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एक ब्रह्रा

एक ब्रह्रा


आम तौर पर यह मान्यता है कि हिन्दुओं के अनेक देवी देवता हैं। पाश्चात्य जगत में इस बात को बार बार दौहराया गया है। इस की तुलना वह अपने धर्म से करते हैं जिन में एक ही स्वामी है। कुछ पशिचमी विद्वानों ने जिन्हों ने वेदों तथा उपनिषदों का गहण अध्ययन किया वह इस बात से तो इंकार नहीं कर पाये कि भारतीय दर्शन में एकत्व की ही व्याख्या की गई है पर उन्हों ने यह कहना आरम्भ किया कि पूर्व में अलग अलग देवी देवताओं की पूजा की जाती थी जो विभिन्न प्रकृति के पदार्थो यथा सूर्य, चन्द्रमा, वायु इत्यादि का रूप थे। बाद में इन के स्थान पर उन में से सर्वशक्तिमान देवता की पूजा करना आरम्भ की। केवल दर्शन के स्तर पर ही उपनिषदों में एक ईश्वर की बात कही गई। मैक्समुलर ने इस सर्वशक्तिमान देवता की कल्पना को हेनोथीइज़्म का नाम दिया जिस में बहुदेवत्व से एकत्व सत्ता की ओर बढ़ा गया। इस हेनोथीइज़्म में एक ईश्वर में तो विश्वास होता है किन्तु किसी एक देवता को उस का तुल्य मान लिया जाता है।


परन्तु यह विचार भ्राँति पर आधारित हैं। या तो यह विद्वान समझ नहीं पाये या अपने ही रंग में रंगे होने के कारण समझने का प्रयास ही नहीं किया। श्रीमद गीता में कहा गया है

यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम।।

जो भक्त जिस रूप में जिस देवता की श्रद्धा से उपासना किये करते हैं, उसको मैं उसी श्रद्धा को स्थिर कर देता हूँ। भिन्न भिन्न देवताओं की जो पूजा की जाती है वह ईश्वर की ही पूजा है तथा उस का फल भी ईश्वर द्वारा ही दिया जाता है। क्योंकि इस जगत में ईश्वर के अतिरिक्त कुछ हैं ही नहीं। वेदान्त तथा उपनिषद में भी यही भाव है। बलिक उस से भी पहले वेद में भी इसी सिद्धाँत को प्रतिपादित किया गया है। ऋगवेद में ही कहा गया है -

एकं सद विप्र बहुधा वदन्ती। और - पुरुष एवेदं सर्वं यद भूतम यत्छा भावयम।

पुरुष ही यह सब कुछ है, था और होगा।


ऋगवेद में ही ऋत की कल्पना की गई हैं क्योंकि यह स्पष्ट था कि सूर्य चन्द्रमा इत्यादि स्वेच्छाचारी नहीं हैं। वह अपने मन से कार्य नहीं करते वरण किसी नियम से बंधे हैं। इसे ऋत को नाम दिया गया। ऋत ही सर्वोपरि माना गया। लेकिन फिर इस ऋत का भी स्वामी है। ''वह ही ऋत का संरक्षक है। पूरे ब्रह्मांड को बाँधने वाला है। पूरे विश्व का तथा पूरे नैतिक सदाचार का आधार है। अर्थव वेद में कहा गया है

''तमेव विदित्वा तिमृत्युमेती नान्य: पंथा विद्वते अनन्या ।

उसी एक को जानने से ही मुत्यु से पार पाया जा सकता है। और कोई रास्ता नहीं है।


वेदान्त में तो इस एकत्ववाद को पराकाष्ठा पर पहुँचाया ही गया है पर यह केवल गूढ़ ग्रन्थों में बन्द ज्ञान नहीं है कि सम्पूर्ण विश्व एक ही है। समस्त देवी देवता उसी एक ब्रह्म का रूप हैं। वह उस से अलग नहीं हैं। जब कोई व्यक्ति गणेश जी की या शिव जी की पूजा कर रहा होता है तो वह एक देवता की पूजा नहीं कर रहा होता, वह पूर्ण ब्रह्म की ही पूजा कर रहा होता है। उदाहरण के तौर पर गणेश अथर्वशीर्षम में कहा गया है।

त्वं ब्रह्मा विष्णु त्वं रुद्र तवं।

इन्द्र त्वं अगिन त्वं वायु त्वं।।

सूर्य त्वं चन्द्रमा त्वं।

ब्रह्म भू भव: स्व: ॐ।।

वही सब कुछ है। उन का स्वामी नहीं।


इसी प्रकार सरस्वती वन्दना में कहा गया है -

''या ब्रह्माऽच्युतशंकर प्रभृतिभिर्देवै सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती नि: शेषजाडयापहा।।

सरस्वती ही भगवती है। उन में कोई अन्तर नहीं है।


इसी प्रकार देवी भगवती की आराधना में कहा गया है।

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्ये त्रयंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।।

गौरी ही नारायणी हैं। इन में कोई अन्तर नहीं है। सब एक ही अलौकिक शक्ति के रूप हैं।


यह बात केवल शास्त्रों में ही नहीं है। यह बात हमारे जन जन में गहरी पैठ लिये हुए है। यहाँ तक कि वह हमारे रोज़मर्रा के गीतों और आरतियों में भी प्रतिबिम्बित होती है। हर रोज़ की प्रार्थना में इसी बात का दिग्दर्शन होता है। शिवजी की आरती में कहा गया है।

बह्रा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर के मध्य यह तीनों एका।।


और दुर्गा जी की आरती में आता है

तुम ब्रह्राणी, तुम रुद्राणी तुम ही हो कमला रानी।


इस प्रकार यह स्पष्ट है कि न केवल विद्वानों के स्तर पर वरन् आम जनता के स्तर पर भी सभी देवताओं के एक होने की भावना घर कर चुकी है। उन के लिये वह सब एक ही हैं। किस की पूजा की जा रही है, किस नाम से की जा रही है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। क्योंकि सब एक ही हैं। अनेकता में एकता का यह अनुपम उदहरण है। इस बात को जो नहीं समझ पाते वह ही हमें जातियों में बटा हुआ पाते हैं और इस बात को हमें भिड़ाने के लिये इस्तेमाल करते हैं। आवश्यकता है कि हम इस के प्रति जागरूक हो।

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