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आरक्षण के नये आयाम

  • kewal sethi
  • Sep 25, 2023
  • 4 min read

आरक्षण के नये आयाम

आज का विषय महिला आरक्षण का था। इस के बारे में मोटे तौर पर कहा जासकता है कि 30% स्थान लोकसभा में तथा विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षित रखे जाएं गे।

अधिकतर वक्ता आरक्षण के पक्ष में थे बल्कि एक ने तो यह भी सुझाव दिया कि आई आई एम और आई आई टी मैं भी आरक्षण महिलाओं के लिए होना चाहिए ताकि वह भी प्रबंधन में एवं तकनीकी विषयों में आगे आ सकें। सभी वक्तागण इस बात से सहमत थे कि बौद्धिक रूप से महिलाएं पुरुषों से कम नहीं है। पुरुष प्रधान समाज ने उन्हें कम समझा है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। ।

यह ज़िकर भी किया गया कि पंचायतों में तथा स्थानीय निकायों में 30% स्थान पर महिलाओं के लिये आरक्षणं दिया गया है, बल्कि उड़ीसा ने तो इस को 50% भी कर दिया है। इससे जो महिलाएं पीछे रहती थी, वे आगे आ रही है। ये एक अच्छी शुरुआत है। विधानसभा तथा लोकसभा में भी आरक्षण से महिलाओं को ज्यादा अवसर मिलेगा। इस सम्बन्ध में कुछ सफल महिला सरपंचों के बारे में भी बताया गया।

जहाँ तक मेरा संबंध था, मेरा कहना था कि आरक्षण सिरे से ही गलत है। चाहे वो अनुसूचित जाति का हो, जनजाति का हो अथवा पिछड़े वर्ग का हो। या चाहे महिलाओं का हो। इस आरक्षण से कोई लाभ किसी को नहीं होता है। कुछ व्यक्ति अवश्य आगे बढ़ जाते हैं। यह उन का निजी लाभ होता है लेकिन समाज को उन का लाभ नहीं मिलता। 70 वर्ष से अनुसूवित जाति व जनजाति के लिए आरक्षण है। किंतु उनकी हालत सुधर गई है, ये कोई भी नहीं कहेगा। हाँ, उनमें से कुछ व्यक्ति जरूर आगे बढ़ गए हैं लेकिन उन्होंने अपने कबीले को अथवा अपनी जाति को आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया है। अल्कि उन के प्रतिनिधि तो ये चाहते है कि वह पिछड़ै ही बने रहे ताकि उनको समर्थन मिलता रहे। पिछढ़ेपन में ही अब राजनीति दिखाई देती है। सभी वर्ग अपने को पिछड़ा सिद्ध करने के लिए कटिबन्ध हैं। मैं ने जापान का हवाला दिया जहाँ पे मैजि क्रांति के पश्चात सभी जापानी नागरिको को एक मानकर आदेश जारी कर दिए। न किसी को कोई आरक्षण दिया न ही किसी को कोई संरक्षण दिया गया। लेकिन शासन ने समाज को बराबर का अवसर प्रदान किया गया। पूरा जापानी समाज आगे बढ़ा और इतना तेज़ी से बढ़ा कि यूरोप की महाशक्ति तक को परास्त कर दिया। द्वितीय महायुद्ध के विनाश के बाद भी आज जापानी अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया के लिए एक अनुकरनीय उदाहरण है।

वास्तव में अवसर की बराबरी ही एक मात्र रास्ता है कि सभी आगे आ सकें। हमने गलती ये कि हम इसमें उलझ गए कि हमें माई बाप बन कर लोगों को आगे लाना है। हम शासक हैं, हमें लोागों को कुछ हमें देना है। दया का यह भाव इस वर्ग को हतोत्साहित करने का रास्ता था। कहा गया कि हमें उनकी संस्कृति बचाए रखनी है। उनकी जीवन पद्धति बचाए रखनी है अथवा उनके साथ जो अन्याय हुआ है, उसकी प्रतिपूर्ति करनी है। वास्तव में, उनकी प्रगति के लिए, उनकी शिक्षा के लिए, उनके स्वास्थ्य सेवाओं में, उन के मौलिक आवश्यकताआं के लिए कोई कार्य नहीं किया गया। किया भी गया तो अनमने मन से। जबकि होना यह चाहिए था कि राष्ट्र की पूरी शक्ति इसमें लगा दी जाती। बाकी तो उन का अपना ही प्रयास रहता। अपने आप ही इसका परिणाम उन की प्रगति होता। लेकिन आरक्षण इन बातों का उपचार नहीं है। वह केवल रोड़े अटकाता है, आगे बढ़ने से रोकता है,और कोई सहायता नहीं देता।

महिलाओं केी स्थिति की बात करें। वास्तव में देखा जाए तो प्रकृति ने ही इस अंतर का खेल खेला है। मानव जाति ही नहीं पशु जाति में भी लिंग भेद हैं। बच्चे पैदा करना और उनकी रक्षा करना, उन का प्रशिक्षण करना, यह दायित्व उन के ज़िम्मे आया है। उन की महता को इस क्षेत्र में कम करके नहीं आंका जा सकता। इसी प्रशिक्षण पर जानवरों के बच्चे आगे बढ़ते हैं, चाहे वह स्त्रीलिंग के हों या पुलिंग के। वात्सल्य का जो वरदान उन्हें दिया गया है, वह किसी पुरुष के भाग्य में नहीं है। इसका अंतर तो रहेगा। परन्तु किसी को छोटा या बड़ा मानने का ये आधार नहीं हो सकता। न ही इस का मतलब यह है कि किसी क्षेत्र से उन को प्रतिबंधित किया जाना चाहिये। उन की बौद्धिक शक्ति उन को किसी भी स्तर पर ले जाने में सक्षम है। सुशमा स्वराज अथवा सीतारमण आरक्षण से नहीं, अपनी योग्यता के आधार पर ही राजनीति में छायी रही हैं।

जहॉं तक उदाहरण उन महिला सरपंचों के लिए गए हैं अथवा अन्य उद्योगपतियों के दिए गए हैं, वे इस कारण नहीं है कि उनका आरक्षण था बल्कि इस कारण में उनकी बौद्धिक शक्ति उनके काम आई और उन्हें इस का अवसर दिया गया। चाहे पद आरक्षित होता या नहीं होता, वे आगे बढ़ सकती थी। आज भी ज्यादातर परीक्षाओं में देखा गया है कि लड़कियों का प्रतिशत लड़कों से ज्यादा रहता है। 1963 में प्रशिक्षण के दौरान काययमबतूर में प्रशिक्षण के समय इस बात पर चर्चा हुई कि महिलाओं को विकासखण्ड अधिकारी बनना चाहिये या नहींं। मेरा तर्क था कि हम कौन होते हैं इस पर निर्णय लेने के लिये। वे ही स्वये अपने लिये तय करें गी। आज भी मेरा मत है कि उन्हें ही तय करना है कि वह किस प्रकार जीवन बितायें गी। इस में आरक्षण की कोई ज़रूरत नहीं है न ही उस का औचित्य है।

समान अधिकारों की बात की गई है और कहा गया है कि हम धीरे धीरे उस ओर बढ़ रहे हैंं। पर यह सही मार्ग नहीं है। चाहे जो भी कारण हो, यह तथ्य है कि अन्तर है और यह एक खाई है जिसे पार करना है। खाई को दो चरणों में पार नहीं किया जा सकता है। उस में गड्ढे में गिरने का ही परिणाम होता है। खाई को एक ही छलांग में पार किया जा सकता है और किया जाना चाहिये।


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