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अनारकली पुरानी कहानी, नया रूप

अनारकली

पुरानी कहानी, नया रूप


- सलीम, तुम्हें पता है कि एक दिन इस कम्पनी का प्रबंध संचालक तुम्हें बनना है।

- बिलकुल, आप का जो हुकुम हो गा, उस की तामील हो गी।

- इस के लिये तुम्हें अभी से कम्पनी के तौर तरीके का निचले स्तर से ऊपर तक खुद काम कर पता करना हो गा।

- अब्बा हज़ूर, मैं समझता हूॅं। दर असल मैं ने यह करना शुरू भी कर दिया है।

- बहुत खूब। तो किस के साथ अभी काम सीख रहे हो।

- जी अब्बा हज़ूर, अभी अनारकली के साथ हूॅं।

- अनारकली? वह तो स्टैनो है। उस के काम को सीखने का कोई मतलब नहीं है। तुम्हें तो हुकुम देना है।ं उस का काम उसे पूरा करना है।

- पर वह बहुत होशियार है। और खूबसूरत भी।

- शहज़ादे, तुम काम सीख रहे हो या इश्क फरमा रहे हो।

- अब्बा हज़ूर, क्या दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते।

- नहीं। उस का मियार तुम्हारे लायक नहीं है। तुम्हें कल से दूसरी डैस्क पर काम सीखना हो गा। मैं आज ही सरफराज़ को यह बता देता हूॅं। कल सुबह उसे मिल लेना।

- लेकिन अभी मेंरा अनारकली से पूरा सबक सीखना बाकी है। अभी तो इब्तादाई दौर ही चल रहा है। अभी कई मंज़िलें तय करना है।

- मैं ने कहा न कि यह सिलसिला यहीं खत्म हो जाना हो गा। तुम्हें मैं इतना गिरने नहीं दे सकता कि तुम एक अदना से मुलाज़िम के साथ काम सीखो या इश्क करो। उसे भूलना हो गा।

- लेकिन अब तो बात बढ़ गई है। मैं अनारकली को भूल नहीं सकता। मैं ने उस के साथ जिंदगी निभाने की सोची है।

- वह अनारकली? उस ने यह खवाब भी देखना शुरू कर दिया। कम्पनी के मालिकन बनने का खवाब। इसे चकनाचूर कर दिया जाये गा।

- आप भूलते हैं अब्बा हज़ूर कि इस कम्पनी में मेरी वालिदा के भी चालीस फीसदी हिस्से हैं। उन की इजाज़त के बगैर आप ऐसा नहीं कर सकते। मुझे उन से पूछना हो गा।


इधर कम्पनी के मालिक अकबर ने स्टैनों अनारकली को बुलाया।

- सुना है तम्हारे पर निकलने लगे हैं।

- सर, मैं समझी नहीं।

- तुम अच्छी तरह समझती हो कि मैं क्या कह रहा हूॅं पर तुम भूलती हो कि तुम्हारी हैसियत क्या है।

- मगर मैं ने कुछ किया नही जिस से आप इस तरह की बात कर रहे हैं।

- क्या सलीम तुम से मिलता नहीं है।

- जी सर, मिलता तो है।

- दफतर में या दफतर के बाहर।

- दफतर में भी और दफतर के बाहर भी।

- और तुम यह खवाब देखने लगी हो कि एक दिन तुम इस कम्पनी की मालिक बनो गी।

- मैं ने कोई खवाब नहीं देखे हैं। हॉं, मैं सलीम को पसन्द करने लगी हूॅं।

- और सलीम तुम्हें।

- उन की वह जानें। पर मेरी कोई ख्वाहिश किसी मुकाम पर पहुॅंचने की नहीं है।

- यह सब कहने की बात है। देखो, उस से मिलना बन्द करना हो गा। न दफतर में, न बाहर।

- यह बात आप सलीम को भी बता सकते हैं।

- उस का मैं ने बता दिया है और तुम को भी आगाह कर रहा हूॅं। वरना।

- वरना क्या?

- हमारा एक दफतर टिम्बकटू में भी है, वहॉं जाना कैसा लगे गा।

- ज़रिया मुआश की कमी इस शहर में तो नहीं है।

- तो तुम इंकार कर रही हो।

- आप मुझे गल्त समझ रहे हैं। मैं सिर्फ इतना कह रही हूॅं कि शहर छोड़ना मुझे अच्छा नही लगे गा।

- मतलब इंकार ही है। तुम दफतर छोड़ने को तैयार हो पर सलीम से मिलना नहीं।

- नहीं, मैं ने सिर्फ इतना कहा है कि मैं तरजबेकार स्टैनो हूॅं। कोई भी शख्स मुझे मुलाज़िम रखने को तैयार हो गा।

- वह देखा जाये गा। कल से तुम्हारे आने की ज़रूरत नहीं है। तुम्हारी अभी तक की पगार तुम्हें घर पर पहुॅंचा दी जाये गी।

