया

‘’ माननीय अध्यक्ष महोदय। हम ने प्रदेश की जनता को वादा किया था कि हम ऐसी सरकार बनायें गे जो कि संवेदनशील रहे गी और उन के सुख-दुख की भागीदार रहेगी। और जैसे कि मैं ने पिछले सप्ताह कहा था कि हम कभी ऐसा अवसर नहीं आने दें गे जब जनता के गाढ़े पसीने की कमाई जाया करने का किसी को अवसर मिल सके। अध्यक्ष महोदय, मैं सदन को विश्वास में लेते हुये माननीय सदस्यगण को सूचित करना चाहता हूॅं कि लोक लेखा समिति ने जिस व्यय का जिक्र आडिट रिपोर्ट में किया गया है, वह वास्तव में कतई अर्थहीन नहीं है बल्कि पूर्णतया उपयोगी था तथा जनता के हित में किया गया था। माननीय  सदस्यगण मेरे से सहमत हो ंगे कि सरकार का यह दायित्व है कि वह सड़के के खाराब होने के बारे में जनता को तथा वाहन चालकों को सूचित करें। साथ ही मेंरा दृढ़  विश्वास है कि इस देश में शिष्टाचार एक ऐसी बात है जिस का हमेशा आदर किया गया है। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हम ने शिष्टाचार को हाथ से नहीं जाने दिया। नोटिस बोर्ड पर हम खेद व्यक्त करना नहीं भूले। मुझे विश्वास है कि लोक लेखा समिति अपनी अगली बैठक में यह आपत्ति समाप्त कर दे गी। यह नोटिस बोर्ड उपयोगी है और हमेशा उपयोगी ही रहें गे’।  


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