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अहिंसा परमो धर्मा

अहिंसा परमो धर्मा

अहिंसा भारत देश की अनुपम विशिष्टता है। जैन धर्म ने इसे अपना मूलभूत सिद्धाँत के रूप में स्थापित किया है। बौद्ध धर्म ने भी इसे उच्च स्थान दिया है। उन्हीं के अनुसरण में तथा अन्यथा भी हिन्दू धर्म भी अहिंसा का प्रबल पक्षधर है। ईसाई मत में भी हिंसा की अभिव्यक्त इस धारणा से स्पष्ट होती है कि ईसा मसीह ने कहा कि यदि तुम्हें कोई एक तमाचा मारे तो तुम दूसरा गाल भी उस के सामने कर दो। इस्लाम का तो शबिदक अर्थ ही शाँति है। महात्मा गाँधी के स्वतन्त्रता संग्राम में अहिंसा के स्थान ही उसे अपने में एक विशिष्ट अभियान बना देता है। मनुस्मृति में ''अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिनिद्रियनिग्रह: के नियम को प्रमुख स्थान दिया गया है।

ऐसे में अहिंसा के बारे में विचार मंथन किया जाना अस्वभाविक लगता है। पर इस का परीक्षण तो किया जाना चाहिये कि क्या यह सिद्धाँत नित्य हैं अथवा अनित्य। इन की व्याप्ति कितनी है। उस का मूल तत्व क्या है। सब से महत्वपूर्ण यह बात है कि यदि एक समय में दो सिद्धाँतों में से एक चुनना पड़े तो किसे प्राथमिकता दी जाये गी। वैसे तो हमारी धारणा है ''येन महाजना गता: स पंथा''। जैसा दूसरों ने अपने समय में आचरण किया था वैसा ही तुम भी करो। पर यह पूर्णतया संतोषजनक नहीं है क्योंकि हर परिस्थिति में अपनी विशिष्टता होती है। अत: इस के बारे में कुछ मार्गदर्शी सिद्धाँत तो होना चाहिये।

संसार में किसी बात के परीक्षण के लिये दो रास्ते है। एक वाह्य तथा दूसरा आँतरिक। वाह्य में भौतिक परिणाम क्या हुआ, इस पर विचार किया जाता है। यदि यह परिणाम सुखद है तो अपनाया गया मार्ग उचित है। पर केवल किसी व्यक्ति किे लिये घटित परिणाम को देखने से संतोष नहीं हो सकता। वह केवल स्वार्थ सिद्धी का ही परिचायक हो सकता है। इसी कारण व्य​क्ति के स्थान पर समाज को सामने रख कर परिणाम देखने की बात कही गई। ''अधिकतम लोगों की अधिक खुशी का सिद्धाँत प्रजातन्त्र की देन है। पर इन सभी स्थितियों में रहता यह भौतिक परिणाम ही है। इस का दुपर्योग का उदाहरण तो यहाँ तक है कि पूरे भारत देश को पराधीन बनाने को इस आधार पर सही माना गया कि इस से भारत देश में भी सभ्यता के राह पर चलने का प्रचार हो सका।

पर दूसरी ओर आँतरिक सुख की कल्पना वाले अधिक अन्तर्मुखी होते हैं। अर्जुन ने महाभारत शुरू होने से पूर्व ही कह दिया कि यदि गुरूजनों को मार कर स्वर्ग या त्रैलोक का राज्य भी मिले तो वह स्वीकार्य नहीं है। उस ने यह तर्क भी नहीं किया कि कौरवों के स्थान पर पाँडव राज करें गे तो जनता को अधिक सुविधायें प्राप्त हों गी। उस की आशंका थी कि इस से उस की आँतरिक शाँति नष्ट हो जाये गी यद्यपि उस ने वर्णशंकर जाति के बारे में भी अपने विचार व्यक्त किये पर अधिक ज़ोर आँतरिक शाँति पर था। उस ने इस सिद्धाँत का प्रतिपादन किया कि ''अष्टादशपुराणानां सारं सारं समुदधुतम। परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम'' वह किसी को दुख पहुँचाने से बचना चाहता था। यही उस का युद्ध करने से इंकार का कारण था।

इस गंभीर प्रश्न का उत्तर ही श्रीमद गीता का उद्देश्य है। अलग अलग प्रकार से इस बात पर ज़ोर दिया गया हे कि जिस भावना से कर्म किया जाता है वह ही महत्वपूर्ण है। यदि केवल अपने सुख के लिये, स्वार्थ के लिये कोई कार्य किया जाता हे तो वह तुच्छ है भले ही उस की वाह्य सूरत कुछ भी हो। दान भी तामसिक हो सकता है। और यदि स्वयं का हित छोड़ कर धर्म की स्थापना के लिये कोई कर्म किया जाये तो वह उस मुनष्य को पाप का भागी नहीं बनाती है।

आततायी मनुष्य के प्रति व्यवहार के बारे में मनु का कहना है -

''गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्राणं वा बहुश्रुतम।

आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन।।

आततायी को स्माप्त कर देना ही उचित है। उस के साथ नर्म व्यवहार मानवता के प्रति अपराध है। आततायिओं को क्षमा करने के बारे में भी प्रहलाद ने राजा बलि को उपदेश दिया था।

न श्रेय: सततं तेजो न नित्यम श्रेयस क्षमा।

तस्मान्नित्यं क्षमा तात पंडितैरपवादिना।।

आत्म रक्षा में किसी की हत्या को हत्या नहीं माना गया है। यह सिद्धाँत भारतीय दण्ड विधान में भी प्रतिपादित किया गया है। भ्रूण हत्या को शास्त्रों में सब से जघन्य अपराध माना गया है पर जब माता का जीवन भ्रूण के कारण संकट में हो तो इस की अनुमति दी जा सकती है।

सारांश यह कि अहिंसा का सिद्धाँत अपने स्थान पर उचित है पर इसे अपनी, अपने धर्म की, अपने सम्मान की रक्षा के निमित छोड़ा जा सकता है। अधिकाँश लोगों के अधिक सुख के लिये भी हिंसा करने में आपत्ति नहीं है। पर केवल अपने स्वार्थ की पूर्ती के लिये हिंसा करना वज्र्य है।

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