- बहुत बहुत शुक्रिया। आदाब।


इधर सलीम की बात अपनी वालिदा से हो रही थी।

- मैं जानना चाहता हूॅं कि आप की इस बारे में क्या राय है।

- किस बारे में

- मैं अपनी कम्पनी में काम कर रही अनारकली से मिलता हूॅं और अब्बा हज़़ूर को यह पसन्द नहीं है।

- अनारकली, जो स्टैनो है, से मिलने की ज़रूरत क्या है।

- मुझे उस से इश्क हो गया है और मैं उस से निकाह करने की सोच रहा हूॅं।

- तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न। बुखार वगैरा तो नहीं है। कभी कभी जनून में आदमी अण्ट शण्ट बोलता ही है।ं

- यह जनून नहीं है। इश्क हकीकी है।

- लेकिन उस के खानदान, उस का रहन सहन, तुम्हारे माफिक नहीं है। निकाह बराबर में किया जाता है। किसी पर रहम करने के लिये नहीं।

- इस में रहम की बात कहॉं से आ गई। मर्द औरत का साथ हमेशा रहा है। बाकी सब बातें सिर्फ ज़हन के ख्यालात हैं।

- हम इस की इजाज़त नहीं दे सकते।

- तो मुझे इस खानदान से अलग होना हो गा।

- अब मुझे यकीन हो गया है कि तुम्हें किसी होशियार हकीम को दिखाना पड़े गा। मैं मौलाना इब्राहिम मदूदी से बात करती हूॅं।

- अम्मी हज़ूर। यह कोई मज़ाक की बात नहीं है। जब मेरी बात का एहतराम ही नहीं है तो यहॉं बने रहने का हक ही नहीं है।

- पर करो गे क्या।

- मैं अपनी कम्पनी बनाऊॅं गा और अब्बा हज़ूर को दिखा दूॅंगा कि सिर्फ वह ही कामयाब नहीं हो सकते, दूसरे भी हो सकते हैं।

- लेकिन कम्पनी के लिये, तिजारत के लिये रकम की ज़रूरत होती है।

- आप भूलती है कि आप के अब्बा यानि कि मेरे नाना मरहूम ने काफी जायदाद मेरे लिये वसीयत में बताई थी। अब मैं बालिग हो गया हूॅं और उस को इस्तेमाल कर सकता हूॅ।

- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।

- मैं अकेला नहीं हूॅं। कम्पनी के बहुत से मुलाज़िम अब्बा हज़ूर के तौर तरीके से नालॉं है। वह मेरे साथ आये गे।

- किस की बात कर रहे हो।

- एक तो अमर सिंह ही है। मार्केटिंग मनैजर। और भी बहुत से हैं।


अकबर ने सुना तो उसे बहुत गुस्सा आया। इस लड़के की हिम्मत कि वह बाप का मुकाबला करे गा। उस ने अमर सिंह को बुलाया।

- अमर सिंह जी, आप हमारे सब से कामयाब मनैजर हो। आप को हर तरह की महारत हासिल है।

- आप की ज़रानवाज़ी है। जो है, वह आप से ही सीखा है।

- पर मुझे बताया गया है कि आप कम्पनी से नाराज़ हैं।

- ऐसा कैसे हो सकता है। आप का नमक खाया है। आप से नाराज़ी कैसे हो सकती है।

- लेकिन सलीम का ऐसा ख्याल है। आप से कभी बात हुई क्या?

- सलीम से कभी सीधी बात तो नहीं हुई।

- किसी मौके पर कोई बात, याद कीजिये।

- और तो मुझे याद नहीं आता। गाहे बगाहे वह कई बार हमारे दोपहर के वक्फे के वक्त आ जाता है ओर हमारी बात सुनता रहता है।

- खैर, सलीम का यह ख्याल है कि आप कमपनी से नाराज़ हो। वह अपनी अलग कम्पनी शुरू करना चाहता है और तुम्हें मुझ से नाराज़ समझ कर अपने साथ रखे गा।

- पर ऐसा वह क्यों कर रहा है।

- वजह है अनारकली, उसे उस से इश्क हो गया है। पर उसे जाने दो। अब आप मेरा एक काम करो। जब सलीम तुम को रखे तो यह तुम्हारी ज़िम्मेदारी है कि वह कामयाब हो। मैं ने उसे काम सीखने के लिये कहा था और उस ने यह रास्ता चुना है। वह नासमझ है, नातजरबेकार है। बाज़ार की ऊॅंच नीच से वाकिफ नहीं है। तुम्हें ही इस का ख्याल रखना हो गा।

- और अनारकली?

- उसे शायद वह स्टैनो रखे या किसी और ओहदे पर। उस से फरक नहीं पड़े गा। आशिकी का भूत आता भी जल्दी है और जाता भी जल्दी है। और दफतर में एकाध लड़की और हो तो फोरन से पेशतर। बस, ज़रा उसे काम में मसरूफ रखना। बाकी वक्त सम्भाल ले गा।

- जी बेहतर।

- उसे मालूम नहीं होना चाहिये कि यह मेरी रज़ामन्दी से हो रहा है। मुझ से कभी मश्वरा करना हो तो किसी वक्त भी आ सकते हो। और माली इमदाद चाहिये हो तो भी।

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